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कैसे अरुण जेटली ने बिहार में लालू-राबड़ी युग का अंत किया और नीतीश कुमार को सीएम बनाने में अहम भूमिका निभाई

अरुण जेटली नहीं रहे, शायद बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि अगर वह ना होते तो ना चारा घोटाले की सीबीआई जांच हो पाती और ना लालू यादव जेल जाते.

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कैसे अरुण जेटली ने बिहार में लालू-राबड़ी युग का अंत किया और नीतीश कुमार को सीएम बनाने में अहम भूमिका निभाई
पटना:

अरुण जेटली नहीं रहे, शायद बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि अगर वह ना होते तो ना चारा घोटाले की सीबीआई जांच हो पाती और ना लालू यादव जेल जाते. इसके अलावा उन्होंने नीतीश कुमार को भी मुख्यमंत्री बनाने में एक अहम भूमिका अदा की थी, जिसका ढिंढोरा उन्होंने कभी नहीं पीटा.अरुण जेटली, 70 के दशक से छात्र आंदोलन में सक्रिय रहने के कारण बिहार के अधिकांश गैर बीजेपी दल खासकर समाजवादी आंदोलन से ज़ुडे नेताओं को बखूबी पहचानते थे. 

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बिहार की राजनीति में अरुण जेटली की असल भूमिका चारा घोटाले के दौर से सक्रिय रूप में शुरू हुई. उस समय पटना हाईकोर्ट में जो याचिका सुशील मोदी, सरयू राय, शिवानंद तिवारी और लल्लन सिंह ने दायर की थी, जिसमें रविशंकर प्रसाद ने बहस कर ख्याति बटोरी थी. उस याचिका को ड्राफ़्ट करने से लेकर दायर करने तक अरुण जेटली की भूमिका अहम थी. पटना हाईकोर्ट से सीबीआई जांच के आदेश के बाद जब बिहार सरकार सर्वोच्च न्यायालय गई तब देश के सारे टॉप वकीलों को अपनी पैरवी के लिए एंगेज किया था.और याचिका करने वालों की तरफ़ से अरुण जेटली और जॉर्ज फर्नांडिज (तब समता पार्टी के अध्यक्ष ) के कारण शांति भूषण ने बहस की थी और सीबीआई जांच के फैसले पर आख़िरकार सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी मुहर लगाई साथ ही पटना हाई कोर्ट की मॉनिटरिंग का भी आदेश हुआ था. 

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ये एक ऐसा मामला है जहां सीबीआई ने 90 प्रतिशत से अधिक अभियुक्तों को सजा दिलाने में कामयाबी पाई और आज भी लालू यादव जेल में हैं. लेकिन जब जांच चल रही थी तब भी कई बार ये मामला सर्वोच्च न्यायालय की चौखट तक पहुंचा. हर बार अरुण जेटली ने या तो खुद बहस की या बहस करने के लिए कोई अन्य वक़ील करने की सलाह दी.तमाम राजनीतिक शक्ति के बावजूद चारा घोटाले में आज जेल में सज़ा काट रहे हैं और इस पूरे मामले में अरुण जेटली की भूमिका एक चाणक्य की रही.  चारा घोटाले की वजह लालू यादव कमज़ोर तो हुए लेकिन सत्ता में राबड़ी देवी का दौर बरकरार रहा. इसी समय अरुण जेटली को बिहार बीजेपी का प्रभारी बनाया गया. आप कह सकते हैं कि इसी के साथ बिहार की सत्ता से लालू राज का असल उल्टी गिनती शुरू हो गई.  

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2004 के लोकसभा चुनावों में एनडीए गठबंधन को मात्र 11 सीटों पर जीत मिली और नीतीश कुमार अपनी पुरानी सीट से चुनाव हार गए. केंद्र में यूपीए की सरकार बनी और लालू यादव को रेल मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली. इस हार से एनडीए गठबंधन हतोत्साहित था और 2005 के विधानसभा चुनावों में राबड़ी देवी का वापस आना तय माना जा रहा था. लेकिन लालू-पासवान में सर फ़ुटव्वल के कारण परिणाम त्रिशंकु रहे. आखिरकार बिहार में पहली बार विधान सभा का सत्र आहुत हुए बिना राष्ट्रपति शासन लगा. अरुण जेटली ने  एक चतुर रणनीतिकार की तरह ये भांपने में बिलकुल भी गलती नहीं की कि बिहार के लोग राबड़ी देवी से छुटकारा चाहते हैं और एनडीए की ओर से भी बिहार की जनता एक वैकल्पिक चेहरा चाहती है. 

