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  • यूपी चुनाव : सौगंध राम की खाते हैं से गंगा की सौगंध तक...
    वाकई ट्रंप ने अगर यूपी चुनाव में भाषा का स्तर देख लिया तो उनके और नीचे आने की उम्मीद की जा सकती है. ट्रंप का असर दुनिया में हो रहा है, कहीं उन पर यूपी का असर न हो जाए.
  • वेद प्रकाश शर्मा : भाषा का उत्कर्ष दिखाने वाला चश्मा उतारकर भी देखें इन्हें
    ये वो दिन थे जब ‘नंदन’, ‘चंपक’ और ‘नन्हें सम्राट’ पढ़ने में उम्र विद्रोह करने लगा था. ‘सुमन सौरभ’ और ‘विज्ञान प्रगति’ के दिन आ गए थे जिसे पढ़ने के बाद लगता था कि कुछ तो बड़े होने लगे हैं. ऐसे ही दिनों में मुझे गांव में विमल भैया की आलमारी मिली. इससे होकर एक ऐसी दुनिया की खिड़की खुली जहां रोमांच था, दिमागी कसरत थी और उत्सुकता थी. ऊपर कोने से मोड़े गए पन्ने जो बुकमार्क का काम करते थे वापस बुलाते रहते थे कि यहां से आगे बढ़कर क्लाइमेक्स तक पहुंचो. ये आलमारी बड़की मां के कमरे में थी, जहां कोई यह कहने नहीं आता था कि ‘इसको पढ़ने की तुम्हारी उम्र नहीं’. आलमारी की तरतीब जब तक न बिगड़े, भैया के भी बिगड़ने की संभावना नहीं थी. एक दिन यहीं मिले वेद प्रकाश शर्मा और ‘जिगर का टुकड़ा’ एक मोटा सा खुरदरे पन्ने वाला उपन्यास. बाद में पता चला था कि इसे लुगदी उपन्यास कहते हैं यानि पल्प फिक्शन.
  • सोचिए अगर एंबैसेडर कार वापस आ गई तो!
    हो सकता है 21वीं शताब्दी में बड़े होने वाले जेनरेशन में एंबैसेडर को लेकर उतनी उत्सुकता न हो, पर अस्सी-नब्बे की दशक में बड़े होने वालों के लिए तो सवालों का पिटारा खुल गया है. क्या वाकई कार वापस आएगी? आएगी तो कितनी बदल कर आएगी? नया इंजन लगेगा? बॉडी का शेप कैसा होगा? छत का डिज़ाइन तो नहीं बदल जाएगा?
  • रवीश कुमार का ब्‍लॉग: क्या लगता है आपको, यूपी में कौन जीतेगा!
    यूपी में कौन जीत रहा है, इस सवाल के दागते ही फन्ने ख़ां बनकर घूम रहे पत्रकारों के पाँव थम जाते हैं. लंबी गहरी साँस लेने लगते हैं. उनके चेहरे पर पहला भाव तो यही आता है कि दो मिनट दीजिये, नतीजा बताता हूँ लेकिन दो मिनट बीत जाने के बाद चेहरे का भाव बदल जाता है.
  • क्यों सारे बॉलिवुडिया गाने रोमांटिक और क्यों संस्कृति के जोड़ों में दर्द?
    अगर आप दिल्ली में कार चलाते हैं और आपके जीवन का एक ही लक्ष्य हो कि ट्रैफिक में पागल नहीं होना है तो फिर उसके लिए दो ही तरीके हैं - एक तो संगीत और दूसरा दूसरों की कारों में झांकना, जिसे स्थानीय भाषा में ताड़ना कहते हैं. लेकिन अगर आपकी मध्यम वर्ग की कुटी हुई सभ्य अपब्रिंगिंग है तो फिर आप एक ही तरीका अपनाएंगे वो है संगीत का. और मेरी समस्या इसी मुद्दे से शुरू हुई और फिर बढ़ती-बढ़ती ब्लॉग का शक्ल ले चुकी है.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : बीएमसी चुनावों में जनता की क्या है मांग?
    30,000 करोड़ से अधिक के बजट वाली बृह्न मुंबई महानगरपालिका यानी बीएमसी के चुनाव हो रहे हैं. पौने तीन करोड़ की आबादी 227 पार्षदों को चुनने के लिए 21 फरवरी को मतदान करने जा रही है. मुंबई में वार्डों का नामकरण संख्या के हिसाब से नहीं होता है. अंग्रेज़ी अल्फाबेट से होता है. ए से लेकर टी नाम वाले वार्ड होते हैं यहां. क्‍यू, आई, जे, ओ नाम के वार्ड क्यों नहीं हैं, ये मैं नहीं जानता हूं. जबकि ए से टी के बीच ये चारों आते हैं.
