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  • 24 घंटे लेट हो गई ट्रेन, छूट गई परीक्षा, रेलमंत्री बिज़ी हैं प्रचार में
    रवीश कुमार
    18 जनवरी की आधी रात से पहले राजस्थान के अलग-अलग हिस्सों से नौजवान आनंद विहार स्टेशन पर जमा हो गए थे, क्योंकि 19 जनवरी को सुबह 6:30 बजे भुवनेश्वर जाने वाली नंदनकानन एक्सप्रेस छूट न जाए. यह ट्रेन चलने से पहले ही 9 घंटे लेट हो जाती है. दोपहर 3 बजे दिल्ली से रवाना होती है.
  • कबाड़ से तैयार ताजमहल और एफिल टावर
    रवीश कुमार
    दक्षिण दिल्ली नगर निगम ने इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए बड़ौदा स्कूल ऑफ फाइन आर्ट्स के कलाकारों को बुलाया है. संदीप और अनुज ने बताया कि इससे पहले भी वे बड़ौदा में 70 से अधिक कलाकृतियां बना चुके हैं. शिल्पकार अनुज और संदीप ने बताया कि कबाड़ देखते ही उनके भीतर का कलाकार जाग जाता है कि इसका कुछ किया जाए. एक भी कबाड़ ख़रीदकर नहीं लाया गया, बल्कि ज़रूरत के हिसाब नगर निगम के गोदामों से ही खोजा गया.
  • गोदाम, चेक पोस्ट, बाइपास के उद्घाटन के लिए मोदी की 100 रैलियां
    रवीश कुमार
    पांच साल में सरकार के काम के विज्ञापन पर पांच हज़ार करोड़ से अधिक ख़र्च करने और लगातार रैलियां करते रहने के बाद भी प्रधानमंत्री सरकारी ख़र्चे से 100 रैलियां कर लेना चाहते हैं. आचार संहिता से पहले उन्होंने 100 रैलियां करने की ठानी है. इस लिहाज़ से 100 ज़िलों में उनकी रैली की तैयारी चल रही होगी.
  • 13 साल में 3-3 जांच एजेंसियों और अदालती मुकदमे के बाद भी नहीं उठ पाया सोहराबुद्दीन की मौत से पर्दा!
    सुनील कुमार सिंह
    इतना ही नहीं तो जज ने तुलसी प्रजापति की पुलिस मुठभेड़ में मौत को सही पाया लेकिन सोहराबुद्दीन शेख के कथित एनकाउंटर को अनसुलझा ही छोड़ दिया. दोनों मुठभेड़ों में कोई लिंक नहीं साबित होने का हवाला दे कथित साजिश की पूरी कहानी को ही दरकिनार कर दिया. पर ये नहीं बताया कि सोहरबुद्दीन को किसने मारा और कौसर बी की मौत कैसे हुई? अलबत्ता तीनों की मौत का दुख जरूर जताया. सवाल है जब मौत हुई है तो किसी ने तो मारा है पर 13 साल में सीआईडी, सीबीआई की जांच और अदालती मुकदमे के बाद भी इसका खुलासा नहीं हो पाया. आखिर क्यों?
  • केएल राहुल और हार्दिक पंड्या को ‘तबाह’ करने पर तुली है COA!
    मनीष शर्मा
    COA के सदस्यों विनोद राय और डायना एडुल्जी के आपसी मतभेद के कारण खुद सीओए और पूरा मामला और उपहास और चिंता के विषय में तब्दील हो गया है. कारण यह है कि इस जांच के 'ड्रामे' ने हार्दिक पंड्या और केएल राहुल के भविष्य को दांव पर लगा दिया है, जो पहले ही कहीं ‘ज्यादा सजा’ भुगत चुके हैं.
  • झूठ के आसमान में रफाल की कीमतों का उड़ता सच- हिन्दू की रिपोर्ट
    रवीश कुमार
    मोदी सरकार का तर्क रहता है कि भारत और फ्रांस के बीच जो करार हुआ है उसकी गोपनीयता की शर्तों के कारण कीमत नहीं बता सकते. मगर उस करार में कहा गया है कि गोपनीयता की शर्तें रक्षा से संबंधित बातों तक ही सीमित हैं. यानी कीमत बताई जा सकती है. कीमत क्लासिफाइड सूचना नहीं है. विवाद से पहले जब डील हुई थी तब सेना और सिविल अधिकारियों ने मीडिया को ब्रीफ किया था और बकायदा कीमत बताई थी.
  • क्या अपने अंतिम बजट में मोदी सरकार खोलेगी खजाना?
