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बिहार : शिवानंद तिवारी का सवाल, जब सरकार ही कटघरे में तो उसकी जांच एजेंसी पर कैसे भरोसा करें?

राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद शिवानंद तिवारी ने सृजन मामले को लेकर सीबीआई की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाया

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बिहार : शिवानंद तिवारी का सवाल, जब सरकार ही कटघरे में तो उसकी जांच एजेंसी पर कैसे भरोसा करें?

आरजेडी के नेता शिवानंद तिवारी (फाइल फोटो).

खास बातें

  1. कहा सीबीआई का इस्तेमाल कठपुतली की तरह किया जा रहा
  2. जांच के नाम पर सीबीआई लीपापोती कर रही है
  3. सृजन सुशासन के मुंह पर तमाचा है
नई दिल्ली:

बिहार के मुजफ्फरपुर के बालिका आश्रम के रेप केस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी गई है. इसके बाद इसके औचित्य पर सवाल उठाए जा रहे हैं. इसी क्रम में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद शिवानंद तिवारी ने भी सीबीआई की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाया है. उन्होंने कहा है कि सीबीआई को एक ईमानदार जांच एजेंसी के रूप में मान्यता मिली हुई है लेकिन इसका इस्तेमाल कठपुतली की तरह किया जा रहा है. शिवानंद तिवारी ने 'फेसबुक' पर एक पोस्ट में यह बात लिखी है.     

शिवानंद तिवारी ने लिखा है कि सीबीआई मजबूरी बन गई है. जब राज्य सरकार ही आरोप के कटघरे में हो तो उसकी जांच एजेंसी पर कैसे कोई भरोसा करे? तब किस जांच एजेंसी से जांच की मांग की जाए! सीबीआई भरोसेमंद है यह हम या कोई कैसे कह सकता है! मजबूरी हो गई है सीबीआई. इसी मजबूरी में हम सीबीआई जांच की मांग करते हैं. सृजन घोटाला की जांच प्रत्यक्ष है. साल भर से ऊपर हो गया सीबीआई को जांच करते. क्या हो रहा है इसका अता-पता नहीं है. नीतीश कुमार की पार्टी के लोगों ने भागलपुर के तत्कालीन कलक्टर केपी रम्मैया के एक आदेश की फोटो कॉपी जारी की थी. उसके जरिए रम्मैया ने तमाम विकास पदाधिकारियों को निर्देशित किया था कि वे विभागीय राशि को सृजन में जमा करें. पहली नज़र में कोई भी यह कहेगा कि जांचकर्ता को सबसे पहले केपी रम्मैया से पूछताछ करनी चाहिए. लेकिन अभी तक सीबीआई, सृजन के करता-धरता जो इसके मुख्य अभियुक्त हैं उन तक भी नहीं पहुंच पाई है.

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तिवारी ने कहा है कि सीबीआई की जांच की मांग हम लोगों ने उठाई थी. अब कोई कहे कि राजद को सृजन मामले में सीबीआई की जांच पर उंगली उठाने का अधिकार नहीं है, यह हम कैसे मान सकते हैं! हम तो कहेंगे कि जांच के नाम पर सीबीआई जो लीपापोती कर रही है वह नीतीश कुमार और सुशील मोदी के लिए भी चिंता का कारण होना चाहिए. सृजन तो सुशासन के मुंह पर तमाचा है. बिहार वित्तीय व्यवस्था को चुनौती है. चुनौती देने वाले और सुशासन को ठेंगा दिखाने वाले पकड़ में आएं उनको सजा मिले यह तो सरकार के लिए भी चिंता का विषय होना चाहिए. सरकार का मौन स्वत: प्रमाणित करता है कि सीबीआई की लीपापोती मुख्यमंत्री और वित्तमंत्री के लिए अनुकूल है. 

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आरजेडी नेता का कहना है कि लालू परिवार को रेलवे के एक मामले में अदालत का समन मिला है. मामला लालू जी के रेलमंत्री के रूप में कार्यकाल से जुड़ा हुआ है. लालू जी को अदालत बुलाए, जानकारी हासिल करे यह बात तो कुछ हद तक समझ में आ सकती है. लेकिन तेजस्वी या राबड़ी जी को रेल के किसी मामले में जोड़ना किसी के भी समझ के बाहर है. लेकिन हम जानते हैं कि लालू परिवार को अभी और झेलना है. तेजस्वी कैसे घेरे में आएं और कैसे इस उदीयमान चुनौती का 'वध' कर दिया जाए इसके लिए रतजगा होता होगा. रेलवे घोटाला का एक जाल फेंका गया है. किसी के भी मन में यह सवाल उठेगा कि दस-बारह साल पुराने रेलवे के इस मामले से तेजस्वी का क्या संबंध हो सकता है! यह तो वह काल है जब तेजस्वी की चर्चा क्रिकेट के एक खिलाड़ी के रूप में होती थी. सियासत भी करनी होगी यह संभवत: ख़्याल में भी नहीं होगा. लेकिन दिल्ली की सत्ता तेजस्वी को एक चुनौती के रूप में देख रही है. 2019 के लोकसभा चुनाव में जीत के लिए बिहार और उत्तर प्रदेश में 2014 का नतीजा दुहराना ज़रूरी है. इस रास्ते में तेजस्वी एक मज़बूत अवरोध हैं. इसलिए उनका हिसाब-किताब लगाने का उपाय किया गया है. 

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शिवानंद तिवारी ने लिखा है कि,  कहा जा रहा है कि सीबीआई जो कर रही है उस पर राजद अपना मुंह नहीं खोल सकता है, क्योंकि सीबीआई जांच की मांग कर हमने उसको एक ईमानदार जांच एजेंसी के रूप में मान्यता दे दी है. हम सीबीआई पर सवाल नहीं उठा रहे हैं. हम तो सीबीआई को कठपुतली की तरह इस्तेमाल करने वाले पर सवाल उठा रहे हैं, जो सृजन मामले में सीबीआई से लीपापोती कराकर नीतीश कुमार ओर सुशील मोदी को बचा रहे हैं और रेल के झूठे मामले में तेजस्वी को फंसा रहे हैं. लेकिन उनकी दाल गलने वाली नहीं है. 2019 के लोकसभा चुनाव में सामाजिक न्याय की जनता इस साज़िश का मज़बूत जवाब देगी.


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