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  • दिल्ली की ट्रैफिक में साइकिल चलाने से मुझे क्या सबक मिला...
    सेहत की फिक्र करने वाले और थोड़ा बहुत पर्यावरण की चिंता करने वाले अपर मिडिल क्लास लोगों ने जब से हजारों और लाखों रुपये की साइकिलें खरीदनी शुरू की है, लोगों का नजरिया बदला है.
  • क्या दिल्ली के रंगकर्मी सरकारी कठपुतली बनने के लिए तैयार हैं?
    क्या दिल्ली के रंगकर्मी दिल्ली सरकार द्वारा तय किए विषयों पर नाटक करने के लिए तैयार हैं? क्या उन्हें नहीं लगता कि एक कलाकार होने के नाते अपने समय और समाज से कैसे जुड़ना चाहते हैं और किन विषयों के जरिए अभिव्यक्ति करना चाहते हैं यह तय करने का हक उनका है? और यह तय करने में वह सरकारी बाबूओं और मंत्रियों से अधिक सक्षम हैं? या दिल्ली के रंगकर्मी सरकार के हाथ की कठपुतली बनने के लिए तैयार हैं?
  • देश के कारोबार पर GST की मार: रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम
    जयपुर में 20 सितंबर के बाद भी पोर्टल सही से काम नहीं कर रहा था. पूरे दिन मेसेज आते रहा कि आप क़तार में है, दिन बीत गया क़तार नहीं बीता. व्यापारियों के साथ टैक्स वकील और सीए सभी दबाव में काम कर रहे हैं.
  • क्या हर रोहिंग्या मुसलमान आतंकी है?
    जो लोग अपनी जान बचाने के लिए अपना मुल्क छोड़ दूसरे देश में शरण लेने को मजबूर हुए हों क्या वो आतंकी हैं? जिन्हें अपने ही मुल्क (म्यांमार) में नागरिक का दर्जा न दिया गया हो, जिनके गांव के गांव जला डाले गये हों, जो दूधमुंहे बच्चों और यहां तक कि गर्भवती महिलाओं को साथ लिए हज़ारों किलोमीटर दूर भूखे पेट विपरीत परिस्थितियों में भागने को मजबूर हुए हों.
  • रियल एस्टेट पर GST का क्या प्रभाव पड़ा है, समझें इन पांच बिंदुओं से...
    प्रॉपर्टी खरीददारों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि आप जिस प्रॉपर्टी को खरीदना चाहते हैं वो जीएसटी लागू होने के बाद सस्ती हुई है या और महंगी हो गई है? करीब दो या ढ़ाई महीने के कन्फ्यूजन के बाद भारत में एक जुलाई 2017 को जीएसटी लागू हुआ. रियल एस्टेट पर जीएसटी का क्‍या प्रभाव पड़ा इसका जवाब इन पांच बातों पर निर्भर करता है:
  • नोटबंदी के मारे, GST से हारे? रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम
    डीज़ल के दाम बढ़ने से खेती की लागत बढ़ गई है, किसान परेशान हैं, नौकरियों का पता नहीं है, बैंक संकट में हैं, इसके बाद भी टीवी चैनलों पर हिन्दू मुस्लिम टॉपिक की भरमार है. ये हिन्दू मुस्लिम टॉपिक इतना ज़्यादा क्यों हैं, क्या आपने कभी सोचा है, आप साढ़े तीन साल के दौरान सभी चैनलों पर हुए डिबेट की सूची बनाइये, ज़्यादातर का संबंध हिन्दू मुस्लिम से मिलेगा.
  • रोहिंग्याओं को भारत में शरण क्यों? रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम
    कहीं ऐसा तो नहीं कि उनकी जगह डिक्टर एक पुनर्खोज या तानाशाही, आज की आवश्यकता टाइप के कार्यक्रम हुआ करेंगे? इलाहाबाद में 18 सितंबर को एक दिन का लिबर्टी फेस्टिवल होने वाला था, जिसे वाइस चांसलर ने अनुमति देने के बाद मना कर दिया.