    अखिलेश शर्मा
    एक फरवरी को मोदी सरकार अपना अंतिम बजट पेश करेगी. चुनाव से सिर्फ दो महीने पहले आने वाला यह बजट अंतरिम होगा. यानी परंपरा के मुताबिक सरकार इसके जरिए चुनाव होकर नई सरकार बनने तक तीन महीनों के लिए होने वाले खर्च का इंतजाम करेगी. परंपरा यह भी है कि जाती हुई सरकार कोई बड़ा नीतिगत ऐलान इस अंतरिम बजट में नहीं करती है. लेकिन सवाल उठ रहा है कि क्या मोदी सरकार परंपरा को ताक पर रखकर इस अंतरिम बजट या वोट ऑन अकाउंट में आने वाले चुनावों के मद्देनजर बड़े ऐलान कर सकती है, ताकि वोटरों को लुभाया जा सके? कुछ ऐसे ऐलान हैं जिनका लंबे समय से इंतजार किया जा रहा है. सरकार के भीतर इन्हें लेकर चर्चा भी है.
  • हम सबको सींचने वाले नामवर अस्पताल में हैं
    प्रियदर्शन
    नामवर सिंह अस्पताल में हैं. 92 बरस की उम्र में उन्हें सिर पर चोट लगी है. अगर प्रार्थना जैसी कोई चीज़ होती है तो हिंदी के संसार को उनके लिए प्रार्थना करनी चाहिए. हमारी पीढ़ी का दुर्भाग्य है कि हमने उन्हें उनके उत्तरार्द्ध में देखा- उस उम्र में जब उनकी तेजस्विता का सूर्य ढलान पर था.
  • फ़सल बीमा से निजी कंपनियां बम-बम, सरकारी कंपनियों को घाटा
    रवीश कुमार
    सरकार का काम है कि वह ऐसी नीति बनाए कि सरकारी बीमा कंपनियों को प्रोत्साहन मिले. मगर जनता के पैसे से चलने वाले सरकारी बैंक के अधिकारियों को निजी बीमा कंपनी की पॉलिसी बेचने के लिए मजबूर किया गया.
  • सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम के फैसले पर सवाल
    रवीश कुमार
    जजों को नियुक्त करने वाली सुप्रीम कोर्ट की संस्था कॉलेजियम के फैसले को लेकर विवाद हो गया है. कॉलेजियम में सुप्रीम कोर्ट के पांच जज होते हैं. इस कॉलेजियम ने 12 दिसंबर की बैठक में तय किया कि दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस राजेंद मेनन और राजस्थान हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस प्रदीप नंदराजोग का प्रमोशन सुप्रीम कोर्ट में होगा. मगर उस बैठक के बाद सरकार को बैठक का फैसला ही नहीं भेजा गया.
  • कर्नाटक में सियासी नाटक, फायदा किसको?
    अखिलेश शर्मा
    ऐसा लगता है कि बीजेपी का मिशन कर्नाटक सिरे नहीं चढ़ सका है. ऑपरेशन लोटस पार्ट-टू में बीजेपी को फिलहाल कामयाबी मिलती नहीं दिख रही है. बीजेपी की कोशिश थी कि कांग्रेस के कम से कम 13 विधायक इस्तीफा दें, ताकि बहुमत का आंकड़ा कम हो और बीजेपी दो निर्दलीयों की मदद से बहुमत साबित कर सके. कहा जा रहा था कि मुंबई में एक पांच सितारा होटल में रुके कांग्रेस के नाराज तीन विधायक इस्तीफा दे सकते हैं, लेकिन देर रात तक ऐसा नहीं हुआ. उधर कांग्रेस के गायब पांच विधायकों में से दो वापस आ गए हैं.
  • CBI और सुप्रीम कोर्ट के दंगल से संवैधानिक संकट...
    विराग गुप्ता
    भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना आंदोलन में लोकपाल को हर मर्ज़ की दवा बताया गया. 'सुशासन' और 'अच्छे दिन' के नाम पर आम आदमी पार्टी (AAP) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने दिल्ली की सत्ता हासिल कर ली, पर लोकपाल का कोई अता-पता नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस और उसके बाद CBI में आधी रात को तख्तापलट की घटना के बाद संस्थाओं में आंतरिक संघर्ष बढ़ता जा रहा है. इन घटनाओं से भारत के लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था पर अनेक सवाल खड़े हो गए हैं.
  • उच्च शिक्षा की विडम्बनाएं और आरक्षण का ख़याल
    प्रियदर्शन
    यह देखना दिलचस्प है कि जो लोग अब तक सामाजिक आधार पर आरक्षण को प्रतिभा के विलोम की तरह देखते रहे और इसे भारतीय व्यवस्था का नासूर मानते रहे, वे अपील कर रहे हैं कि गरीबों के हक की ख़ातिर यह आर्थिक आरक्षण मान लिया जाए - बिना यह बताए कि हर महीने 65,000 रुपये कमाने वाले लोग किस कसौटी से गरीब कहलाएंगे.
  • राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के बेटे का विदेशों में काले धन का कारखाना : 'कैरवां' की रिपोर्ट
    रवीश कुमार
    कौशल श्रॉफ नाम के एक खोजी पत्रकार ने अमेरिका, इंग्लैंड, सिंगापुर और केमैन आइलैंड से दस्तावेज़ जुटाकर डोभाल के बेटों की कंपनी का खुलासा किया है. 'कैरवां' पत्रिका के अनुसार ये कंपनियां हेज फंड और ऑफशोर के दायरे में आती हैं. टैक्स हेवन वाली जगहों में कंपनी खोलने का मतलब ही है कि संदिग्धता का प्रश्न आ जाता है और नैतिकता का भी. यह कंपनी 13 दिन बाद 21 नवंबर 2016 को टैक्स केमन आइलैंड में विवेक डोभाल अपनी कंपनी का पंजीकरण कराते हैं.