  • खुल गई अखिलेश यादव, राहुल गांधी के धर्मनिरपेक्षता के दावों की पोल
    दिवंगत राजनेता तथा लेखक रफीक ज़कारिया कि पुस्तक 'कम्युनल रेज इन सेक्युलर इंडिया' के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन द्वारा भविष्यदृष्टा की तरह लिखी गई प्रस्तावना के एक हिस्से में उन्होंने भारत में सांप्रदायिक दंगों का विश्लेषण भी किया था, जो भावनाओं को झकझोर डालता है... उन्होंने लिखा था, "हर किसी के कई-कई व्यक्तित्व हैं, और इसका ताल्लुक सिर्फ किसी के धर्म या समुदाय से नहीं है.
  • सिखों पर बनने वाले चुटकुलों के खिलाफ कोर्ट में मामला : समाज को हो क्या रहा है...?
    काला टीका लगाया जाना ज़रूरी है, अन्यथा नज़र लगने की यह बीमारी संक्रामक रूप ले लेगी. फिल्मों के रिलीज़ होने से पहले ही लोगों की आस्थाएं आहत होने लगती हैं. यहां तक कि उन वकीलों की भी, जिन्हें समाज तार्किक-बुद्धिजीवी मानता है. किताबें आहत करती हैं, कथन आहत करते हैं, लेख आहत करते हैं.
  • मायावती के संघर्ष को अन्य नेताओं के समकक्ष न रखे मीडिया
    इन दिनों मायावती की चर्चा इस बात पर काफी हो रही है कि मीडिया में उनकी चर्चा नहीं हो रही. खुद मायावती भी इसे अब अपनी रैलियों में कहने लगी हैं. रैलियों में जाकर महसूस किया कि मायावती जिस समाज से आती हैं, उस समाज के लोग उन्हें बहुत आशा भरी निगाहों से देखते हैं, उन्हें किसी हीरो की तरह मानते हैं. मायावती एक बार पूरे 5 वर्षों के लिए सरकार चला चुकी हैं तो अब उनका मूल्यांकन दो तरह से किया जाएगा कि उन्होंने अपने समाज के लिए क्या किया और एक मुख्यमंत्री के तौर पर कैसी रहीं.
  • सफदरजंग अस्पताल के बाहर खड़ी एंबुलेंस की कहानी हमसे कुछ कहना चाहती है...
    दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल के बाहर के सर्विस लेन में खड़ी पचासों एंबुलेंसों को देखकर जाने क्यों लगा कि कोई कहानी होगी. पहली नजर में देखकर मुड़ गया कि वही कहानी होगी कि पड़ोस के राज्यों में अस्पताल अच्छे नहीं होंगे, वहां से मरीज एम्स या सफदरजंग लाए जाते होंगे. मन नहीं माना तो एक बार फिर लौट कर गया कि कुछ और जानने का प्रयास किया जाए. एंबुलेंस के चालक थके हुए थे. आंखें लाल थीं मगर सब अपनी गाड़ी से उतर आए. अपनी समस्या बताने के लिए.
  • क्या पत्रकार को मतदान करना चाहिए?
    इस बार कई चुनावों के बाद मतदान करने का मौका मिला. वर्ना हर बार मतदान यहां होता था और हम कहीं और रिपोर्टिंग की ड्यूटी पर होते थे. मैं ख़ुद भी अपील करता रहा हूं कि बड़ी संख्या में मतदान करें. इसलिए यह बात कचोटती भी थी कि मतदान नहीं किया. पहले सोचता था कि जवानों की तरह पत्रकारों को भी पोस्टल बैलेट से मतदान की अनुमति मिले ताकि वे ड्यूटी पर रहते हुए मतदान कर सकें. लेकिन अब मेरी राय बदल रही है.
  • साक्षरता को लेकर जनप्रतिनिधियों को छूट क्यों?
    पिछले कुछ वक्त से नजर आ रहा है कि राजनीति में सुधारों के पैरोकार भी उम्मीदवारों की शैक्षणिक योग्यता के मामले में बचाव की मुद्रा में आ जाते हैं. उनकी दलील होती है कि ये लोकतंत्र के खिलाफ है, संविधान के खिलाफ है. ये किसी गरीब, पिछड़े, दलित, आदिवासी के लिए नुकसानदायक होगा.
  • यूपी चुनाव : हर छोटे-बड़े दल ने पाल रखी हैं उम्मीदें
    उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए मतदान अपने दूसरे चरण में पहुंच चुका है, लेकिन अभी भी कुछ राजनीतिक दलों में चुनावी रणनीति को लेकर असमंजस बरक़रार है. ये दल कोई छोटे या महत्त्वहीन नहीं, बल्कि ऐसे दल हैं जो एक न एक प्रदेशों में सत्ता में हैं.
  • हिन्दू समधन और मुस्लिम समधन में ठनठन के किस्से और वैलेंटाइन डे के जलवे!