  • राजनीतिज्ञों की कुभाषा के खिलाफ बढ़ता असंतोष
    राजनीति में भाषा की मर्यादा पर अब चिंता जताने वालों की तादाद बढ़ने लगी है. लोकतंत्र के भविष्य के लिए यह प्रवृत्ति कितनी घातक थी.
  • जब रामधारी सिंह दिनकर ने इस कवि से कहा, तुमने अभी ‘आत्मजयी’ लिख डाली है तो बुढ़ापे में क्या लिखोगे!’
    हिंदी के कवि कुंवर नारायण का आज जन्मदिन है और वे 90 साल के हो गए हैं. उन्होंने हिंदी साहित्य को 'आत्मजयी' जैसी कृति दी, जिसने उन्हें साहित्य जगत में स्थापित करने काम किया
  • प्राइम टाइम इंट्रो: क्‍या जनता की क़ीमत पर कमाया जा रहा है तेल से मुनाफ़ा?
    क्या अर्थशास्त्र के किताब से उस चैप्टर को हटा दिया गया है जिसमें पढ़ाया जाता था कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से भारत या दुनिया के मुल्कों के घरेलू बाज़ार में पेट्रोल और डीज़ल के दाम बढ़ते हैं. आख़िर पेट्रोल के दाम बढ़ने पर अर्थशास्त्री से लेकर राजनेता क्यों चुप हैं.
  • रोहिंग्या समुदाय की त्रासदी : कैसा लगेगा, यदि आपके पैरों तले से जमीन खींच ली जाए?
    क्या अभागे रोहिंग्या मुसलमानों को कोई ऐसा टापू मिल पाएगा जहां बाढ़ न आती हो, जहां वे इंसानों की तरह जी सकें, जहां फिर कोई उनके घर न जला सके, हैलिकॉप्टरों से हमले करके उनका संहार न कर सके, जहां उनको उनके जीने के अधिकार से वंचित न किया जा सकता हो, जहां उनकी अपनी पहचान हो, अपनी जमीन हो और भविष्य भी हो?
  • “बयान”: एक सस्ती एंथ्रोपोलॉजिकल स्टडी
    बयान शाश्वत है. ना तो वो दिया जाता है, ना वो सुना जाता है. ब्रह्मांड का अकाट्य तत्व है बयान जो सिर्फ़ मुंह बदलता है. बयान अपनी पार्टी और अपना फ़ॉर्म बदलता है, नेता और वोट बैंक भी बदलता है क्योंकि बयान एक कॉस्मिक एनर्जी हैं. वो एनर्जी जिससे छिटक कर मनुष्य बना है.
  • पब्लिक सेक्टर बैंक पर निजीकरण का खतरा? रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम
    नमस्कार मैं रवीश कुमार, जब हमने देश के बाकी शहरों का रेट जानना चाहा तो पता चला कि भारत पेट्रोलियम, इंडियन आयल कोरपोरेशन और एच पी सी एल की वेबसाइट पर सभी ज़िलों के पेट्रोल और डीज़ल के भाव नहीं मिले. इनकी साइट पर महानगरों और राज्यों की राजधानियों के ही रेट हैं. इसलिए अभी तक मुंबई का 79 रुपये प्रति लीटर से अधिक पर ही हैरानी हो रही थी और पता नहीं चल रहा था कि सोलापुर जैसे ज़िले 83 रुपये से अधिक दाम दे रहे हैं. जब हमने पेट्रोल डीज़ल की कीमत बताने वाली दूसरी कई वेबसाइट देखी और कुछ जगहों पर खुद भी देखा तो पता चला कि महाराष्ट्र के ही कई शहरों में पेट्रोल के भाव मुंबई से महंगे हैं और 80 रुपये के पार जा चुके हैं.
  • असफल योजनाओं की सफल सरकार- अबकी बार ईवेंट सरकार
    2022 में बुलेट ट्रेन के आगमन को लेकर आशावाद के संचार में बुराई नहीं है. नतीजा पता है फिर भी उम्मीद है तो यह अच्छी बात है. मोदी सरकार ने हमें अनगिनत ईवेंट दिए हैं. जब तक कोई ईवेंट याद आता है कि अरे हां, वो भी तो था, उसका क्या हुआ, तब तक नया ईवेंट आ जाता है. सवाल पूछकर निराश होने का मौका ही नहीं मिलता.
