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दो साल पहले पीएम मोदी के लिए चुनौती बने रहे नीतीश कुमार अब उन्हीं की कृपा पर निर्भर

बिहार में बीजेपी-जेडीयू गठबंधन सरकार के दो साल, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कितना खोया-कितना पाया

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दो साल पहले पीएम मोदी के लिए चुनौती बने रहे नीतीश कुमार अब उन्हीं की कृपा पर निर्भर

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो).

खास बातें

  1. दो साल पहले पीएम पद के दावेदार माने जा रहे थे नीतीश कुमार
  2. गठबंधन करने के बाद मोदी सरकार ने नहीं दी अपेक्षित मदद
  3. राजद से गठबंधन के दौर के मुकाबले अब अधिक मजबूत हैं नीतीश
पटना:

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का वर्तमान कार्यकाल इसलिए देश के राजनीतिक इतिहास में महत्वपूर्ण माना जाएगा कि उन्होंने जिस दल के साथ मिलकर विरोधी दल को पराजित किया उसी दल के साथ डेढ़ साल में फिर सरकार भी बनाई. दूसरी तरफ चुनाव में सहयोगी रहे दल को विपक्ष में बैठने पर मजबूर किया. शनिवार को बीजेपी के साथ नीतीश कुमार का दो वर्षों का कार्यकाल पूरा हो जाएगा. इन दो वर्षों में राजनीतिक रूप से नीतीश को हुए हानि-लाभ का यदि हिसाब करें तो वे नुकसान में जाते दिखाई देते हैं. दो साल पहले नीतीश कुमार को गैर एनडीए दलों में बहुत मजबूत नेता माना जाता था. यहां तक कि उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए भी प्रबल दावेदार माना जाता था. पीएम नरेंद्र मोदी के लिए चुनौती बने रहने वाले नीतीश कुमार आज उन्हीं के रहमोकरम पर बिहार की सत्ता की नैया खेते नजर आ रहे हैं.  

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जानते हैं कि दो साल में इस सरकार की उपलब्धियां और कमजोरियां क्या-क्या रहीं-

1. सबसे बड़ी उपलब्धि अगर कोई एक मानी जाए तो वह यह है कि बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की शासन के मुखिया के रूप में छवि फिर से कायम हुई है. राजद के साथ बीते शासनकाल में उनका प्रभाव  कमजोर हुआ था. राजद अध्यक्ष लालू यादव के समानांतर सरकार चलाने और उनकी हस्तक्षेप करने की आदत के कारण सचिवालय से ब्लॉक तक अधिकारियों और कर्मचारियों में असमंजस  की स्थिति बनी रहती थी.

2. मंत्रियों में अब विभाग के काम के प्रति गंभीरता दिखती है. हर मंत्री अपने विभाग के प्रति जवाबदेह है. जिसका नितांत अभाव राजद के साथ शासन काल में देखने को मिलता था. उस समय लालू यादव ने अपने दोनों बेटों तेजप्रताप और तेजस्वी के खाते में अधिकांश विभाग ले लिए थे और विभागों की फाइलों का निष्पादन लालू यादव की आंखों के सामने घर से होता था. आलम यह था कि स्वास्थ्य विभाग का ज़िम्मा तेज प्रताप यादव के पास था जो कभी कृष्ण तो कभी शिव लीला में व्यस्त रहते थे. उनकी हरकतों के कारण सरकार हमेशा सुर्खियों में रहती थी.

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3. सबसे बड़ी बात है कि गठबंधन के नाम पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अब किसी अधिकारी के ट्रांसफर या पोस्टिंग में अपने निर्णय के लिए सहयोगी की सहमति नहीं लेना होती. उनका निर्णय सबको मान्य होता है. इसका यह मतलब नहीं है कि बीजेपी के जो मंत्री हैं वे अपने मन मुताबिक अधिकारियों के ट्रांसफर या पोस्टिंग नहीं करा सकते, लेकिन वे इसके लिए अब मुख्यमंत्री से आग्रह करते हैं. जबकि लालू यादव अधिकारियों, जिनमें अधिकांश दागी होते थे, की अपने मनमुताबिक पोस्टिंग कराने को अपना अधिकार समझते थे.

4. जब विधानसभा सत्र चलता है तो अब हर विभाग के मंत्री अपने संबंधित विभाग के सवालों का कुछ जवाब देते हैं. जबकि महागठबंधन की सरकार में कई विभागों के मंत्री तेजप्रताप यादव के लिए किसी न किसी को अधिकृत किया जाता था कि वे सदन में उनके विभाग के सवालों का जवाब दें. ख़ुद तेजप्रताप घर में बैठकर दोस्तों के साथ बांसुरी बजाते थे. इसके कारण सरकार की काफ़ी किरकिरी होती थी.

5. केन्द्र और बिहार में एक ही गठबंधन की सरकार होने के कारण कई मामलों में अब जल्दी रिजल्ट देखने को मिलता है. कई विकास परियोजनाएं पर काम शुरू हो गया है और बहुत सारी नई परियोजनाएं भी राज्य के आग्रह पर शुरू की गई हैं. जैसे पटना में मेट्रो रेल परियोजना, दरभंगा एयरपोर्ट का निर्माण कार्य, भागलपुर में विक्रमशिला सेतु के समानांतर नए सेतु के निर्माण कार्य को मंज़ूरी आदि.

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पर जहां तक इन उपलब्धियों के अलावा दूसरे पहलू, यानी विफलता का प्रश्न है तो इसके भी कई उदाहरण देखने को मिल रहे हैं.

