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क्या केंद्रीय मंत्रिमंडल में बिहार के सामाजिक समीकरण को नजरअंदाज किया गया?

एक दलित रामविलास पासवान और पिछड़ी यादव जाति से नित्यानंद राय को छोड़कर बाक़ी सभी ऊंची जातियों के मंत्री

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क्या केंद्रीय मंत्रिमंडल में बिहार के सामाजिक समीकरण को नजरअंदाज किया गया?

प्रतीकात्मक फोटो.

पटना:

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को अपने मंत्रिमंडल में बिहार से छह सांसदों को शामिल किया इनमें से अधिकांश या कहिए बिहार बीजेपी के अध्यक्ष नित्यानंद राय को छोड़कर सभी पुराने चेहरे हैं. लेकिन वह चाहे BJP के नेता हों या उनके सहयोगी दलों के, खासकर JDU के नेता, सभी का मानना है कि जिन नामों का चयन किया गया उससें एक बात साफ़ है कि शायद बिहार के सामाजिक संतुलन या कहिए जिन लोगों ने NDA को जमकर वोट दिया शायद उन्हें नज़रअंदाज़ किया गया है.

बिहार से मंत्रिमंडल में BJP के कोटे से रविशंकर प्रसाद, गिरिराज सिंह को जहां कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला वहीं राजकुमार सिंह को स्वतंत्र प्रभार और अश्वनी चौबे और नित्यानंद राय को राज्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई. .हालांकि यह नाम पहले से संभावित थे. इसके अलावा सहयोगी दलों लोक जनशक्ति पार्टी से उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष राम विलास पासवान को एक बार फिर कैबिनेट मंत्री के रूप में शामिल किया गया है.

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अगर आप सामाजिक समीकरण को देखें तो BJP के नेता भी मानते हैं कि एक दलित रामविलास पासवान और पिछड़ी यादव जाति से नित्यानंद राय को छोड़कर बाक़ी सभी ऊंची जाति से आते हैं. रविशंकर प्रसाद हों या गिरिराज सिंह या अश्वनी चौबे या राजकुमार सिंह, सभी अगड़ी जाति से हैं. इसका मतलब यह हुआ कि गैर यादव पिछड़ी जाति से या अति पिछड़ी जाति से एक भी संसद को जगह नहीं मिली. BJP के नेता हालांकि सफ़ाई देते हैं कि उनका आकलन था कि जनता दल यूनाईटेड की तरफ से जो भी नाम आएगा वो गैर यादव पिछड़ी जातियां या अति पिछड़ी जाति से होगा.

लेकिन उनका भी मानना हैं कि BJP का 80% केंद्रीय मंत्री मंडल में अगड़ी जाति के लोगों को प्रतिनिधिव जोखिम भरा है. इन नेताओं का यह भी मानना है कि इस तरीक़े के नाम और जातिगत समीकरण लेकर बिहार में भविष्य में चुनाव में जाना काफ़ी मुश्किल भरा हो सकता है. इसलिए अब उनकी सारी उम्मीदें इस बात पर टिकी होंगी कि मंत्रिमंडल में जगह को लेकर जनता दल यूनाईटेड से या तो गतिरोध ख़त्म हो या कैबिनेट के अगले विस्तार में उन जातियों के सांसदों को मौका मिले जिनके कारण बिहार में एनडीए रिकॉर्ड 39 सीटें जीतने में पहली बार क़ामयाब हुआ है.

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