लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव के खिलाफ केस हुआ दर्ज

ये मामला भाजपा के विधान पार्षद सूरजनन्दन प्रसाद ने पटना के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के अदालत में लोक प्रतिनिधिव अधिनियम के तहत दर्ज करवाया है.

लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव के खिलाफ केस हुआ दर्ज

तेज प्रताप यादव.

पटना:

लालू यादव और उनके परिवार के ग्रह नक्षत्र इन दिनों ठीक नहीं चल रहे. परिवार का शायद ही कोई सदस्य हो जिसपर कोई मामला, जाँच या मुक़दमा नहीं चल रहा हो. ताज़ा घटनाक्रम में लालू यादव के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव पर ग़लत शपथ पत्र देने के आरोप में कोर्ट में मुक़दमा दर्ज हुआ हैं. ये मामला भाजपा के विधान पार्षद सूरजनन्दन प्रसाद ने पटना के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के अदालत में लोक प्रतिनिधिव अधिनियम के तहत दर्ज करवाया है.

सूरज नन्दन प्रसाद की शिकायत है कि तेजप्रताप यादव द्वारा बिहार के औरंगाबाद में 53 लाख का भुगतान कर 45 डेसीमल ज़मीन ख़रीदी गयी. लेकिन उनके चुनाव शपथ पत्र में इसका कोई ज़िक्र नहीं हैं. तेजप्रताप यादव बिहार के महुआ विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए और नीतीश कुमार मंत्रिमंडल में राज्य के स्वास्थ्य समेत अन्य विभाग जैसे वन के भी मंत्री थे. विधायक बनने के पहले औरंगाबाद में उन्होंने एक मोटरसाइकिल का शोरूम खोला जो अभी भी चल रहा है. याचिका दायर करने वाले सूरज नन्दन प्रसाद का आरोप है कि जानबूझकर संपत्ति के ब्योरे को छिपाना चुनाव आयोग के नियम का उल्लंघन और लोक प्रतिनिधि कानून की धारा 125 का भी साफ़ उल्लंघन है. इस नियम के तहत दोषी पाए जाने पर सात साल की सज़ा का भी प्रावधान है.

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हालांकि इससे पहले पटना में तेजप्रताप यादव के नाम से आवंटित एक पेट्रोल पम्प भी ग़लत शपथपत्र देने के आरोप पर रद कर दिया गया. तेजप्रताप अपने बड़बोलेपन के कारण जाने जाते हैं. लेकिन पहली बार उनपर राजनीतिक विरोधियों के द्वारा मुक़दमा हुआ है. इस मामले पर सम्पर्क करने पर हालाँकि तेजप्रताप ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन उनके समर्थकों का कहना है कि ये साज़िश के तहत की गई कार्रवाई है और न्यायालय में तथ्यों को रखा जाएगा. अपने मंत्रिकाल में तेजप्रताप यादव अधिकांश समय विभाग से नदारद रहने के कारण चर्चा में रहते थे.
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कई बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को स्वास्थ्य विभाग के कार्यक्रम को इसलिए स्थगित करना पड़ा था क्योंकि तेजप्रताप किसी ना किस बहाने से नदारद हो जाते थे. विधानसभा में उनके विभाग के सवालों का जवाब भी कोई दूसरे मंत्री को देना पड़ता था.

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