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  • प्रणब मुखर्जी के व्याख्यान पर चर्चा न होने के मायने
    हैरानी की बात है कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का राममनाथ गोयनका व्याख्यान चर्चा में नहीं आ पाया. हालांकि इस व्याख्यान में उन्होंने कई खास बातें कही हैं. प्रबुद्ध वर्ग के लिए यह और भी खास इसलिए था क्योंकि उनकी कही मुख्य बात अचानक बदलती पत्रकारिता और मौजूदा सामाजिक राजनीतिक परिस्थितियों पर थी.
  • नई मारुति डिजायर की टेस्ट ड्राइव की रिपोर्ट का किसी को इंतज़ार था क्या?
    हिंदुस्तानी ग्राहक एक जूते का फीता भी ख़रीदते हैं तो सोसाइटी के वाचमैन से लेकर अपने फ़ैमिली डॉक्टर तक से सलाह ले लेते हैं कि कौन से ब्रांड का ख़रीदा जाए. कौन से मार्केट में पौने सात रुपए की छूट मिल सकती है. तो ऐसे में गाड़ियां तो बड़ी चीज़ हैं. लाखों का वारा न्यारा होता है. पहले के ज़माने में पीएफ़ का पूरा पैसा लग जाता था, आजकल बैंक का इंटरेस्ट रेट रहता है.
  • क्या गाड़ियों की टेस्ट ड्राइव रिपोर्ट पर भरोसा कम हुआ है ?
    टेस्ट ड्राइव रिपोर्ट, फ़र्स्ट ड्राइव रिपोर्ट या ड्राइव का इंप्रेशन ऐसी चीज़ें हुआ करती थीं जिनका इंतज़ार होता था. कार और मोटरसाइकिल कंपनियां बहुत नहीं थी. लॉन्च बहुत नहीं हुआ करते थे. हम जैसे कई मोटरिंग पत्रकार गाड़ियों को चलाते थे, एक एक स्टोरी के लिए कई कई दिन शूट करते थे. फिर वक़्त लगाकर वीडियो एडिटिंग करते थे और तब आता था वीकेंड और हमारी स्टोरी चला करती थी.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : मोदी सरकार के तीन साल का सरकारोत्‍सव
    आज सरकारोत्सव है. सरकारोत्सव उस उत्सव को कहते हैं कि जब सरकार अपने एक साल पूरे करती है. सरकारोत्सव मनाने की परंपरा शायद अमेरिका में शुरू हुई थी जब राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने अपनी सरकार के 100 दिन पूरे होने पर जश्न मनाया था. रूजवेल्ट 1932 में राष्ट्रपति बने थे. भारत में भी यह परंपरा चली आई लेकिन 100 दिन के बाद सरकारें 200 दिन नहीं मनाती हैं, वो सीधा सालगिरह मनाती हैं.
  • केपीएस गिल को एक आईपीएस अफसर की श्रद्धांजलि...
    गिल सर को अक्सर उन घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में याद किया जाता है, जिन्होंने एक दौर में पंजाब की धरती को लहूलुहान कर दिया था. यह सही भी है.
  • गिल साहब की मृत्यु के साथ हॉकी का एक दौर ख़त्म
    केपीएस गिल नहीं रहे. इसके साथ हॉकी का एक अनमोल अध्याय भी ख़त्म हो गया. भारतीय हॉकी संघ के पूर्व अध्यक्ष गिल के कार्यकाल में हॉकी ने कई उतार-चढ़ाव देखे. एक वो भी दौर रहा जब हॉकी को लेकर गिल की प्रतिक्रिया बेहद अहम मानी जाती थी.
  • हम आगे नहीं, पीछे लौट रहे हैं...
    रिश्ते सिकुड़ रहे हैं, इंसानी ज़रूरतें फैल रही हैं... इन ज़रूरतों को पूरा करने के बीच प्यार, संवेदना और सहानूभूति हाथ से फिसलते जा रहे हैं... सोशल मीडिया पर लाइक और इमोटिकॉन के बीच हम उन रिश्तों को सींचने में पीछे छूट गए हैं, जो मुश्किल के वक्त कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होते हैं... वैसे, देर तो हो चुकी है, लेकिन कहते हैं न - जब जागो, तभी सवेरा...
  • प्राइम टाइम इंट्रो : यूपी के कुछ हिस्से क्यों उबल रहे हैं?