  • क्या लालू यादव ने अपनी गलतियों से तेजस्वी का राजनीतिक भविष्य चौपट कर दिया?
    तेजस्वी यादव देश के उन गिने चुने नेताओं में से एक हैं जिन्होंने अपने छोटे से राजनीतिक करियर में इतने उतार-चढ़ाव देख लिए हैं जिसे कुछ लोग पूरे जीवन में नहीं देख पाते. तेजस्वी को जितनी जल्दी ऊंचाई मिली उससे कही तेजी से धरातल भी देखने को मिल रहा है.
  • क्या बीएमडब्ल्यू के विज़न डायनैमिक्स से चुनौती मिलेगी टेस्ला कारों को?
    फ्रैंकफर्ट मोटर शो में कार कंपनियों में नई कार और फ़्यूचरिस्टिक कारों को दिखाने के लिए होड़ लगी हुई है और इस बार भी ज़्यादातर का फ़ोकस भविष्य की कारों पर ही है, जो चाहे ईंधन के मामले में हो या ड्राइव के मामले में. 
  • बुलेट ट्रेन को प्राथमिकता कितनी सही? रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम
    बुलेट ट्रेन के समर्थन और विरोध में दिए जाने वाले कई तर्कों में समस्या है. अगर हम वाकई इतने गंभीर थे तो शिलान्यास से पहले इस पर चर्चा करते कि एक ट्रैक पर सवा लाख करोड़ ख़र्च कर रहे हैं जबकि काकोदकर कमेटी ने कहा था कि मौजूदा रेल पटरियों के पूरे ढांचे को ठीक करने के लिए एक लाख करोड़ चाहिए. इस ज़रूरी काम के लिए पैसा नहीं आ सका. 
  • माफ कीजि‍ए, मैं यह पुरस्‍कार नहीं ले सकता!
    खेती-किसानी करने वाला एक सामान्‍य व्यक्ति मुख्यमंत्री के हाथों मिलने जा रहा सम्मान लौटा दे तो चर्चा होना स्वाभाविक ही है. असहिष्णुता के मुद्दे पर नामचीन साहित्यकारों ने पुरस्‍कार वापस कर दि‍ए थे, इसकी खूब प्रतिक्रिया भी हुई थी. हाल-फि‍लहाल एक किसान द्वारा पुरस्‍कार लेने से मना कर देना का यह पहला मामला है. यह कि‍सान हैं बाबूलाल दाहिया.
  • गोरक्षा की तरह हिंदी रक्षा न करें..
    हिंदी को सबसे ज़्यादा हिंदी प्रेमियों से बचाने की जरूरत है. हिंदी रक्षा का काम कुछ लोग उसी तरह करना चाहते हैं जैसे गोरक्षा का काम करते हैं. वे अचानक हिंदी से तमाम तद्भव, देशज-विदेशज शब्दों को हटाने की मांग करते हैं. कुछ अरसा पहले दीनानाथ बतरा के नेतृत्व में बनी एक कमेटी ने पाठ्य पुस्तकों से ऐसे शब्दों को हटाने की सिफ़ारिश की. यह सबसे ख़तरनाक मांग है. भाषाओं को सबसे ज़्यादा शुद्धतावाद मारता है.
  • हिंदी के गुणगान दिवस पर एक बात..
    कोई भाषा यह दावा नहीं कर सकती कि उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व है. क्योंकि भाषा संप्रेषण का एक माध्यम है. संप्रेषण का मतलब है कि जिससे बात की जाए उसकी समझ में आए. इसीलिए दो अलग अलग भाषाओं के बीच संप्रेषण की पहली शर्त है कि दोनों के बीच की एक और भाषा का निर्माण हो. कालक्रम में प्राकृत, संस्कृत, अपभ्रंश के रूप बदलती हुई आज हिंदी तक आई अपनी भाषा कोई अपवाद नहीं है.
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