  • सीएजी रिपोर्ट : रेलवे में ठेके पर काम कर रहे मज़दूरों को लूट रहे हैं ठेकेदार
    रवीश कुमार
    मीडिया में गढ़ी गई छवि के बरक्स अगर आप ठेके पर काम करने वाले मज़दूरों पर आई सीएजी की रिपोर्ट को देखेंगे कि तो पता चलेगा कि रेलवे बग़ैर किसी मंत्री के चल रहा है. राम भरोसे कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि राम भरोसे तो सारा देश चलता है.
  • शिक्षा हमारी सरकारों की प्राथमिकता में क्यों नहीं?
    रवीश कुमार
    सरकारी स्कूलों और कालेजों में शिक्षा की हालत ऐसी है कि जरा सा सुधार होने पर भी हम उसे बदलाव के रूप में देखने लगते हैं. सरकारी स्कूलों में लाखों की संख्या में शिक्षक नहीं हैं. जो हैं उनमें से भी बहुत पढ़ाने के योग्य नहीं हैं या प्रशिक्षित नहीं हैं.
  • क्या लोकसभा चुनाव में डिजिटल प्रचार से मिलेगी जीत?
    अखिलेश शर्मा
    वैसे तो कहा जा रहा है कि 2019 का चुनाव नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी होने जा रहा है. इन दोनों शख्सियतों की एक लड़ाई डिजिटल दुनिया में चल रही है जिसने बीजेपी और कांग्रेस दोनों के नेताओं और सांसदों की नींद उड़ा दी है. दरअसल, पीएम नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर जनता से नमो ऐप के जरिए बीजेपी सांसदों के कामकाज के बारे में राय मांगी है. खबर है कि बीजेपी बड़ी संख्या में मौजूदा सांसदों के टिकट काटेगी. ऐसे में माना जा रहा है कि मौजूदा सांसदों को दोबारा टिकट मिलेगा या नहीं, इसमें इस फीडबैक की एक बड़ी भूमिका होगी.
  • क्या IIT-JEE सचमुच दुनिया की सबसे कठिन परीक्षा है?
    अनुराग मेहरा
    वास्तव में बड़ा सवाल यह है कि क्यों IIT प्रवेश परीक्षा या JEE के लिए अब तक बहुविकल्पी प्रश्नों वाले फॉरमैट का इस्तेमाल करते हैं. यह फॉरमैट मशीन द्वारा ग्रेडिंग को संभव बनाने के लिए अपनाया गया था, और फिर लगातार बढ़ती आवेदकों की संख्या की वजह से ज़रूरत बन गया. उन पेपरों का मूल्यांकन, जिनमें हर 'लम्बे' जवाब को पढ़ा जाना होता था, असंभव होता जा रहा था, क्योंकि IIT के पास मानवीय रूप से पेपर जांचे जाने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं थे. इस समस्या का एक संभव हल यह था कि इस काम को आउटसोर्स कर दिया जाए, लेकिन IIT अपनी परीक्षा की निष्पक्षता की जी-जान से हिफाज़त करती रही हैं, और कभी किसी बाहरी एजेंसी को शामिल नहीं किया. यह भी हो सकता है कि लगभग 12 साल पहले जिस वक्त MCQ फॉरमैट को अपनाया गया था, उस वक्त किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि यह इतनी गंभीर समस्याएं पैदा कर देगा.
  • बहुत आसानी से मोदी सरकार को वॉकओवर दे रहा है विपक्ष
    यशवंत सिन्हा
    अतीत में भी राष्ट्रपति इन्हीं हालात में एक ही साल मे दो-दो संयुक्त सत्रों को संबोधित कर चुके हैं. लेकिन विश्लेषक इस बात से हैरान है कि लेखानुदान पारित करने के लिए सामान्य से काम के लिए दो सप्ताह का सत्र क्यों आहूत किया गया है, जबकि उसे दोनों ही सदनों में दो-दो दिन में निपटाया जा सकता था.
  • जेएनयू मामले में आम चुनाव से तीन महीने पहले ही चार्जशीट क्‍यों?
    रवीश कुमार
    जवाहर लाल यूनिवर्सिटी का मसला फिर से लौट आया है. 9 फरवरी 2016 को कथित रूप से देशदोह की घटना पर जांच एजेंसियों की इससे अधिक गंभीरता क्या हो सकती है कि तीन साल में उन्होंने चार्जशीट फाइल कर दी. वरना लगा था कि हफ्तों तक इस मुद्दे के ज़रिए चैनलों को राशन पानी उपलब्ध कराने के बाद इससे गोदी मीडिया की दिलचस्पी चली गई है. उस दौरान टीवी ने क्या क्या गुल खिलाए थे, अब आपको याद भी नहीं होंगे.
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