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शिवानंद तिवारी की जुबानी : कहानी ऐसे विधायक की, जिन्होंने चुनाव में जिसे हराया, उसी के घर अतिथि बनकर रहे

बिहार के दिग्गज नेता और राजद उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी ने जिस शख्स का संस्मरण अपने फेसबुक वॉल पर लिखा है, वो राजनीति के उच्च आदर्श को बयां करती है.

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शिवानंद तिवारी की जुबानी : कहानी ऐसे विधायक की, जिन्होंने चुनाव में जिसे हराया, उसी के घर अतिथि बनकर रहे

राजद उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी (फाइल फोटो)

नई दिल्ली: सियासत में नेताओं के अनेक किस्से होते हैं. कुछ मीठे तो कुछ कड़वे. कहा जाता है कि राजनीति में कोई भी न स्थाई दोस्त होता है और न दुश्मन. परिस्थितियां ही राजनीति में सारे रिश्ते तय करती हैं. दरअसल, बिहार के दिग्गज नेता और राजद उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी ने जिस शख्स का संस्मरण अपने फेसबुक वॉल पर लिखा है, वो राजनीति के उच्च आदर्श को बयां करती है. कभी जदयू के नेता रहे शिवानंद तिवारी ने पूर्व विधायक तुलसी दास मेहता के बारे में कुछ लिखा है, जो पढ़ने योग्य है. बता दें कि तुलसी दास समस्तीपुर के उजियारपुर से वर्तमान राजद विधायक आलोक मेहता के पिता हैं.  

शिवानंद तिवारी अपने फेसबुक पोस्ट में लिखते हैं :

''कल तुलसीदास मेहता जी से मुलाक़ात हुई. चौरानबे वर्ष के हो गए हैं. शरीर अशक्त हो गया है. मिलने वालों का स्वागत खड़े होकर करना चाहते हैं. लेकिन उठ नहीं पाते हैं. इसका अफसोस जताते हैं. लेकिन दिमागी रूप से बिलकुल सजग हैं. यादाश्त भी ठीक है. पुराने समाजवादी हैं. बासठ में पहली मर्तबा विधायक बने थे. पुरानी कहानी सुनाने लगे. आज की सियासत का हाल देखकर बहुतों को तुलसी बाबू की बात पर यक़ीन करना कठिन होगा.

अक्षयवट राय उस इलाके के बड़े समाजवादी नेता रहे हैं. बहुतों को समाजवादी आंदोलन से उन्होंने जोड़ा था. तुलसी बाबू बता रहे थे कि वैसा लोग होना अब मुश्किल है. उन्होंने ही तुलसी बाबू को 62 में चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित किया. लेकिन चुनाव लड़ने के लिए पैसे की जरूरत होती है. वह कहां से आएगा! इसके लिए अक्षयवट बाबू का सूत्र था. पहले उम्मीदवार बनो, पैसा बाद में आएगा. मुकाबला कांग्रेस के साधन संपन्न और सामाजिक रूप से मजबूत उम्मीदवार से था. राजवंशी सिंह बिहार कांग्रेस के दिग्गज नेता दीपनारायण सिंह के खासमखास थे. कोऑपरेटिव फेडरेशन बिहार के अध्यक्ष भी थे.


तुलसी बाबू बता रहे थे कि चुनाव अभियान शुरू हुआ. कभी साइकिल पर तो कभी टमटम पर. किसी कार्यकर्ता ने न कभी एक पैसा मांगा और न मैंने किसी को एक पैसा दिया. देता भी कहां से! कहां से आ रहा है और कैसे खर्चा चल रहा है, यह पता ही नहीं चला. कुछ दिनों के लिए एक ‘डौज’ गाड़ी किराए पर ली गई थी. कुल छ हजार रुपए खर्च हुए. ‘और मैं चुनाव जीत गया.’

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इसके बाद तुलसी बाबू ने जो सुनाया उसपर यकीन करना तो बहुत मुश्किल है. ‘बताया कि चुनाव जीतकर पटना पहुंचा. पटना में किसी को जानता नहीं था. कहां जाऊं, किसके यहां ठहरूं. बड़ा अहम सवाल था. जब कुछ समझ में नहीं आया तो अपने ही यहां के कांग्रेसी उम्मीदवार राजवंशी बाबू की कोठी पर पहुंच गया. कोऑपरेटीव फेडरेशन के अध्यक्ष के रूप में उनको बड़ा मकान मिला हुआ था. मैंने अपनी कठिनाई उनको बताई और कहा कि जब तक विधायक आवास नहीं मिलता है तब तक आपके यहां ही ठहरना चाहता हूं. राजवंशी बाबू ने कहा कि ज़रूर. जब तक आपके आवास का इंतजाम नहीं होता है आप मेरे अतिथि रहिए. घर में एक कमरा मिल गया. और जब तक आवास नहीं मिला तब तक राजवंशी बाबू का ही मैं अतिथि रहा.’

तुलसी दास मेहता जी ने थोड़ी देर की बातचीत में अपना जो यह संस्मरण सुनाया उसको आपके साथ साझा कर रहा हूं.''




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