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बिहार में नीतीश कुमार और बीजेपी आखिर क्यों बने एक दूसरे की मजबूरी?

नीतीश कुमार (Nitish Kumar) बीजेपी का साथ फ़िलहाल नहीं छोड़ने वाले हैं भले ही प्रधानमंत्री उन्हें सार्वजनिक रूप से नीचा दिखाने के लिए पटना विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्व विद्यालय का दर्जा देने की मांग को ख़ारिज कर दें  या फिर 'इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेन्स' में पटना विश्व विद्यालय का नाम ना हो और ऐसे संस्थान का नाम हो जिसकी ईंट अभी जोड़ी जा रही है.

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बिहार में नीतीश कुमार और बीजेपी आखिर क्यों बने एक दूसरे की मजबूरी?

नीतीश कुमार तेजस्वी और तेज की तुलना में सुशील मोदी के साथ ज्यादा सहज हैं. (फाइल फोटो)

खास बातें

  1. नीतीश कुमार और बीजेपी एक दूसरे की मजबूरी
  2. आरजेडी डाल रही है डोरे
  3. 'नीतीश ठीके है' की तर्ज पर बीजेपी
पटना:

बुधवार का दिन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के राजनीतिक जीवन में हाल के कुछ महीनो में सबसे सुखद रहा होगा. इसलिए नहीं कि उनके नेतृत्व पर  बिहार एनडीए के दो वरिष्ठ नेता सुशील मोदी और राजविलास पासवान  ने बयान दिया है कि नीतीश कुमार (Nitish Kumar) कप्तान हैं और उन्हीं की कप्तानी में अगले साल विधानसभा चुनाव लड़ेंगे या नीतीश चेहरा हैं और चेहरा रहेंगे जैसे बयान दिए बल्कि नीतीश कुमार के कट्टर आलोचक रहे आरजेडी नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने माना कि बीजेपी को हराने के लिए महगठबंधन में नीतीश कुमार वापस आएं तो उनका स्वागत है. निश्चित रूप से नीतीश कुमार के लिए सुशील मोदी और रामविलास पासवान से ज़्यादा रघुवंश प्रसाद सिंह का बयान मायने रखता हैं क्योंकि दोनो एक दूसरे के प्रति राजनीति में शायद ही मधुर भाव रखने के लिए जाने जाते हैं. और पहले जब महागठबंधन में भी नीतीश कुमार नेता थे तो तब हर बात पर आलोचना करने से परहेज़ नहीं करते थे. माना जाता था स्वर उनके होते थे और सोच उसके पीछे आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव की होती थी. इससे पहले एक अन्य वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने नीतीश कुमार को न्योता दिया था और कहा था कि नीतीश कुमार महागठबंधन में आएं और वह प्रधानमंत्री मटेरीयल हैं.  शिवानंद और रघुवंश के बोलने का एक ही अर्थ है कि यह लालू यादव के बिना सहमति के नहीं बोल रहे हैं और लालू यादव के इशारे का मतलब है कि उन्हें भी अपने बेटे तेजस्वी यादव के वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति में क्षमता और क़ाबिलियत पर भरोसा डिग गया है. 

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लेकिन इसके बावजूद नीतीश कुमार बीजेपी का साथ फ़िलहाल नहीं छोड़ने वाले हैं भले ही प्रधानमंत्री उन्हें सार्वजनिक रूप से नीचा दिखाने के लिए पटना विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्व विद्यालय का दर्जा देने की मांग को ख़ारिज कर दें  या फिर 'इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेन्स' में पटना विश्व विद्यालय का नाम ना हो और ऐसे संस्थान का नाम हो जिसकी ईंट अभी जोड़ी जा रही है. भले ही नीतीश के जीवन के सबसे प्रिय प्रोजेक्ट नालंदा विश्वविद्यालय को फिर से आरएसएस अपने उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करे. भले नीतीश कुमार के अपेक्षा के अनुरूप प्राकृतिक विपदा में केंद्र की मोदी सरकार आर्थिक अनुदान ना दे. या अनुच्छेद 370 का मामला हो सहयोगी होने के बावजूद नीतीश कुमार को केंद्र सरकार ने भनक नहीं लगने दी. नीतीश के तमाम प्रयासों के बावजूद शराबबंदी पर पड़ोस के झारखंड में भाजपा सरकार का रवैया उनके विपरीत रहा. 

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इन सबके बावजूद नीतीश बीजेपी का साथ इसलिए नहीं छोड़ेंगे क्योंकि शासन में जो सहजता उन्हें बिहार बीजेपी ख़ासकर सुशील मोदी और नंद किशोर यादव के साथ है वह आरजेडी के तेजस्वी और तेज़ प्रताप यादव के साथ कोई गारंटी नहीं दे सकता.  जहां लालू यादव और उनके परिवार में हर बार में हस्तक्षेप करने की एक आत्मघाती अदात है. वहीं बीजेपी के नेता नीतीश कुमार से अपनी सीमा के बाहर कभी कोई मुद्दा नहीं छेड़ते. दूसरा नीतीश को मालूम है कि प्रधानमंत्री बनने का उनका राजनीतिक सपना पूरा होने से रहा क्योंकि ना उसके लिए उनके पास साधन हैं और ना संसाधन. इससे भी महत्वपूर्ण है कि बिहार में शासन के बारह वर्ष उन्होंने सरकार ऐसे समय चलायी है जब केंद्र की सरकार से उनका राजनीतिक विरोध रहा और जब आप केंद्र की सरकार के सहयोगी होते हैं तो आपको कई मनोवैज्ञानिक लाभ भी मिलते हैं. जैसे बिहार में नियोजित शिक्षक का समान काम के बदले समान वेतन का मामला चल रहा था तब केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के कारण बिहार सरकार को मामले में बहस करने में सुविधा हुई जिसका असर फ़ैसले पर भी दिखा. 

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वहीं बीजेपी नीतीश कुमार को इसलिए कैप्टन के भूमिका में देखना चाहती हैं क्योंक उसे मालूम हैं कि नीतीश कुमार ने अपने काम के बदौलत जो वोट बैंक बनाया हैं जिसमें सभी जाति और वर्ग के लोग आते हैं. उनको तोड़ना केवल नारे गढ़ लेने से नहीं हो सकता. दूसरा जिन-जिन मुद्दों पर नीतीश ने विरोध किया जैसे असम में एनआरसी हो या धारा 370 शुरू में लगा कि बीजेपी को व्यापक जमसमर्थन हैं लेकिन ये दोनो मामले बीजेपी के लिए गले का फांस बन गये हैं. इसके अलावा पूरे देश में जो मंदी का माहौल हैं वैसे में जनता भले शांत हो लेकिन हर दिन बेरोज़गार हो रहे नौकरी पेशा लोगों का असंतोष 'हिंदुत्व' की राजनीति दम पर कितने दिनों तक शांत रहेगा कोई नहीं जानता और नीतीश सहयोगी अच्छे हो या नहीं  बीजेपी मानती हैं कि विपक्ष के नेताओं से कहीं ज्यादा वह आक्रामक हैं क्योंकि विषयों पर उनकी पकड़ है और जब वो विरोध में थे तो उनकी बातों की काट बीजेपी के नेताओं के पास नहीं होती थी. इसलिए बीजेपी नेताओं का कहना हैं कि ख़ासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह अपने कुछ चंद नेताओं के राजनीतिक हाशियेपन को ख़त्म करने के लिए बिहार में कोई राजनीतिक प्रयोग करने से अच्छा जो चल रहा है उसे ;नीतीश ठीके है' के तर्ज़ पर चलने देंगे. 

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