    हमारी आज की राजनीति बेवजह आक्रामक होती जा रही है. नेताओं की भाषा में जो आक्रामकता है वही एंकर की हो गई है, वही अब सड़कों पर लोगों की होती जा रही है. तरह तरह की फिज़ूल की धार्मिक और जातीय सेनाओं के भरोसे राजनीति अपनी आकांक्षा ज़ाहिर करेगी तो फिर औपचारिक दलों का क्या होगा, उन्हें यह भी सोच लेना चाहिए.
  • रोमांच से भरी यात्रा, जिंदगी के ऊंचे-नीचे रास्तों की तरह ट्रेक...
    त्रीउन्ड शायद कुछ ही दूर रहा गया था. खुशी भी थी और पहुंचने का रोमांच भी. हिम्मत बांधते चल ही रहे थे कि अचानक बादलों ने घेर लिया. हल्की बारिश होने लगी और ओले पड़ने लगे. हाथों में कुछ ओलों को मैंने पकड़ा भी. बचपन याद आ गया. धीरज के कहने पर रेनकोट पहन लिया लेकिन फिर फिसलन का अहसास होने लगा. पत्थर और बड़े मिल रहे थे. रास्ता और संकरा मिल रहा था...
  • प्राइम टाइम इंट्रो : झूठ पर लाठालाठी, मीडिया का आचरण और सेना का मनोबल
    अरुंधति रॉय का नाम सुनते ही व्हाट्स ऐप पर चलने वाली फेक यूनिवर्सिटी के छात्रों के मन में क्रोध के विविध स्वरूप फूट पड़ते हैं. इसे आम बोलचाल में व्हाट्स ऐप यूनिवर्सिटी कहते हैं जहां झूठ की पढ़ाई होती है और जहां पढ़ने वाला छात्र कसम खाता है कि झूठ के अलावा कभी किसी को सत्य नहीं समझेगा. झूठ ही सत्य है इसके लिए पॉलिटिकल ट्रेनिंग चलती रहती है. इस यूनिवर्सिटी के छात्रों ने भीड़ बनाने में राष्ट्रीय भूमिका अदा की है जिसकी सबसे बड़ी कामयाबी है जहां तहां लोगों को घेरकर मार देना. इन दिनों आप झारखंड के मुख्यमंत्री, पुलिस प्रमुख किसी के बयान सुनिए, लगता है कि वे व्हाट्स ऐप की अफवाहों से खासे परेशान हैं.
  • मोदी सरकार के 3 साल - अंतरराष्ट्रीय मंच पर अधिक मुखर हुआ भारत
    पड़ोसियों से रिश्ते बेहतर करने पर मोदी सरकार की विदेश नीति का बड़ा जोर रहा है. रिश्ते सुधारने की लाख कोशिशों के बावजूद चीन और पाकिस्तान भारत के लिए बड़ा सिरदर्द बने हुए हैं. लेकिन जहां तक अफगानिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल का सवाल है, हालात अलग हैं.
  • जवानी में होती है मासूमियत, बचपन में कहां...?
    बच्चे चंट होते हैं, मासूमियत तो जवानी में होती है... बुढ़ापा बेरुखेपन और क्रूरता के बीच झूलता है, अधेड़ उमर काइयां होती है, पर मासूमियत तो जवानी में होती है... बचपन की मासूमियत अब सिंथेटिक है... क्यूटनेस मैनुफैक्चर्ड है...
  • प्राइम टाइम इंट्रो : अहम सवाल, देश में जीएम सरसों की पैदावार होनी चाहिए?
    हजारों साल से प्राकृतिक सरसों हमारे भरोसे का साथी रहा है. प्राकृतिक सरसों इसलिए कहा क्योंकि अब एक नया सरसों आ सकता है जिसे वैज्ञानिक भाषा में जेनेटिकली मोडिफाइड मस्टर्ड कहते हैं. हिन्दी में जीएम सरसों कह सकते हैं. पूरी दुनिया में जीएम फूड यानी जेनिटिकली मोडिफाइड अनाजों के खाने और असर को लेकर बहस चल रही है. भारत में इस बहस का नतीजा यह निकला कि 2010 में बीटी ब्रिंजल, बीटी बैंगन पर रोक लगा दी गई. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी जीईएसी ने पर्यावरण मंत्रालय को सौंपी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जीएम मस्टर्ड की व्यावसायिक खेती की अनुमति दी जा सकती है. पर्यावरण मंत्रालय की वेबसाइट में जीएम फूड को लेकर सवाल-जवाब छापे गए हैं. इसमें कहा गया है कि सारे जीएम फूड को हम एक तराजू पर नहीं तौल सकते.
