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सृजन घोटाला: बीजेपी सांसद की जमीन पर बने रहे मॉल में आरोपियों ने किया निवेश? पुलिस कर रही जांच

कंपनी ने हालांकि यह स्‍वीकार किया है कि मॉल निशिकांत दूबे की ही जमीन पर बन रहा है और इसे बनाने की सारी जिम्‍मेदारी जीटीएम बिल्‍डर्स की है.

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सृजन घोटाला: बीजेपी सांसद की जमीन पर बने रहे मॉल में आरोपियों ने किया निवेश? पुलिस कर रही जांच
पटना:

बिहार में इन दिनों सृजन घोटाला सुर्खियों में है. महागठबंधन से अलग होकर और बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाने के बाद नीतीश सरकार को इस घोटाले से दो-चार होना पड़ रहा है. इस मामले में गोड्डा से बीजीपी सांसद निशिकांत दूबे पर भी आरोप लग रहे हैं कि उनकी जमीन पर बन रहे मॉल में इस घोटाले के आरोपियों का पैसा लगा है. अब मॉल बनाने वाली कंपनी जीटीएम बिल्‍डर्स एंड प्रमोटर्स प्राइवेट लिमिटेड ने इस मामले में बीजेपी सांसद की कोई भी भूमिका होने की बात से इनकार किया है. कंपनी ने एक प्रेस रिलीज जारी कर कहा है कि 'कई दिनों से अखबारों में यह कहा जा रहा है भागलपुर में बन रहे एक बड़े मॉल में सृजन की हिस्‍सेदारी है और यह मॉल बीजेपी के एक बड़े नेता का है. लेकिन ये गलत है. यह एक प्राइवेट डेवलपर का प्रोजेक्‍ट है और इसमें न तो सृजन न किसी और की हिस्‍सेदारी है.'

कंपनी ने हालांकि यह स्‍वीकार किया है कि मॉल निशिकांत दूबे की ही जमीन पर बन रहा है और इसे बनाने की सारी जिम्‍मेदारी जीटीएम बिल्‍डर्स की है. साथ ही कंपनी ने यह भी कहा है कि यह मॉल 2008 से बन रहा है और तब दूबे सांसद भी नहीं हुआ करते थे. हालांकि कंपनी की ऐसे कागजात भी सामने आए हैं जिसमें कंपनी ने सृजन संस्‍था की प्रमुख मनोरमा देवी के बेटे को रिमाइंडर भेजकर उनके द्वारा बुक किए गए फ्लैट की बकाया राशि का भुगतान करने को कहा है. अब भागलपुर पुलिस ने शहर के बीचोबीच बन रहे इस मॉल के निर्माण से जुड़ी सारी जानकारी मांगी है.


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कैसे हुआ घोटाला?
भागलपुर की सरकारी ज़मीन पर सृजन नाम की संस्था की इमारत में कई घोटालों के राज़ दफ़न नहीं हैं बल्कि छत, बालकनी, दरवाज़े और खिड़कियों से बाहर आकर आपको चुनौती दे रहे हैं कि सिस्टम ऐसे ही लूट मचाता है, इसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है. सृजन महिलाओं में कौशल विकास के लिए एक सेल्फ हेल्प ग्रुप का नाम है. 2003-04 में यह संस्था रांची से बिहार के भागलपुर आती है. उस समय के ज़िलाधिकारी एक एनजीओ को सरकार की ज़मीन लीज पर दे देते हैं, मात्र 200 रुपया महीने पर. यही अपने आप में नियमों के ख़िलाफ़ था. सृजन ने यहां पर मुख्यालय बना लिया और 2007-8 में सृजन कोपरेटिव बैंक खुल गया. इसी बैंक से खेल शुरू होता है भागलपुर ट्रेज़री के पैसे को इसके खाते में ट्रांसफर करने का और फिर वहां से सरकारी पैसे को मार्केट में लगाने का. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार सृजन में सेल्फ हेल्प ग्रुप के नाम पर कई फर्जी ग्रुप बनाए गए, उनके खाते खोले गए और उन खातों में नेताओं और नौकरशाहों ने अपना काला धन सफेद कर लिया. यह घोटाला भी इसी के साथ मीडिया में सामने आ रहा है.

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2008 से हो रहा था घोटाला
यह घोटाला 2008 से हो रहा है. तब बिहार में जेडीयू बीजेपी की सरकार थी और वित्त मंत्रालय सुशील मोदी के पास हुआ करता था. उसी साल ऑडिटर ने यह गड़बड़ी पकड़ ली थी. आपत्ति की थी कि सरकार का पैसा कोपरेटिव बैंक में कैसे जमा हो रहा है. एसडीएम विपिन कुमार ने सभी प्रखंड के अधिकारियों को लिखा कि पैसा सृजन के खाते में जमा नहीं करें. लेकिन सबकुछ पहले जैसा होता रहा. आख़िर कोई ज़िलाधिकारी किसके कहने पर सरकारी विभागों का पैसा सृजन कोपरेटिव बैंक के खाते में ट्रांसफर कर रहे थे. एक नहीं एक के बाद कई ज़िलाधिकारियों ने ने ऐसा होने दिया. यही नहीं 25 जुलाई 2013 को भारतीय रिजर्व बैंक ने बिहार सरकार से कहा था कि इस कोपरेटिव बैंक की गतिविधियों की जांच करें. रिजर्व बैंक का आदेश है कि अगर 30 करोड़ से अधिक की गड़बड़ी होगी तो जांच सीबीआई करेगी. इस घोटाले के कई पहलू हैं. 2013 में भागलपुर के तत्कालीन डीएम प्रेम सिंह मीणा ने सृजन के बैंकिंग प्रणाली पर सवाल खड़े करते हुए जांच टीम बना दी थी. मगर उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया.

VIDEO: बिहार में सृजन घोटाले पर उठते सवाल



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