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अब होगा असली सियासी दंगल? BJP-JDU में 50-50 फॉर्मूले से बिहार NDA में मच सकता है 'घमासान'

आगामी लोकसभा चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी और नीतीश कुमार की अगुआई वाली जनता दल यूनाइटेड ने वह समीकरण सुलझा लिये हैं, जिसे लेकर बीते काफी समय से दोनों के बीच मौखिक गहमागहमी चल रही थी.

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अब होगा असली सियासी दंगल? BJP-JDU में 50-50 फॉर्मूले से बिहार NDA में मच सकता है 'घमासान'

लोकसभा चुनाव 2019 को लेकर बिहार में सियासी मंथन

खास बातें

  1. अमित शाह और नीतीश कुमार के बीच समझौता.
  2. दोनों के बीच बराबर की सीटों पर समझौता हुआ.
  3. बिहार के सियासी गलियारों में अटकलों का बाजार गर्म.
नई दिल्ली:

आगामी लोकसभा चुनाव 2019 के लिए भारतीय जनता पार्टी और नीतीश कुमार की अगुआई वाली जनता दल यूनाइटेड ने वह समीकरण सुलझा लिये हैं, जिसे लेकर बीते काफी समय से दोनों के बीच मौखिक गहमागहमी चल रही थी. भारतीय जनता पार्टी यानी बीजेपी और जदयू के बीच सीटों का 50-50 मोड में समझौता हो गया है. मगर इस समझौते ने बिहार एनडीए के अन्य घटक दलों के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी है. शुक्रवार को दिल्ली में अमित शाह से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मिले और बैठक के बाद नतीजा यह निकला कि लोकसभा चुनाव में न कोई बड़ा भाई होगा और न ही कोई छोटा. दोनों फिफ्टी-फिफ्टी के पार्टनर होंगे. हालांकि, इस समौझेते के बाद बिहार के सियासी गलियारों में अटकलों का बाजार गर्म हो गया है. चिराग पासवान का अचानक तेजस्वी यादव को फोन करना और एनडीए से नाराज बताए जा रहे उपेंद्र कुशवाहा का तेजस्वी यादव से मिलना, ये सब किसी बड़े सियासी उठापटक के संकेत दे रहे हैं. माना जा रहा है कि बीजेपी और जदयू के बीच इस समझौते से अन्य एनडीए सहयोगियों की सीटों में कटौती होगी. तब स्थिति कुछ और हो सकती है.

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दरअसल, शुक्रवार का दिन बिहार की राजनीतिक के लिहाज से काफी सियासी घटनाक्रम वाला दिन रहा. इधर दिल्ली में आगामी लोकसभा चुनाव में बराबर सीटों पर लड़ने की घोषणा बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और जेडीयू के अध्यक्ष नीतीश कुमार ने की. उधर ऐलान के कुछ समय बाद ही रालोसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और मोदी सरकार में मंत्री उपेंद्र कुशवाहा और तेजस्वी यादव की मुलाकात की खबर आई. इसके बाद तो फिर कायासों का दौर ही शुरू हो गया. 
 


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हालांकि, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और नीतीश कुमार की दिल्ली में हुई मुलाकात के बाद आए इन बयानों से लग रहा है कि कि एनडीए ने आखिरकार सीट बंटवारे में कामयाब रहा. एनडीटीवी सूत्रों के मुताबिक फिलहाल सहमति ये हुई है कि जेडीयू और बीजेपी 17-17 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी. वहीं रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा को 5 सीटें दी जाएंगी और उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी को एक सीट मिलेगी. गौर करने वाली बात है कि पिछले लोकसभा चुनाव में लोजपा को 7 सीटें मिलीं थीं. यही वजह है कि अब ऐसी उम्मीद की जा रही है कि रामविलास की पार्टी लोजपा को एनडीए में कमतर आंका जा रहा है और उसकी सीटों में कटौती कर जदयू की सीटें बढ़ाई गई हैं.

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शुक्रवार को अमित शाह और नीतीश कुमार के 50-50 के ऐलान के तुरंत बाद तेजस्वी ने एक तस्वीर ट्वीट की, जिसमें वो उपेंद्र कुशवाहा से बात करते दिखे. ऐसी ख़बर आई कि महज एक सीट मिलने से नाराज़ कुशवाहा तेजस्वी से जाकर मिले हैं और अपने लिए सुरक्षित दरवाजे तलाश रहे हैं. फिलहाल उनके तीन सांसद हैं जिनमें एक अरुण कुमार बाग़ी हो चुके हैं. हालांकि, कुशवाहा ने कुछ देर बाद इस मुलाकात पर सफ़ाई दी. जबकि तेजस्वी अब भी उम्मीद से भरे हैं कि मुलाकात हुई है तो बात आगे बढ़ेगी भी. इतना ही नहीं, सियासी गलियारों से खबर तो यह भी आई कि लोजपा नेता और सांसद चिराग पासवान ने भी तेजस्वी यादव से फोन पर बात की. मगर बाद में चिराग पासवान ने खुद इसका खंडन कर दिया. 

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गौरतलब है कि पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को बिहार की 40 में से 22 सीटें मिलीं थीं, जबकि सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) और राष्‍ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) को क्रमश: छह और तीन सीटें मिलीं थीं. तब जेडीयू को केवल दो सीटें ही मिलीं थीं. वहीं, 2015 के विधानसभा चुनाव में बिहार की 243 सीटों में से जेडीयू को 71 सीटें मिलीं थीं. तब भाजपा को 53 और लोजपा एवं रालोसपा को क्रमश: दो-दो सीटें मिलीं थीं. उस चुनाव में जेडीयू, राष्‍ट्रीय जनता दल (राजद) तथा कांग्रेस का महागठबंधन था.

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हालांकि, बीते कुछ समय से उपेंद्र कुशवाहा जिस तरह का रवैया अपना कर चल रहे हैं और बिहार में जिस तरह से नीतीश कुमार से कमतर खुद को नहीं आंकते हैं, उससे यह स्पष्ट है कि अगर एनडीए उन्हें सम्मानजनक सीटें नहीं देती हैं तो फिर बिहार एनडीए का समीकरण बदल सकता है, क्योंकि बीजेपी और जदयू ने जो समझौता किया है, वह सियासी समीकरण की आखिरी शक्ल तो बिल्कुल ही नहीं. वैसे भी तेजस्वी यादव भी खुले तौर पर कई बार कह चुके हैं कि उन्हें उपेंद्र कुशवाहा और रामविलास की पार्टी के साथ कोई दिक्कत नहीं है. ऐसे में यह उम्मीद की जा सकती है कि बिहार में एक बार फिर से सियासी उठापटक का दौर चलेगा और जिस समीकरण को सुलझाने में बीजेपी लगी, वह अभी और उलझने वाली है. 

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