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मुजफ्फरपुर कांड: क्या सच में आरोपी ब्रजेश ठाकुर कांग्रेस में शामिल होने वाला था?

बिहार की राजनीति में बुधवार से इस बात पर विवाद चल रहा है कि क्या मुजफ्फरपुर बालिका गृह रेप कांड का मुख्य अभियुक्त ब्रजेश ठाकुर कांग्रेस पार्टी में शामिल होने वाला था.

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मुजफ्फरपुर कांड: क्या सच में आरोपी ब्रजेश ठाकुर कांग्रेस में शामिल होने वाला था?

मुजफ्फरपुर बालिका गृह रेप कांड का आरोपी ब्रजेश ठाकुर

पटना: बिहार की राजनीति में बुधवार से इस बात पर विवाद चल रहा है कि क्या सचमुच मुज़फ़्फ़रपुर शेल्टर होम कांड (मुजफ्फरपुर बालिका गृह रेप कांड) का मुख्य अभियुक्त ब्रजेश ठाकुर कांग्रेस पार्टी में शामिल होने वाला था, हालांकि उसका दावा है कि उसे फंसाने के लिए जो साज़िश रची गई है, उसके पीछे एक कारण यह भी रहा.

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अब ब्रजेश ठाकुर कितना सच और कितना झूठ बोल रहा है, कोई नहीं जानता, लेकिन कांग्रेस नेताओं का दावा है कि इसमें कोई सच्चाई नहीं. उनका कहना है कि यह बयान घिनौने कांड से ध्यान भटकाने के लिए दिलवाया गया है, लेकिन ब्रजेश ठाकुर के बयान में कितनी सच्चाई है, उसे जानने के लिए उसकी राजनैतिक पृष्ठभूमि को देखना होगा. ब्रजेश ठाकुर का राजनैतिक इतिहास, ख़ासकर चुनाव लड़ने का इतिहास करीब 23 साल पुराना है. उन्होंने सबसे पहले 1995 में विधानसभा चुनाव के दौरान कुरहनी क्षेत्र से नामांकन भरा था. ब्रजेश के राजनीतिक गुरु बिहार पीपल्स पार्टी के आनंद मोहन सिंह रहे हैं, जो उस चुनाव में खुद को अगड़ी जातियों के नेता के रूप में सामने लाए थे, और वैशाली लोकसभा उपचुनाव जीतने के बाद उन्हें गलतफहमी हो गई कि वह लालू प्रसाद यादव का विकल्प हैं, लेकिन ऐन मौके पर आनंद मोहन ने उत्तरी बिहार के कुख्यात अपराधी अशोक सम्राट को टिकट दे दिया था.

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इसी चुनाव के बाद मुज़फ़्फ़रपुर में जिलाधिकारी के रूप में राजबाला वर्मा आईं, जिन्हें 1995 के विधानसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने पूरे सेवाकाल के दौरान चुनाव कार्यों से अलग रखने का आदेश पारित कर दिया था, सो, राजबाला को अपनी छवि सुधारने की इच्छा हुई. गौरतलब है कि उस समय पटना से निकलने वाले अख़बारों का मुज़फ़्फ़रपुर संस्करण नहीं होता था, इसलिए ब्रजेश ठाकुर उन्हीं के साथ सक्रिय हो गया. जेल और रेडलाइट इलाके राजबाला के सुधार कार्यक्रमों के केंद्र रहे और यही दोनों इलाके कई कारणों से ब्रजेश के लिए भी सामान्य रुचि का केंद्र थे.

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इस दौरान उनका अख़बार और न्यूज़ एजेंसी की ढाल उनके पास रही. उस ज़माने में बिहार सरकार में एक अजीब प्रकरण होता था. अख़बारों और न्यूज़ एजेंसियों को सरकारी पैसे का भुगतान मुख्यमंत्री के हस्ताक्षर से होता था और ब्रजेश के पिता मुख्यमंत्री आवास में पटना के एक नामचीन फ़ोटोग्राफ़्रर की मदद से अपने भुगतान की फ़ाइल साइन करवा लिया करते थे. यह लालू प्रसाद यादव के साथ उस समय काम करने वालों का कहना है, लेकिन 1998 का चुनाव लालू को मधेपुरा से लड़ना था, और उस चुनाव में आनंद मोहन सिंह ने लालू की मदद की थी. बदले में RJD ने उनके खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारा था.

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इस प्रकरण में ब्रजेश को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष फायदा हुआ. वर्ष 2000 के चुनाव में वह बिहार पीपल्स पार्टी के उम्मीदवार रहा, दूसरे में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा था, लेकिन चुनाव हार गया, और इसके बाद ब्रिटिश अख़बार और NGO के काम में ही व्यस्त रहा. जब 2005 का विधानसभा चुनाव आया तो ब्रजेश को भरोसा हो गया था कि शायद उसे टिकट नहीं मिलेगा, इसलिए वह सक्रिय तो था, लेकिन चुनाव नहीं लड़ा. 2005 के अक्टूबर-नवंबर के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उस समय के NDA के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार नीतीश कुमार अपनी यात्रा के संबंध में मुज़फ़्फ़रपुर पहुंचे, तो उस रात का खाना सभी पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए वैद्य ठाकुर के घर पर आयोजित था, जिसमें नीतीश भी शामिल हो गए, लेकिन सरकार बनने के तुरंत बाद आनंद मोहन सिंह की नीतीश से अनबन हो गई, और तत्कालीन SSP ने उनकी पटना स्टेशन पर पिटाई कर दी, जिसके बाद ब्रजेश को फिर सारा ध्यान अपने अख़बार के काम और NGO पर केंद्रित करना पड़ा, लेकिन जिले की राजनीति में वह जिस भूमिहार जाति से आते हैं, उसमें उसकी कोई ख़ास पूछ एक पत्रकार के अलावा नहीं रही. लेकिन उस ज़माने में नीतीश मंत्रिमंडल में सूचना मंत्री रामनाथ ठाकुर की कृपा से बंधी एस ठाकुर की दुकान एक बार फिर चल गई थी और वह फिर सक्रिय हो गए, लेकिन अब उनकी छवि और पहचान कुछ नेताओं की 'लटक' के रूप में हो गई थी.

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इस बीच NGO के माध्यम से और ज़मीन के कारोबार से उसने काफ़ी धन अर्जित कर लिया था, लेकिन ज़िले की राजनीति में स्थानीय विधायक BJP का और सजातीय होने के कारण उसे लग रहा था कि अगर कांग्रेस पार्टी में प्रवेश कर लिया जाए, तो टिकट मिलने की गुंजाइश बन सकती है. मुज़फ़्फ़रपुर जिले में कांग्रेस की राजनीति दो परिवारों - पहले एलपी साही और बाद में रघुनाथ पांडे - के हाथ में रही, लेकिन वर्तमान में उनके वंशजों ने चुनावी हार के बाद BJP की शरण ले ली है, इसलिए प्रदेश में अगर कांग्रेस पार्टी में जाने की इच्छा जताई, तो वह बहुत हद तक गलत नहीं है. 

लेकिन यह मानना कि उसके गलत कामों के लिए कांग्रेस पार्टी या उसके अध्यक्ष राहुल गांधी ज़िम्मेदार हैं, इससे बडा असत्य भी कुछ नहीं है. ब्रजेश अगर फले-फूले, तो उसके लिए RJD, जनता दल यूनाइटेड और BJP के नेता ज़िम्मेदार हैं. सरकार में यूं तो कांग्रेस भी रही है, लेकिन किसी ने उसके ख़िलाफ़ कभी न कुछ लिखा, न कहा. 


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