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विचार
  • नागरिकता कानून के विरोध में सड़कों पर नागरिक असम से केरल तक
    रवीश कुमार
    नागरिकता कानून के विरोध में नागरिकों का बड़ा समूह देश के अलग-अलग हिस्सों में सड़कों पर उतर आया है. सभी प्रदर्शनों को कवर करना मुश्किल है क्योंकि इनका स्केल इतना बड़ा है और संगठनों की संख्या बहुत अधिक है. यह प्रदर्शन पूर्वोत्तर, खासकर असम में जाकर भाषा और संस्कृति का सवाल लेता है तो दक्षिण में भी यह तमिल प्रश्न बन जाता है. लेकिन समस्त भारत में इसके विरोध का व्यापक स्वरूप इस बात पर जाकर टिकता है कि यह कानून धर्म के आधार पर भेदभाव करता है. सरकार ने बार-बार संसद में कहा कि यह भेदभाव नहीं है लेकिन इसके बाद भी सड़कों पर हो रहे प्रदर्शनों की तस्वीरें बता रही हैं कि इन्हें रिजेक्ट करने का एक ही तरीका है. इनका कवरेज ही न हो लेकिन अगर आप इन प्रदर्शनों की तस्वीरों में झांककर देखें तो बहुत कुछ दिखता है.
  • बलात्कार क्या वाकई आपको डराता है...?
    प्रियदर्शन
    बलात्कार कोई हल्का अपराध नहीं है. वह इस मायने में बाकी अपराधों से अलग है कि वह एक पूरे समुदाय की अस्मिता पर हमले की तरह आता है. इसलिए बलात्कार को लेकर किसी भी तरह की हल्की बात किसी संवेदनशील आदमी को चोट पहुंचाती है. बलात्कार पर राजनीति भी चोट पहुंचाने वाली चीज़ है. दुर्भाग्य से पिछले तमाम वर्षों में यह राजनीति लगातार जारी है.
  • जिस विचारधारा ने देश को बांटा है
    प्रियदर्शन
    राजनीति जब इतिहास की गलियों में उतरती है तो बहुत कीचड़ पैदा करती है. वह अपने तात्कालिक इरादों को इतिहास के तथ्यों पर थोपने की कोशिश करती है और जब पाती है कि इतिहास उसके खयालों और प्रस्तावों की तस्दीक नहीं कर रहा है तो अपनी ज़रूरत के हिसाब से उसे सिकोड़ने या फैलाने में लग जाती है.
  • एक देश एक कानून की सनक का मिसाल है नागरिकता बिल
    रवीश कुमार
    देश ऐसे ही होता है. अलग अलग भौगोलिक क्षेत्रों के लिए अलग कानून की ज़रूरत पड़ती है. भारत ही नहीं दुनिया भर में कानूनों का यही इतिहास और वर्तमान है. एक देश के भीतर कहीं कानून भौगोलिक कारणों से अलग होता है तो कहीं सामुदायिक कारणों से.
  • क्या हमने CAB पर पूर्वोत्तर की शिकायतों को ठीक से सुना?
    रवीश कुमार
    यह पूर्वोत्तर की ज़रूरत है. भारत के अन्य सरहदी इलाकों में भी इनर लाइन परमिट सिस्टम है. कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के सरहद से लगे इलाकों में है. यह कानून 1873 के अंग्रेज़ी कानून की विरासत है. 2019 में पहली बार मणिपुर में लागू किया जाएगा. नए नागरिकता कानून के तहत जिन लोगों को भारत की नागरिकता मिलेगी वो मणिपुर, मिज़ोरम, नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश में जाकर नहीं बस सकते हैं.
  • नागरिकता संशोधन बिल की आड़ में क्‍या है सरकार की पॉलिटिक्‍स?
    अश्विन कुमार सिंह
    भारतीय जनता पार्टी (BJP), जिसका पूरा जनाधार ही हिन्दुत्व के मुद्दे पर आधारित है, अब लगता है कि इसी मुद्दे को सत्ता में बने रहने के लिए हथियार के तौर पर उपयोग करने जा रही है. ऐसा इसलिए लिख रहा हूं, क्योंकि 2019 में प्रचंड जीत हासिल करने के बाद से पार्टी में आत्मविश्वास है कि जनता उसके हिन्दुत्व और राष्ट्रप्रेम वाली छवि को ध्यान में रखकर देश में होने वाले सभी चुनावों में वोट करेगी.
