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इस खतरनाक न्याय से सावधान

ऐसा न्याय बहुत सारे अन्यायों का जनक होता है. अगर इस प्रवृत्ति को बढ़ावा मिला तो हम पाएंगे कि गुनहगार कम, बेगुनाह ज़्यादा मारे जा रहे हैं.

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इस खतरनाक न्याय से सावधान

क्या एक बर्बरता का जवाब दूसरी बर्बरता हो सकती है? क्या किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी जमात को ये इजाज़त दी जा सकती है कि वह अपनी मर्ज़ी से गुनहगारों को पकड़े, चार दिन हिरासत में रखे और पांचवें दिन गोली मार दे? फिर इसमें और उस मॉब लिंचिंग में क्या अंतर है जो पिछले वर्षों में कभी गो-तस्करी, कभी बच्चा-चोरी और कभी किसी बहाने हम अपने चारों तरफ़ होता देखते रहे हैं?

तेलंगाना में वेटनरी डॉक्टर के साथ जो वीभत्स अपराध हुआ, उसके संदर्भ में ये सवाल उठाना आसान काम नहीं है. उसके अपराधियों के साथ किसी भी मानवीय व्यवहार की वकालत नहीं की जा सकती. शायद यही एहसास है जिसकी वजह से इस मामले के आरोपियों को मार गिराने वाले पुलिसवालों पर लोग फूल बरसा रहे हैं और देश जश्न मना रहा है.

लेकिन हम किसी अपराधी के साथ नहीं, लेकिन अपने साथ और अपने न्याय तंत्र के साथ मानवीय व्यवहार की उम्मीद तो कर सकते हैं? हम जब किसी बर्बरता का जश्न मनाते हैं तो दरअसल अपने भीतर की मनुष्यता के साथ भी मुठभेड़ करते हैं और उसे मार डालते हैं.


यह अनायास नहीं है कि पिछले कुछ वर्षों में ऐसा जश्न हमारे समाज में कुछ ज़्यादा ही मनाया जा रहा है. ऐसा लगता है जैसे अपनी व्यवस्था पर हमारा भरोसा बचा ही नहीं है. बेशक, इसकी भी वजहें हैं. हमारा न्याय तंत्र लगातार अविश्वसनीय हुआ है. पुलिस केस दर्ज नहीं करती, कर लेती है तो ताकतवर लोगों के हिसाब से सारी जांच करती है, सबूत बनाने और मिटाने का भी काम करती है और अदालत पहुंचते-पहुंचते मामला दम तोड़ देता है- यह एक आम राय बन चुकी है. शायद इसीलिए धीरे-धीरे यह धारणा मज़बूत हो रही है कि अपराधियों को सीधे गोली मार देनी चाहिए या फिर चौराहे पर फांसी दे देनी चाहिए.

लेकिन यह धारणा क्यों बन रही है? जिन पुलिसवालों को आज हीरो बनाया जा रहा है, उन्होंने ही ये मुकदमा समय रहते दर्ज किया होता तो शायद उस डॉक्टर को बचाया जा सकता था. तब डॉक्टर भी बचती, अपराधी भी गिरफ़्त में होते और न्याय प्रक्रिया पर लोगों का भरोसा भी मज़बूत होता. लेकिन इस देश के सबसे सुविधासंपन्न लोग न्याय प्रक्रिया के साथ सबसे ज़्यादा तोड़फोड़ करते हैं. वह हर संभव सूराख का इस्तेमाल अपने बचाव में करते हैं. तमाम घृणित अपराधों में लिप्त रसूख वाले अपराधियों को देखिए, उनके वकीलों की सूची देखिए और उनकी फीस देखिए तो यह समझ में आने में देरी नहीं लगेगी कि इस देश में इंसाफ़ होता नहीं है, पैसे के बल पर 'मैनेज' किया जाता है. अगर निर्भया के मुजरिम पैसे वाले होते तो शायद इतनी जल्दी उन्हें फांसी के तख़्ते के क़रीब लाना संभव नहीं होता. या तेलंगाना की डॉक्टर के आरोपी अमीर घरों के होते तो पुलिस उनकी मुठभेड़ से पहले सौ बार सोचती.