    एक के सर पर आंचल और एक के सर पर दुपट्टा. एक साड़ी में और दूसरी सलवार सूट में. उम्र का फासला तो उतना नहीं रहा होगा मगर मजहब के फासले के मिटने की खिलखिलाहट दबी ज़ुबान में मुझ तक पहुंच रही थी. मैं अंतर्जातीय और अंतरधार्मिक ब्याह रचाने वाले जोड़ों के अनुभव से बातें कर रहा था. मुझसे रहा नहीं गया, दोनों की तरफ मुड़ गया. दोनों समधनें साथ ही बैठी थीं. चाहतीं तो अपने-अपने बच्चों के बगल में बैठ सकती थीं. सफेद सूट में मुस्लिम समधन और लाल साड़ी में हिन्दू समधन. ऐसा दृश्य कहां देखने को मिलता है. आम परिवारों की मां और अम्मी जान के लिए आसान नहीं रहा होगा अपने बच्चों के अंतरधार्मिक विवाह को स्वीकार करना और उसे लेकर खुद को समझाना.
  • तिनका- तिनका ‘वैलेंटाइन’: इंतजार की अंतहीन खराश के बीच कुछ प्रेम....
    ‘वैलेंटाइन डे ’ पर भारत और दुनियाभर में प्रेम को विविध रूपों में अभिव्‍यक्‍त किया जाता है. इसमें से ज्‍यादातर जिक्र ‘इस पार’ के संसार का है. लेकिन उस पार के संसार का क्‍या ? उस प्रेम, संवेदना का क्‍या जिसे हर इजहार के लिए कानूनी अनुमति चाहिए? उस पार, यानी वह दुनिया जिसे हम ‘जेल’ के नाम से जानते हैं. यह एक शब्‍द मनुष्‍य और समाज की चिंता से बहिष्कृत है. इसलिए मैंने आज प्रेम के इजहार के लिए जेल और उस संसार को चुना है.. जिसके बारे में हम कभी बात नहीं करते...
  • वैलेंटाइन-डे से घबराया हुआ मेरा समाज और भारतीय सौंदर्य बोध...
    आज वैलेंटाइन डे है. इसके पक्ष या विपक्ष में लिखने का मेरा कोई उद्देश्य नहीं है. न इसके औचित्य और अनौचित्य पर कोई निर्णायक टिप्पणी करने की मंशा है. इतिहास का छोटा मोटा विद्यार्थी रहे होने की वज़ह से मन को रोकना मुश्किल होता है. मैं बिना किसी पर कोई निर्णय दिए चुपचाप अपने इसी समाज को टटोलना चाहता हूं. वैलेंटाइन डे से घबराया हुआ मेरा यह समाज ऐसे उत्सवों के प्रति क्या सदा से अनुदार रहा है? क्या यह इतना 'बंद' समाज रहा है जहां कभी भी युवा-युवतियों को खुलकर मिलने जुलने और प्रेम अभिव्यक्ति करने के मौके नहीं उपलब्ध थे...
  • जेएनयू प्रसंग से फैले उन्माद को पंचर करती है 'जॉली एलएलबी-2'
    एक ऐसे समय में जब न्यायपालिका पर सरकार के भारी पड़ने की ख़बरें आती रहती हैं, एक फिल्म न्यायपालिका की तरफ से जनता में अपनी गवाही देने आई है. फिल्म की कहानी आख़िरी सीन से शुरू होती है. कैमरा जब उठने के अंदाज़ में ज़ूम आउट होता हुआ कोर्ट रूम से बाहर आने लगता है, जाते-जाते जज साहब 3 करोड़ लंबित मुकदमों और इक्कीस हज़ार जजों की संख्या का हाल बताते हुए कहते हैं कि कभी-कभी तो ऐसे केस आते हैं जब लगता है कि बदबूदार कोर्ट रूम में अपने होने का मकसद सार्थक हो रहा है.
  • यूपी की जूलियटों, खोल दो अपनी लटों को...बचा लो अपने रोमियो को
    प्रेम तो रोमियो और जूलियट दोनों को हुआ था, लेकिन एंटी रोमियो दल बनाने वालों को रोमियो ही क्यों खलनायक दिखा, इसके कारण गूगल जगत में ज्ञात नहीं हैं. रोमियो और जूलियट की प्रेम कहानी की पृष्ठभूमि में परिवारों की दुश्मनी है, जिसे यूपी में हिन्दू और मुसलमान की दुश्मनी में बदल दिया गया है.
  • नर्मदा घाटी: लड़ाई तो जीती मगर युद्ध जारी है..
    सरदार सरोवर बांध को लेकर नर्मदा बचाओ आंदोलन (नबआ) की याचिका पर अंततः सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ ही गया. तीन दशक की कानूनी लड़ाई के बाद आए फैसले ने प्रसिद्ध चिंतक व पत्रकार प्रभाष जोशी के इस कथन की याद दिला दी कि 'फैसला हुआ है न्याय नहीं.’ इस बार हम शायद दो कदम आगे बढ़े हैं क्योंकि इस फैसले ने 'नबआ' की नैतिकता को ठोस आधार प्रदान कर दिया है.
  • तमिलनाडु ड्रामे से समझें, देश की जनता के साथ नेताओं के ‘स्कैम’ का सच
    यूपी चुनावों में ‘स्कैम’ की सही व्याख्या अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कालिखो पुल के सुसाइड नोट में मिल सकती है, जिसके अनुसार स्कैम का मतलब सरकार, कोर्ट, अधिकारी और मीडिया है.

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