  • कठघरे में खड़ा एक तथाकथित क्रांतिकारी नेता
    मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति भी यह सोचने को मजबूर है कि बात-बात पर, यहां तक कि बिना बात का भी बतंगड़ बनाकर लगभग रोजाना ही दहाड़ने वाला वह शेर आज मौन क्यों है? आरोप कोई बाहरी व्यक्ति नहीं लगा रहा है. लगाने वाला उन्ही के मंत्रीपरिषद का उनका एक विश्वसनीय साथी है. तो क्या उन आरोपों का उत्तर चुप्पी होगी ? देश के वित्तमंत्री ने उन पर मानहानि का मुकदमा ठोंक दिया है. यह विकल्प केजरीवाल के पास भी है. क्या वे भी कपिल मिश्रा के साथ ऐसा ही कुछ करके जनता के सामने अपने निर्दोष होने का प्रमाण पेश करेंगे?
  • नरेंद्र मोदी सरकार के तीन साल - भारत-पाक संबंधों में बरकरार है तनाव...
    पाकिस्तान से अगर बात भी की जाए, तो किससे - नवाज़ शरीफ से, या पाक सेना से...? पाकिस्तान में भी अगले साल चुनाव होने हैं, तो क्या पाकिस्तान का कोई भी नेता बात करने को तैयार होगा...? और बात करने के लिए भारत सरकार को अपने कड़े रुख से कितना पीछे हटना होगा...?
  • अरुंधती रॉय के खिलाफ 'हेट क्लब' और देश की परिभाषा...
    अगर अरुंधती रॉय पहले जैसा लेखन करती रहतीं, तो शायद आज भारतीय मध्यवर्ग की आंखों का तारा होतीं, लेकिन बुकर के बाद उन्होंने एक ऐसा लेख लिख दिया, जिससे उनके बारे में कई लोगों की धारणा बदल गई. अब अरुंधती प्रवाहमयी भाषा और शब्दों के जादू की साम्राज्ञी नहीं रहीं, तिरंगे और देश की संप्रुभता को ललकारने वाले लेखक बन गईं.
  • मुख्य आर्थिक सलाहकार को भी एक पहेली लगी नोटबंदी...
    नोटबंदी पर रिज़र्व बैंक के गवर्नर के बहुप्रतीक्षित लेखे-जोखे के पेश होने के पहले देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार का यह बयान इस समय समीक्षकों में हलचल ज़रूर पैदा कर रहा होगा...
  • चम्पारण बनाम कोल्हान : किसे याद रखेंगे हम...?
    सोचना होगा कि इस देश में शांति की स्थापना के लिए युद्ध की वकालत करने वाले लोगों को क्या वास्तव में हिंसा में ही इसका रास्ता दिखता है...? यदि हिंसा में हल को खोजा जाएगा तो यह हल केवल देश की सीमाओं तक नहीं रह पाएगा, यह मानसिकता कब आपकी अपनी चौखट तक चली आएगी, इसका पता भी नहीं चलेगा...
  • प्राइम टाइम इंट्रो : नेताओं में मानहानि की होड़ क्यों मची?
    मानहानि किसकी होती है, कैसे होती है और कितने की होती है, यह सब किस तराजू पर तौला जाता है, अब जान लेने में ही हम सब की भलाई है. वित्त मंत्री जेटली की मानहानि दस करोड़ की हुई है या बीस करोड़ की, इसका फैसला तराजू पर तौल कर होगा या हैसियत का भी कोई बैरौमीटर होता है उससे होगा.
  • मोदी सरकार के 3 साल : पीएम मोदी की चीन नीति कहाँ है?
    अगर चीन की बात करें तो झूला कूटनीति की तस्वीर याद आती है. 2014 में चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग जब भारत आए तो उस वक्त कुछ ऐसा माहौल बना कि लगा कि शायद अब रिश्ते बेहतरी की तरफ तेज़ी से बढ़ेंगे.
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