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जहां नीतीश कुमार की रेटिंग रेल मंत्री  रूप में उनके द्वारा किए गए कामों के कारण अन्य नेताओं से कहीं अधिक थी. चुनाव परिणाम के एक महीने के अंदर लोक जनशक्ति पार्टी विधायक दल को तोड़ने का अभियान चला जिसमें बहु हद तक अरुण जेटली और बीजेपी के लोगों ने सक्रिय भूमिका अदा की. हालांकि केंद्र में लालू यादव के दबाव के कारण मध्यरात्रि में कैबिनेट की बैठक बुलाकर विधानसभा को भंग करके बिहार में राष्ट्रपति शासन लगाया गया. (जिसके बारे में लालू यादव आज तक मानते हैं कि उनके राजनीतिक जीवन की एक बड़ी भूल रही)  इस फैसले का फ़ायदा उठाते हुए जहां अरुण जेटली ने एक ओर सुप्रीम में कैबिनेट के फैसले के खिलाफ याचिका दायर की तो वहीं दूसरी ओर आगामी छह महीनों में होने वाले चुनाव की तैयारी में भी लग गए. 

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जब उन्हें इस बात का अंदाज़ा हो गया की समता पार्टी में गुटबाज़ी के कारण पार्टी का एक धड़ा नीतीश कुमार को नेता नहीं मानेगा तब उन्होंने प्रमोद महाजन को विश्वास में लेकर बिहार इकाई के नेताओं की नाराज़गी झेलते हुए नीतीश कुमार एनडीए का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करवाया दिया. फिर नीतीश कुमार को पूरे बिहार में न्याय यात्रा पर निकलने की सलाह भी दी. अक्टूबर नवंबर के चुनाव में जेटली ने खुद पटना में चुनाव प्रचार किया और आख़िरकार लालू राबड़ी युग का समापन हो गया. बहुमत नीतीश कुमार को मिला और तब से आज तक नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री (कुछ महीनों को छोड़कर) बने हुए हैं. 

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जानकारों की मानें तो न केवल नीतीश कुमार को सीएम बनाने बल्कि सुशील मोदी को उप-मुख्यमंत्री बनाने का मूल आइडिया भी अरुण जेटली का ही रहा. बिहार के NDA गठबंधन में जब भी कोई गंभीर संकट हुआ (जैसे कि 2010 के विधानसभा चुनावों के कुछ महीनों पहले जब नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए एक विज्ञापन के आधार पर डिनर कैंसिल किया था उसके बाद गठबंधन टूट की ओर बढ़ रहा था) अरुण जेटली ने ही कमान संभाली. शायद इसीलिए बीजेपी के सभी नेता मानते हैं कि अरुण जेटली की भूमिका पार्टी में एक संकट मोचक की रही. 

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अरुण जेटली के इन तमाम कार्यों के बावजूद धुर विरोधी लालू यादव ने उनके खिलाफ कभी कटु शब्द नहीं बोले. इसका कारण यह है कि जेटली के सभी के साथ व्यक्तिगत संबंध मधुर थे. इसके बाद जब जेटली क्रिकेट की राजनीति में सक्रिय हुए तो लालू यादव (जो बिहार क्रिकेट असोसीएशन के अध्यक्ष थे)  वही करते थे जो जेटली उनसे चाहते थे. यह बात किसी से छिपी नहीं है.  2015 के चुनाव में मिली हार के बाद जेटली को इस बात का अंदाज़ा हो गया कि नीतीश के बिना किसी की सरकार नहीं बन सकती. तब लालू यादव ने अपने मामले की पैरवी में उनसे मिलने के बहाने अपने साथ गये प्रेम गुप्ता के मुंह से कुछ ऐसी बातें कहलवा दी जिसके बारे में नीतीश कुमार को जानकारी मिलते ही महागठबंधन के सरकार के पतन की नींव पड़ गई.  

Video: अरुण जेटली के साथ चलते-चलते (Aired: January 2015)



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