नागरिकता कानून के बाद एनपीआर पर नीतीश कुमार के समर्थन का क्या है मतलब?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नागरिकता कानून के बाद राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर को भी समर्थन, केंद्र की मोदी सरकार के साथ हैं सीएम

नागरिकता कानून के बाद एनपीआर पर नीतीश कुमार के समर्थन का क्या है मतलब?

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी (फाइल फोटो).

खास बातें

  • जनवरी के तीसरे हफ़्ते तक इन मुद्दों पर कुछ बोलने से इनकार नीतीश का इनकार
  • जेडीयू नेता पवन वर्मा ने नीतीश से स्थिति साफ करने का आग्रह किया था
  • भाजपा से चुनावी वर्ष में किसी मुद्दे पर विवाद नहीं चाहते नीतीश
पटना:

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नागरिकता कानून के बाद राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर पर भी केंद्र सरकार के साथ हैं. नीतीश कुमार ने पिछले महीने ही जनसंख्या के साथ-साथ एनपीआर का काम इस साल मई में शुरू कर जून महीने तक खत्म करने की अधिसूचना भी जारी कर दी थी. अधिसूचना की कॉपी उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने राज्य के उद्योग मंत्री और जनता दल यूनाइटेड के वरिष्ठ नेता श्याम रजक की आपत्ति के बाद मीडिया के लिए जारी की. उनके संवाददाता सम्मेलन के बाद रजक ने कहा था कि ऐसा कोई फैसला अभी नहीं हुआ है. लेकिन इस गजट अधिसूचना से एक बात साफ हो गई कि सब कुछ नीतीश कुमार की सहमति से हुआ है.

यह सब कुछ रविवार को हुआ जब पार्टी के एक वरिष्ठ नेता पवन वर्मा ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र लिखकर नागरिकता कानून, जनसंख्या रजिस्टर और एनआरसी पर स्थिति साफ़ करने के लिए आग्रह किया था. नीतीश फ़िलहाल इस महीने के तीसरे हफ़्ते तक इन मुद्दों पर कुछ बोलने से इनकार कर चुके हैं.

नीतीश कुमार के दो नजदीकी सिपाहसलार लोकसभा में संसदीय दल के नेता ललन सिंह और राज्यसभा में संसदीय दल के नेता आरसीपी सिंह क़रीब-क़रीब हर दिन नागरिकता क़ानून और एनआरसी पर भाजपा के सुर में सुर मिलाकर कहते हैं कि विपक्ष ने जनता में भ्रम फैलाया है, वे अपने कार्यकर्ताओं से सावधान रहने की अपील करते हैं. लेकिन इन दोनों नेताओं के बोलने की अहमियत इसलिए है कि नीतीश के करीबी होने के साथ-साथ उनके साथ विचार विमर्श के निष्कर्ष को ही जनता में बोलते हैं. इसके पीछे नीतीश कुमार की रणनीति साफ है कि वे भाजपा से चुनावी वर्ष में किसी मुद्दे पर विवाद नहीं चाहते. उनका लक्ष्य है कि सीटों के बंटवारे में लोकसभा चुनाव की तरह बराबर-बराबर पर समझौता न हो बल्कि अधिक सीटें चाहिए. इसके लिए भाजपा के साथ रहना, दिखना आवश्यक है.

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इसलिए जब वे कार्यकर्ता सम्मेलन में इन मुद्दों पर बोलेंगे तब हर विषय की बारीकियों को समझने के बबजूद उनका स्टैंड भाजपा और केंद्र सरकर के समर्थन में होगा. नीतीश को मालूम है कि अगर उन्होंने इन मुद्दों पर पंगा अगर ले भी लिया तो मुस्लिम मतदाताओं का उनके प्रति रुख वोट में तब्दील होगा, कोई गारंटी नहीं दे सकता. दूसरा जो लोग सिद्धांत की दुहाई दे रहे हैं वे सत्ता के बाहर के लोग हैं और सत्ता में सिद्धांतों से समझौता आम बात है.

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