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नोटबंदी के खिलाफ काला दिवस का ऐलान तो कर दिया, मगर पटना की सड़कों पर नहीं दिखे लालू और तेजस्वी

एनडीए को छोड़कर कमोवेश सारी विपक्षी पार्टियां नोटबंदी के एक साल पूरा होने पर इस दिन को काला दिवस के तौर पर मना रही हैं.

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नोटबंदी के खिलाफ काला दिवस का ऐलान तो कर दिया, मगर पटना की सड़कों पर नहीं दिखे लालू और तेजस्वी

लालू यादव और तेजस्वी यादव ( फाइल फोटो)

पटना: एनडीए को छोड़कर कमोवेश सारी विपक्षी पार्टियां नोटबंदी के एक साल पूरा होने पर इस दिन को काला दिवस के तौर पर मना रही हैं. कांग्रेस, आरजेडी के साथ-साथ वामदल भी नोटबंदी का विरोध कर रहे हैं, मगर समान मुद्दे पर भी इनमें बिखराव सरेआम है. बिहार के प्रमुख विपक्षी दल राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के नोटबंदी के एक साल बीतने पर काला दिवस मनाने के पुरजोर ऐलान के बाद लालू और उनके बेटे ने खुद ही इस विरोध की हवा निकाल दी.

काला दिवस पर पटना की सड़को पर जहां विपक्षी पार्टियों के आंदोलन अलग-थलग दिखाई दे रहे थे, वहीं लालू प्रसाद पटना छोड़कर हाजीपुर में जनसभा कर रहे थे . इतना ही नहीं, बिहार विधानसभा विपक्ष के नेता और पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव दिल्ली जाने की तैयारी में दिखे.

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हालांकि, हाजीपुर पहुंचे लालू के निशाने पर नरेंद्र मोदी और रविशंकर प्रसाद थे. लालू ने कहा कि अगर आज मैं नरेंद्र मोदी को बोलूं कि हम आपके खिलाफ अब नहीं बोलेंगे तो मोदी बोलेंगे लालू महान हैं लेकिन हम सिद्धान्त से समझौता नहीं करेंगे. लालू यादव ने कहा कि 'रविशंकर ने बोला है कि नोटबंदी से देह व्यापार में कमी आई है, हो सकता है उसमें जीएसटी ज़्यादा लगता हो. अंत में कहा कि ये सब आसाराम और राम रहीम के समर्थक हैं. कुछ साधुओं को छोड़कर सब वैसे ही हैं, इन साधुओं का बधिया (नसबंदी) करना होगा.'

VIDEO - सीबीआई पहुंचे तेजस्वी यादव



आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद ने कहा है कि नोटबंदी से देश मे इमरजेंसी जैसे हालात बने. बिना पूर्व तैयारी के लिए गए इस फैसले से लोगों को जरूरी काम छोड़कर महीनों कतारों में खड़ा होना पड़ा. किसान, मजदूर, गरीब सबों ने नोटबन्दी की मार झेली है. महिलाओं की जमापूंजी कागज के ढेर बनकर रह गए और सरकार तमाशा देखती रही.

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दूसरी ओर कांग्रेस और वाम दल के नेता भी काला दिवस मना रहे थे, मगर इन लोगों का कोई साझा कार्यक्रम पटना में नहीं दिखाई दिया. हालांकि, पटना की सड़कों पर आंदोलन तो जरूर दिखे, मगर सब अलग-थलग थे. कांग्रेस नेता प्रेमचंद्र मिश्रा बताते हैं कि नोटबन्दी के तुगलकी फैसले से 150 लोगों को देश भर में अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. नए नोटों की छपाई का बोझ देश की अर्थव्यवस्था के साथ ही विकास दर भी पड़ा है.


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