1. जब भी मौका मिला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को राजनीतिक रूप से उनका कद छोटा करने का कोई अवसर नहीं गंवाया. इसका सबसे पहला उदाहरण पटना विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में देखने को मिला था जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बार-बार गुहार करने के बावजूद पटना विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देने की अपील को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसी मंच से सार्वजनिक रूप से खारिज कर दिया था. इसके अलावा उन्होंने वहां जो भी घोषणा, की आज तक उस पर अमल नहीं हो पाया है.

2. लोकसभा चुनावों के बाद जब केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह देने की बात आई तो नीतीश कुमार के आनुपातिक प्रतिनिधित्व देने की मांग को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खारिज कर दिया और दो टूक शब्दों में उन्हें अन्य सहयोगियों की तरह कैबिनेट में एक पद लेने का ऑफर दिया. जबकि इसी लोकसभा चुनाव के दौरान गठबंधन धर्म का निर्वाह करते हुए नीतीश कुमार ने अपना मैनिफेस्टो तक रिलीज़ नहीं किया.  विवादास्पद मुद्दों पर पत्रकार उनसे सवाल पूछेंगे और जवाब से कोई गलत संदेश न चला जाए, इसके लिए नीतीश कुमार ने मीडिया से दूरी भी बनाए रखी. इसके बावजूद जब बिहार में 40 सीटें मिलीं, लेकिन तब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीतीश कुमार की बातों को अनसुना कर दिया.

3. जहां तक डबल इंजन की सरकार का दावा किया जाता है तो वह अब तक खोखला ही साबित हुआ है. जब भी बिहार को कुछ विशेष मदद की आवश्यकता होती है तो केंद्र सरकार अपना हाथ पीछे कर लेती है. इसके दो ज्वलंत उदाहरण हैं. 2017 में जब बाढ़ आई तो बिहार सरकार ने जमकर बाढ़ पीड़ितों के बीच राहत काम चलाया. तब केंद्र की तरफ़ से आर्थिक मदद की बात आई तो लेकिन जो राशि दी गई वह इतनी कम थी कि कोई इसके बारे में बात नहीं करना चाहता. दूसरा जब इस वर्ष बिहार में चमकी बुखार से बच्चों की मौत हुई तब यह बात खुलकर सामने आई कि केंद्र सरकार ने पांच वर्ष पूर्व जो बिहार से वादा किया था कि मुज़फ़्फ़रपुर में बच्चों के लिए आईसीयू का निर्माण कराएगी, उसे पूरा करने की कभी ज़रूरत नहीं समझी. ऐसे ही पांच वर्ष पूर्व वित्त मंत्री ने बिहार में एक और एम्स के निर्माण की घोषणा की जिसका आज तक शिलान्यास नहीं हो पाया है, क्योंकि वह कहां बनेगा, इस पर माथापच्ची जारी है.

4. बिहार में नीतीश कुमार ने लालू यादव से भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर अपना संबंध तोड़ा था, लेकिन सच्चाई यही है कि वह चाहे तेजस्वी यादव और लालू यादव हों या उनके परिवार के अन्य लोग, उनके खिलाफ़ घोटालों के मामले में आज तक चार्जशीट से आगे बात नहीं बन पाई है. दूसरी बात भ्रष्टाचार पर नीतीश और बीजेपी भी गंभीर है. इसका अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि सरकार बनने के तुरंत बाद 2017 में एक सृजन  घोटाला सामने आया था जिसकी जांच नीतीश कुमार ने तुरंत CBI को दे दी थी. लेकिन इस घोटाले में कई BJP नेताओं और जनता दल यूनाइटेड के भी कुछ नेताओं के नाम सामने आए और शायद आज देश में यह पहला घोटाला है जिसमें CBI ने करीब एक दर्जन चार्जशीट दायर कर दी हैं. लेकिन इस घोटाले के मुख्य अभियुक्त प्रिया और अमित की आज तक गिरफ़्तारी नहीं हो पाई है. जबकि वे देश में ही हैं. आख़िर इन अभियुक्तों को गिरफ़्तार न करने के पीछे CBI की क्या मजबूरी है, समझ से बाहर है. जैसे राजद शासन काल में अधिकांश मंत्री बिना पैसे लिए काम नहीं करते थे वैसे ही भाजपा के साथ इस बार के सुशासन में भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे तक व्याप्त हैं. ईमानदार मंत्रियों की संख्या पांच से ज़्यादा नहीं है.

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5. जब नीतीश कुमार भाजपा के साथ वापस गए एक उम्मीद जगी थी कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिल सकता है लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो हमेशा अपनी हर सभा में बोलते रहे हैं कि जब तक बिहार जैसे राज्य विकसित राज्यों की श्रेणी में नहीं आएंगे तब तक देश का विकास सही मायनों में नहीं माना जाएगा, लेकिन अभी तक केंद्र की तरफ़ से ऐसी कोई इच्छाशक्ति नहीं दिखी जिससे लगे कि बिहार में डबल इंजिन की सरकार सफल है. दूसरी तरफ़ बिहार में अब मॉब लिंचिंग या सांप्रदायिक तनाव के कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिसमें BJP या RSS से संबंधित संगठनों के लोगों की सक्रिय भूमिका थी. ऐसा पहली बार देखने को मिला जब सरकार में सहयोगी सरकार के लिए मुश्किल बढ़ा रहा है.

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