यकीन न हो तो वे सारे मामले देख लें जिनमें ताकतवर लोगों पर आरोप लगे हैं. यह भी देख लें कि कौन सी ताकतें उनके पीछे खड़ी हैं. मिसाल के तौर पर आसाराम और उनके बेटे नारायण साई पर जोधपुर और सूरत में नाबालिग लड़कियों ने बलात्कार की शिकायत की. इन मामलों के गवाहों पर आसाराम ने हमले करवाए. निचली अदालत ने जोधपुर मामले में आसाराम को रेप का गुनहगार माना. आरोप ये है कि आसाराम को पुलिस बचाती रही. क्या इन लोगों के साथ भी ऐसा त्वरित न्याय नहीं होना चाहिए?

या फिर कुलदीप सिंह सेंगर का मामला लें. उन पर अपने परिचित की बेटी को शिकार बनाने का आरोप है. इस मामले में शिकायत होने पर लड़की के पिता को जेल में मरवाने का आरोप है. मुकदमे के लिए जा रही और लड़की और उसके रिश्तेदारों को ट्रक से कुचल कर मार डालने का आरोप है. लेकिन इतने भयावह आरोपों से घिरे बीजेपी के इस पूर्व विधायक से मिलने बीजेपी के सांसद साक्षी महाराज जाते हैं. तब उमा भारती को यह खयाल नहीं आता कि इस मामले में भी इंसाफ़ होना चाहिए.
इन उदाहरणों को याद दिलाने का बस इतना मक़सद है कि कश्मीर से छत्तीसगढ़ तक और बंगाल से केरल तक बलात्कार के ऐसे ढेर सारे मामले हैं जिन पर हम पलक तक नहीं झपकाते. बलात्कार कई बार दंगों का सहज प्रतिफलन मान लिए जाते हैं या फिर राजनीतिक दमन का सहज औजार.

बिलकीस बानो के साथ रेप होता है तो हममें से कोई आरोपियों के लिए फांसी की मांग नहीं करता. कोई प्रस्तावित नहीं करता कि इन लोगों को भी सड़क पर गोली मार दी जाए. तो फिर क्या हमारी संवेदना में ही कोई खोट है? बलात्कार के दो अलग-अलग मामलों में हमारी अलग-अलग प्रतिक्रिया क्यों होती है? इस देश में हर साल घटने वाले हज़ारों बलात्कारों को हम भूल क्यों जाते हैं? कुछ कलेजा कड़ा करके कहने की इच्छा होती है कि हम बलात्कार को कहीं अपनी वर्गीय चेतना के हिसाब से तो नहीं देखते? जहां बलात्कार हमें अपने वर्ग पर चोट लगता है, उसके विरोध में खड़े हो जाते हैं और बाक़ी को भूल जाते हैं.

अगर हम वाकई न्याय के पक्ष में खड़े हैं तो हमें ऐसे असुविधाजनक सवालों पर विचार करना होगा. यह सच है कि हमारी न्याय व्यवस्था बहुत शिथिल और मद्धिम है, लेकिन इसके ज़िम्मेदार भी वही लोग हैं जो न्याय को स्थगित रखने में अपना भला देखते हैं. दूसरी बात यह कि न्याय बहुत तेज़ी से नहीं होना चाहिए. वह हमारा ऑर्डर किया हुआ पिज्जा नहीं होता कि 45 मिनट में हमारे दरवाज़े पर आ जाए. इत्तिफ़ाक से जो नया समाज हम बना रहे हैं, वह इंसाफ़ को भी ऐसा ही 'उत्पाद' मानता है. यही वह समाज है जो तेलंगाना की बलात्कार पीड़िता के वीडियो क्लिप खोजता है, वह लड़कियों पर होने वाले अत्याचार का भी लुत्फ लेता है, वह स्त्री को उपभोक्ता सामग्री में बदले जाने पर एतराज़ नहीं करता, पोर्नोग्राफ़ी का आनंद लेता है और फिर इस फ़र्ज़ी न्याय पर ताली बजाता और फूल बरसाता है.

ऐसा न्याय बहुत सारे अन्यायों का जनक होता है. अगर इस प्रवृत्ति को बढ़ावा मिला तो हम पाएंगे कि गुनहगार कम, बेगुनाह ज़्यादा मारे जा रहे हैं. इस देश में फर्ज़ी मुठभेड़ों का एक पूरा सिलसिला रहा है. हमें उससे पहचानना होगा और ऐसे त्वरित न्याय की कामना से बचना होगा. इसी में हमारा भला है, इसी में किसी लोकतांत्रिक समाज की मर्यादा है और इसी में एक देश में न्याय के शासन के सूत्र हैं.

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(प्रियदर्शन NDTV इंडिया में सीनियर एडिटर हैं...)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) :इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.



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