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इमरजेंसी को लेकर शिवानंद तिवारी ने लिखा फेसबुक पोस्ट, जॉर्ज फर्नांडिस पर जमकर निकाली भड़ास

25 जून 1975 को भारत में लगे आपातकाल पर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद  शिवानंद तिवारी ने एक फेसबुक पोस्ट लिखा है.

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इमरजेंसी को लेकर शिवानंद तिवारी ने लिखा फेसबुक पोस्ट, जॉर्ज फर्नांडिस पर जमकर निकाली भड़ास

शिवानंद तिवारी (फाइल फोटो)

खास बातें

  1. शिवानंद तिवारी ने लिखा फेसबुक पोस्ट
  2. आपातकाल को लेकर लिखा पोस्ट
  3. जॉर्ज फर्नांडिस पर निकाली भड़ास
पटना: 25 जून 1975 को भारत में लगे आपातकाल पर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद शिवानंद तिवारी ने एक फेसबुक पोस्ट लिखा है. उन्होंने अपने पोस्ट में जॉर्ज फर्नांडिस पर जमकर भड़ास निकाली है. साथ ही उन्होंने रेवतीकांत सिन्हा को लेकर आभार प्रकट किया है. उन्होंने लिखा कि आपातकाल के दरम्यान जॉर्ज फर्नांडिस की गतिविधि का कोई अर्थ नहीं था. जैसे कोई युवा बगैर आगे-पीछे सोचे ‘थ्रील’ महसूस करने के लिए कूद-फांद करता है, जॉर्ज वही कर रहे थे. अपने इस ‘एडवेंचरिज्म’ में रेवतीकांत सिन्हा को तो बर्बाद कर दिया उन्होने. बुरी मौत मरे रेवतीकांत जी. 65 में केबी सहाय की कांग्रेसी सरकार के विरूद्ध सरकारी कर्मचारियों का लंबा आंदोलन चलाने वाले रेवतीकांत जी लोहिया के अतिप्रिय थे. 67 के चुनाव में रेवती कांत जी पटना से केबी सहाय के ख़िलाफ़ लड़ें लोहिया की यह इच्छा थी. लेकिन महामाया बाबू को लड़ा दिया गया. 

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उन्होंने लिखा कि लोहिया ने पटना में चुनावी भाषण तक नहीं किया. उस जुझारू समाजवादी रेवतीकांत के घर में आकर जॉर्ज ने डायनामाइट रखवा दिया. दो दिन उनके यहां लोगों से लगभग सार्वजनिक रूप से मिलते-जुलते रहे. बाद में पुलिस रेवती बाबू को पकड़ कर थाना ले गई. दो-चार हाथ मारा और रेवती कांत जी ने बयान दे दिया. उनपर मुखबिरी का आरोप लग गया. कोई उनसे बतियाने वाला नहीं था. लोग लगभग नफ़रत करने लगे थे. उनमें मैं भी था. 77 में बाबूजी एमपी बन गए थे. मैं भी दिल्ली में था. रेवतीबाबू को बचपन से मैं चाचा कहता आया था. लेकिन उस प्रकरण के बाद उनकी ओर ताकने की इच्छा नहीं होती थी. बाबूजी से मिलकर जब रेवती चाचा जाने लगे तो बाबूजी ने जेब से कुछ पैसा निकालकर उनकी जेब में डाल दिया. जब वे निकल गए तो मैंने बाबूजी से उनको पैसा देने का विरोध प्रकट किया. बाबूजी के चेहरे पर पीड़ा और दर्द वाली वह मुस्कान मुझे भी भी याद है. 

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उन्होंने कहा कि ‘शिवानन्द रेवतीकांत के एगो ग़लती से जीवन भर के उनकर काम मीट जाई? रेवतीकांत त जीवन में कबहीं बम-गोली के राजनीति ना कइले. बेचारे फंस गइले. आ एगो बात जान ल-पुलिस के सामने केहु चार लाठी में मुंह खोल देला त केहु चालीस लाठी में.’ बाबूजी की बात सुनकर मुझे अपने उपर बहुत ग्लानि हुई. रेवती चाचा के प्रति मैं अन्याय कर रहा था. जल्द मर गए. जीने की उनकी सारी प्रेरणा ख़त्म हो गई थी. यह तो ग़नीमत था कि उसी समय पटना मे बाढ़ का पानी प्रवेश कर गया था. नही तो शायद मैं भी फंसता. आज याद करने पर सबकुछ बचकाना लगता है. लाड़ली जी का सफ़ारी सुट में पटना में घुमना. उस पोशाक में वैसे ही विशिष्ट लगते थे. कभी भी पकड़ा सकते थे. मेरे घर के सामने गुप्त बैठक. कैसे ‘कोड’ में तार आएगा. उसके बाद अहमदाबाद में कहां पहुंचना है आदि, आदि. बैठक में विनयन, रघुवति, अख़्तर, लाड़ली जी आदि. एक ढंग से मेरे घर में बैठक. आयोजन करता मैं. सबकुछ काग़ज़ पर नोट हो रहा था. यह तो कहिए कि प्रशासन ने घोषणा शुरू किया कि ‘घर ख़ाली कीजिए. शहर में पानी का प्रवेश हो रहा है.’

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शिवानंद तिवारी ने आगे लिखा,  “बैठक ख़त्म हुई. कुछ ही दिन बाद पानी में ही मैं मैं पकड़ लिया गया. बाद में विनयन ने डायनामाइट के साथ अपना ‘एडवेंचर’ सुनाया था. कहिए कि उनलोगों की जान बच गई. किसी को इस रास्ते का ज्ञान नहीं था. कोई प्रशिक्षण नहीं था. यह तो गनिमत है कि हमारे देश की पुलिस और ख़ुफ़िया विभाग इतना अक्षम और निकम्मा है, नहीं तो कितने लोग जार्ज के ‘बचकाना एटभेंचर’ मे बरबाद हो गए होते.” फेसबुक पर एक वरीय पत्रकार मित्र का पोस्ट देखा. तो उसीको देखकर मैंने भी लिख दिया. माफी चाहूंगा. जॉर्ज कभी मेरे आदर्श या प्रेरणा नहीं रहे. जो आदमी दिन में भाषण कर जिसकी वकालत करता है और शाम में उसी के ख़िलाफ़ खड़ा नज़र आता है वह किसी के लिए आदर्श या प्रेरणा कैसे बन सकता है!


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