  • दुनिया की सबसे कमउम्र प्रधानमंत्री, जो हफ्ते में सिर्फ 24 घंटे काम करने पर विश्वास रखती हैं
    सुशील कुमार महापात्र
    समानता में विश्वास रखने वाली साना मरीन का मानना है कि किसी भी इंसान को एक हफ्ते में सिर्फ 24 घंटे काम करना चाहिए और ज़्यादा से ज़्यादा समय अपने परिवार को देना चाहिए. अगस्त के महीने में जब वह यह प्रस्ताव लेकर सामने आई थीं, तो इसे किसी ने नहीं माना था, लेकिन अब वह प्रधानमंत्री बन गई हैं, सो, देखना होगा कि सप्ताह में सिर्फ 24 घंटे काम करने वाला प्रस्ताव पारित हो पाएगा या नहीं. साना मरीन अपने परिवार को लेकर भी काफी सक्रिय रहती हैं, और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर अपने परिवार के साथ तस्वीरें पोस्ट करती रहती हैं.
  • 'नागरिकता संशोधन बिल' और नीतीश कुमार का सिद्धांतों से समझौता, यह 'यू टर्न' तो अद्भुत है
    मनीष कुमार
    क्या बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाने के लिए राजनीति में सारे सिद्धांतों से समझौता कर लिया है? या नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के सामने सत्ता में बने रहने के लिए घुटने टेक दिए हैं.  ये दोनों सवाल नगरिकता संशोधन बिल पर जनता दल यूनाइटेड के समर्थन के बाद सब कर रहे हैं.
  • नागरिकता संशोधन बिल में मुस्लिम शरणार्थी क्यों नहीं?
    रवीश कुमार
    वसुधैव कुटुंबकम वाले भारत में आपका स्वागत है. पूरी दुनिया को कुटुंब यानी परिवार मानने वाले भारत की संसद में एक विधेयक पेश हुआ है. जिस भारत के सभी धर्मों को मानने वाले लोगों ने दुनिया के कई देशों में स्वेच्छा से नागिरकता ली है, उन्हें मिली भी है, उनके भारत में एक विधेयक पेश हुआ है. जिन्हें हम नॉन रेजिडेंट इंडियन कहते हैं उन्हें भी यह जानना चाहिए कि नागिरकता संशोधन विधेयक के तहत पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश यानी सिर्फ तीन पड़ोसी देशों से प्रताड़ना यातना के शिकार हिन्दू, ईसाई, पारसी, जैन, सिख और बौद्ध को नागरिकता दी जाएगी. इसमें एक मज़हब का नाम नहीं है. मुसलमान का.
  • नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए भी संदेश छिपा है बी.एस. येदियुरप्पा की जीत में
    स्वाति चतुर्वेदी
    कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा ने सोमवार सुबह उपचुनाव के रूप में कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर (JDS) के मुकाबले एक बड़ी लड़ाई जीतकर दिखाई है, जिसमें बहुत कुछ दांव पर लगा था. मोटे तौर पर इन्हीं दोनों विपक्षी पार्टियों से आए नेताओं की बदौलत BJP सोमवार दोपहर 12 बजे तक कुल 15 में से 12 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल करती नज़र आ रही थी.
  • हादसों पर पांव रख कर चलता देश और नागरिकता पर बहस
    प्रियदर्शन
    दरअसल यह देश अपने गरीब लोगों के साथ बहुत क्रूर है. वह उन सारी अनियमितताओं से सीधे आंख मूंदे रहता है जो उस पर असर नहीं करतीं. बहुत सारी अनियमितताओं को वह बढ़ावा देता है जिसका फ़ायदा उसे मिलता है. नियमों की अनदेखी कर बरसों से चल रहा ये कारख़ाना भी इसी कार्यसंस्कृति की उपज होगा, इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए.
  • अमरीका में दूध ख़रीदना वैज्ञानिक हो जाने जैसा होता है
    रवीश कुमार
    इस बार मौंटेरे के एक स्टोर में संगीता ने कहा कि यहां सबसे पीछे दूध के उत्पाद रखे होते हैं क्योंकि उसकी बिक्री ख़ूब होती है. सबसे पीछे इसलिए रखते हैं ताकि आप जब ख़रीदने आएं तो बाक़ी सामान भी देखते चलें और ख़रीदने को प्रेरित हों.
  • एक झूठ इस प्रधानमंत्री पर पड़ा भारी, क्या भारत के नेता भी कुछ सीखेंगे?
    सुशील कुमार महापात्र
    झूठ बोलने की वजह से फिनलैंड के प्रधानमंत्री एंटी रिने (Antti Rinne) को इस्तीफा देना पड़ा है लेकिन हमारे यहां तो सरकार बनाने और चुनाव जीतने के लिए नेता अनगिनत झूठ बोलते हैं. यहां तो राजनीति की शुरुआत ही झूठ से होती है. फिनलैंड के प्रधानमंत्री ने देश में चल रही पोस्टल स्ट्राइक को लेकर संसद को गुमराह किया था. उनका झूठ पकड़ा गया और उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा.
  • उन्नाव की पीड़िता का निधन हो गया, अगला पब्लिक ओपिनियन कब बनेगा?
