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क्या राज है सृजन घोटाले का? और क्या ये लालू, नीतीश और सुशील मोदी तीनों की लापरवाही का नतीजा है?

विपिन पार्टी में पूर्व सांसद शाहनवाज हुसैन और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के भी करीबी रहे हैं लेकिन इस मामले के प्रकाश में आने के बाद फ़िलहाल फरार चल रहे हैं.

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क्या राज है सृजन घोटाले का? और क्या ये लालू, नीतीश और सुशील मोदी तीनों की लापरवाही का नतीजा है?

बीजेपी नेता विपिन शर्मा फिलहाल फरार हैं (फाइल फोटो)

पटना: बीजेपी ने आखिरकार विपिन शर्मा को पार्टी से निलंबित करने की औपचारिकता शुक्रवार को पूरी की. विपिन राज्य बीजेपी के किसान मोर्चा के उपाध्यक्ष हैं और 750 करोड़ के इस सृजन घोटाले के मास्टरमाइंड, मनोरमा देवी, उनकी मौत के बाद उनके बेटे अमित कुमार और उसकी पत्नी प्रिया के करीबी रहे हैं. विपिन पार्टी में पूर्व सांसद शाहनवाज हुसैन और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के भी करीबी रहे हैं लेकिन इस मामले के प्रकाश में आने के बाद फ़िलहाल फरार चल रहे हैं.

लेकिन शुक्रवार को ही राज्य कैबिनेट ने जयश्री ठाकुर नाम के पदाधिकारी को बर्खास्त कर दिया. जयश्री ठाकुर बांका जिला में भू अर्जन पदाधिकारी थीं और 2013 में राज्य सरकार के आर्थिक अपराध इकाई ने छापेमारी कर उनकी अवैध चल और अचल संपत्ति जब्त की थी. सबसे पहले उसी समय सृजन का नाम चर्चा या विवादों में आया था क्योंकि सृजन कोऑपरेटिव बैंक में उनके खाते में 7 करोड़ से ज्यादा राशि जमा की थी. लेकिन जयश्री को उसके बाद निलंबित किया गया और अब ये बर्खास्तगी, आप कह सकते हैं कि सृजन घोटाले के प्रकाश में आने के कारण हुई है. उस समय इस मामले के प्रकाश में आने के बाद भागलपुर के एक स्थानीय निवासी संजीत कुमार ने केंद्रीय वित्त मंत्री को पत्र लिखकर सृजन के कारनामों की जांच करने का अनुरोध किया था. 25 जुलाई 2013 को लिखी इस चिट्ठी की एक कॉपी उन्होंने रिज़र्व बैंक के गवर्नर और बिहार के मुख्यमंत्री के कार्यालय में स्पीड पोस्ट से भेजी थी.

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इस पत्र के आधार पर रिज़र्व बैंक के पटना कार्यालय ने बिहार के निबंधक सहकारी समिति से उचित करवाई कर शिकायतकर्ता संजीत कुमार को सूचित करने का आदेश दिया. भागलपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी प्रेम सिंह मीणा ने दो सदस्यीय एक टीम भी बनायी लेकिन रहस्मय ढंग से इस टीम के एक सदस्य बीमार पड़ गए और जिलाधिकारी का भी तबादला हो गया. संजीत ने अपनी शिकायत में साफ़ लिखा था कि सृजन महिला कोऑपरेटिव सोसाइटी एक्ट के तहत रजिस्टर्ड है और इसे बैंक चलाने या पब्लिक के पैसे लेने का किसी भी प्रकार का लाइसेंस रिज़र्व बैंक से प्राप्त नहीं है. और रिज़र्व बैंक के आदेश के बाद भी जांच पूरी नहीं होना साबित करता है कि इस संस्था को बड़े अधिकारियों और सत्ता पर काबिज राजनेताओं का संरक्षण प्राप्त है.

राजद अध्‍यक्ष लालू यादव, संजीत कुमार की इसी शिकायत और पत्र का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और वित्त मंत्री सुशील मोदी के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं. लेकिन लालू यादव के पास इस बात का कोई जवाब नहीं जब मोदी और नीतीश दोनों इस मामले को उजागर करने में विफल रहे तब उसी वित्त मंत्रालय में जब उनकी पार्टी के वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी और सहकारिता मंत्री अलोक मेहता 20 महीने तक विराजमान रहे, तब वो किस दबाव में सृजन घोटाले को उजागर करने में विफल रहे. सहकारिता मंत्री के नाते अलोक मेहता भी अपने भागलपुर दौरे के दौरान सृजन के कार्यालय गए और मनोरमा देवी की मेजबानी स्‍वीकार की.

लेकिन एनडीटीवी खबर के पास 2002 का एक पत्र है जिससे पता चलता है भागलपुर में सहयोग समितियों के तत्‍कालीन सहायक निबंधक सुभाष चंद्र शर्मा ने सृजन के कामकाज की जांच की तब उन्हें ही विभाग के वरीय अधिकारियों ने कैसे निशाना बनाया. शर्मा ने अपने वरीय अधिकारियों को लिखे पत्र में साफ़ लिखा है कि सृजन में उस समय सब कुछ नियमों को ताक पर रख कर काम किया जा रहा था. उन्होंने अपने पत्र में एक और विशेष जांच करने की मांग की थी. ये बात अलग है कि उस समय राबड़ी देवी मुख्यमंत्री थीं और शर्मा का ही दो इन्क्रीमेंट रोक दिया गया था. इस कार्रवाई से साफ़ है कि मनोरमा देवी का सत्ता के गलियारे में उस समय भी प्रभाव था और 2002 हो या 2013, जांच रुकवाने में उन्हें हमेशा कामयाबी मिलती थी.

VIDEO: सृजन घोटाले के लपेटे में बीजेपी सांसद

लेकिन इस मामले के प्रकाश में आने के बाद ये साफ़ है कि राबड़ी देवी, नीतीश कुमार या सुशील मोदी सब इस घोटाले को उजागर नहीं कर पाए. कम से कम इस मामले में शिकायत पर जो कार्रवाई होनी चाहिए थी उसे दबाने का काम उनके सरकार के समय जरूर हुआ.  हालांकि इस बार मामले के प्रकाश में आने के बाद नीतीश कुमार ने मीडिया के सामने खुद इसका खुलासा किया, साथ ही जिला पुलिस पर जांच न छोड़कर विशेष जांच दल भेजा. लेकिन शयद सीबीआई भी इस बात का जवाब जरूर ढूंढेगी कि आखिर 750 करोड़ तक की राशि के गबन होने तक आखिर बैंकर्स, जिला प्रशासन के अधिकारियों, कुछ जिला अधिकारियों और सत्ता के करीबी नेतओं की मिलीभगत से ये घोटाला बदस्तूर क्यों जारी रहा. हालांकि सीबीआई के पास इस मामले के जाने के बाद विपक्षी दलों के हाथ से अब एक बड़ा मुद्दा छिन गया है. लेकिन सवाल यह उठता है कि ऐसी वित्तीय अनियमितता को आखिर क्यों और कैसे सालों तक चलने दिया गया.


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