    रवीश कुमार
    उन्नाव की पीड़िता का निधन हो गया. कोर्ट जाने के रास्ते उसे जला दिया गया. वो जीना चाहती थी लेकिन नहीं जी सकी. व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी और सोशल मीडिया के इस कथित पब्लिक ओपिनियन का दोहरापन चौबीस घंटे में ही खुल गया.
  • महिलाओं की सुरक्षा में घोर लापरवाही, 5 साल में केंद्र ने राज्यों को निर्भया फंड के लिए दिए 2000 करोड़, पर 20% भी नहीं हुए खर्च
    रवीश कुमार
    आप अगर इतने ही परेशान हैं तो अपने शहर के अंधेरे कोनों की पहचान कीजिए और सांसदों/विधायकों से कहिए कि अपने फंड से वहाँ लाइट लगाएँ. वे लगाते भी हैं.ू
  • क्या ऐसे ही भारत में इंसाफ़ होगा?
    रवीश कुमार
    फास्ट ट्रैक कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जजों को अपने कोर्ट रूम में ताला लगाकर शिमला चले जाना चाहिए और वहां बादाम छुहाड़ा खाना चाहिए. क्योंकि उनका काम खत्म हो गया है. क्योंकि सोशल मीडिया से लेकर संविधान की शपथ लेकर सासंद बने और टीवी पर आने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तेलंगाना पुलिस की एक असामाजिक करतूत को सही ठहरा दिया है. पुरुषों के अलावा बहुत सी महिलाएं भी उस पब्लिक ओपिनियन को बनाने में लगी हैं और अपने बनाए ओपिनियन की आड़ में इस एनकाउंटर को सही ठहरा रही हैं.
  • हिन्दी प्रदेश को कचरे के ढेर में बदलने के लिए एक और तैयारी पूरी : नागरिकता संशोधन विधेयक
    रवीश कुमार
    जिस तरह से धारा 370 की राजनीति कश्मीर के लिए कम हिन्दी प्रदेशों को भटकाने के लिए ज़्यादा थी उसी तरह से नागरिकता संशोधन बिल असम या पूर्वोत्तर के लिए हिन्दी प्रदेशों के लिए ज़्यादा है. इन्हीं प्रदेशों में एक धर्म विशेष को लेकर पूर्वाग्रह इतना मज़बूत है कि उसे सुलगाए रखने के लिए ऐसे मुद्दे लाए जाते हैं ताकि वह अपने पूर्वाग्रहों को और ठोस कर सके. लगे कि जो वह सोच रहा है उसके लिए ही किया जा रहा है. इसकी भारी क़ीमत देश चुका रहा है.
  • नागरिकता देने में धार्मिक आधार पर भेदभाव क्यों?
    रवीश कुमार
    राष्ट्रवाद की चादर में लपेटकर सांप्रदायिकता अमृत नहीं हो जाती है. उसी तरह जैसे ज़हर पर चांदी का वर्क चढ़ा कर आप बर्फी नहीं बना सकते हैं. हम चले थे ऐसी नागरिकता की ओर जो धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव नहीं करती हो, लेकिन पहुंचने जा रहे हैं वहां जहां धर्म के आधार पर नागरिकता का फैसला होगा. नागरिकता को लेकर बहस करने वाले लोग पहले यही फैसला कर लें कि इस देश में किस-किस की नागरिकता अभी तय होनी है
  • क्या आज का भारत हाजी हबीब के लिए नागरिकता रजिस्टर का विरोध करेगा?
    रवीश कुमार
    असम की आबादी साढ़े तीन करोड़ ही है. नागरिकता रजिस्टर के नाम राज्य ने 1600 करोड़ फूंक दिए. राज्य के करीब 4 साल बर्बाद हुए. 2019 के अगस्त में जब अंतिम सूची आई तो मात्र 19 लाख लोग उसमें नहीं आ सके. इनमें से भी 14 लाख हिन्दू हैं. बाकी 5 लाख के भी कुछ रिश्तेदार भारतीय हैं और कुछ नहीं. इन सबको फॉरेन ट्रिब्यूनल में जाने का मौका मिलेगा. उसके बाद तय होगा कि आप भारत के नागरिक हैं या नहीं. वहां भी केस को पूरा होने में छह महीने से साल भर कर समय लग सकता है.
  • नागरिकता कानून देश का डीएनए बदलने की कोशिश
    प्रियदर्शन
    नागरिकता संशोधन बिल एक खतरनाक बिल है. यह बिल भारतीय राष्ट्र राज्य की मूल अवधारणा पर चोट करता है. यह उस प्रस्तावना की खिल्ली उड़ाता है जो हर भारतीय नागरिक को धर्म, जाति, भाषा या किसी भी भेदभाव से परे हर तरह की समता का अधिकार देती है. क्योंकि यह बिल पहली बार धर्म के आधार पर कुछ लोगों के लिए नागरिकता का प्रस्ताव करता है, और इसी आधार पर कुछ लोगों को बाहर रखे जाने की बात करता है. यह क़ानून इस देश के डीएनए को बदलने की कोशिश है.
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