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दरकने लगी है 'चीन की दीवार', अब चेत जाना चाहिए उसे...

पिछले दिनों ही अमेरिका ने अपने 'यूएस-पैसिफिक' कमांड का नाम बदलकर 'यूएस-इण्डो-पैसिफिक' कमांड कर जिस प्रकार इस क्षेत्र में न केवल भारत को सर्वोपरिता को मान्यता दी है, बल्कि चीन के सैन्य एवं आर्थिक नायकत्व को भी ललकारा है.

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दरकने लगी है 'चीन की दीवार', अब चेत जाना चाहिए उसे...

कुछ समय पहले अमेरिका और चीन के बीच जिस व्यापारिक युद्ध की शुरुआत हुई थी, अब लगता है कि वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के कार्यकाल तक इतना बढ़ जाएगा कि चीन के अलग-थलग पड़ जाने के खतरे से इंकार नहीं किया जा सकता. इस बात के लक्षण अमेरिका की ही विदेश नीतियों में नहीं, यूरोप, एशिया और अफ्रीका के देशों की नीतियों में भी दिखाई देने लगे हैं और वे भी बहुत स्पष्ट तौर पर. विश्व व्यापार में चीन का बढ़ता दबदबा तथा समुद्री, विशेषकर हिन्द-प्रशांत महासागर के क्षेत्र में प्रभुत्व स्थापित करने की उसकी तानाशाही से भरा लालच, इसके लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं. इसके कारण ही जहां विश्व के राष्ट्र अपने-अपने स्तरों पर इसके विरोध में सामने आने लगे हैं, वहीं इसके लिए संयुक्त प्रयास भी शुरू हो गए हैं.

 
पिछले दिनों ही अमेरिका ने अपने 'यूएस-पैसिफिक' कमांड का नाम बदलकर 'यूएस-इण्डो-पैसिफिक' कमांड कर जिस प्रकार इस क्षेत्र में न केवल भारत को सर्वोपरिता को मान्यता दी है, बल्कि चीन के सैन्य एवं आर्थिक नायकत्व को भी ललकारा है. ट्रेड वार एक बात है, लेकिन जहां तक समुद्री रास्तों से दुनिया के देशों के साथ चीन से होने वाले व्यापार का प्रश्न है, इस तरह की होड़ निश्चित तौर पर आगे चलकर चीन का सिरदर्द बनेगी.


 
चीन और अमेरिका के बीच परस्पर तनाव कितना गहरा और तनावपूर्ण हो चुका है, इसका संकेत उस समय मिला, जब दोनों देशों के मतभेदों के कारण एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग की बैठक में संयुक्त वक्तव्य जारी नहीं किया जा सका.

 
यह बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि हाल ही में अमेरिका-जापान और यूरोपीय संघ ने विश्व व्यापार संगठन में सुधार लाने के लिए जिन बिन्दुओं पर सहमति जताई है, वे आगे चलकर चीन के विरुद्ध जाएंगे. इस सहमति का मूल संबंध बौद्धिक सम्पदा की सुरक्षा से है. चीन अमेरिका के सिलिकॉन वैली के अलावा ब्रिटेन और जर्मनी के कई स्टार्ट-अप में तेज़ी से निवेश कर रहा है. इसके कारण उसे उत्कृष्ट तकनीकी मिल जाती है, जिसका इस्तेमाल वह अपने असैन्य और रक्षा के क्षेत्र में करता है. वर्तमान में अमेरिका में 25,000 चीनी विद्यार्थी विज्ञान और प्रौद्योगिकी की उच्च शिक्षा ले रहे हैं. बाद में यही विद्यार्थी अपने इस तकनीकी ज्ञान का उपयोग इन दोनों क्षेत्रों में करेंगे. इसे देखते हुए कुछ दिनों पहले ही अमेरिका ने अपने घनिष्ट मित्र इस्राइल से कहा है कि वह चीनी कम्पनियों को उच्च गुणवत्ता वाली चीज़ें न बेचे.

 
एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन के साम्राज्यवादी मंसूबों को रोकने के लिए भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने मिलकर जिस क्वाड (चतुर्भुज) की स्थापना की है, उसे लेकर चीन का चिन्तित होना स्वाभाविक है और उसे चिन्तित होना भी चाहिए. इसी संदर्भ में भारत और जापान ने एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर बनाने की बात कही है. अफ्रीका के बहुत से देशों ने इस गलियारे के लिए सहमति भी दे दी है. इसके बन जाने के बाद अफ्रीका समुद्री रास्तों से सीधे-सीधे दक्षिण-पूर्वी एशिया से जुड़ जाएगा. कहने की ज़रूरत नहीं है कि यह एक प्रकार से चीन की मेरीटाइम सिल्क रोड के द्वारा यूरोप और अफ्रीकी देशों से व्यापार करके उन पर दबदबा कायम करने की उसकी नीति का व्यावहारिक जवाब है. वैसे भी भारत चीन की 'वन बेल्ट, वन रोड' की नीति का विरोध करने वालों में पहला देश रहा है. यहां तक कि सन् 2017 में जब इसके बारे में चीन में 29 देशों का शिखर सम्मेलन हुआ था, तब यूरोपीय संघ ने यह कहकर इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया कि इसमें पारदर्शिता की कमी है तथा यह योजना सामाजिक एवं पर्यावरणीय धारणीयता के पैमाने पर खरी नहीं उतरती. अमेरिका ने भी इसकी तुलना यूरोपीय साम्राज्यवादी नीति से की थी.

 मज़ेदार बात यह है कि चीन की बेल्ट रोड परियोजना का विरोध करने वालों में अब धीरे-धीरे वे देश भी शामिल होते जा रहे हैं, जो इससे पहले इसे स्वीकार कर चुके थे. इन्होंने अपने समझौतों को भंग करना शुरू कर दिया है.

 
कुछ दिन पहले ही राष्ट्रपति बनने के तुरन्त बाद मालदीव के मोहम्मद सोलिह ने चीन के साथ किए गए मुक्त व्यापार समझौते को अपने देश की एक बहुत बड़ी गलती मानते हुए, उससे बाहर निकलने की घोषणा कर दी. उन्होंने साफ तौर पर कहा कि चीन से कर्ज़ लेने के कारण उनका देश आर्थिक संकट में फंस गया है.

 
मलेशिया के प्रधानमंत्री ने चीन के द्वारा बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के बहाने अपना प्रभुत्व जमाने की कोशिशों को उसकी विस्तारवादी नीति कहते हुए उसकी कड़ी आलोचना की है. अपनी चीन यात्रा के दौरान उन्होंने चीन के साथ हुए अरबों डालर के समझौतों को रद्द भी कर दिया.

 
श्रीलंका ने भी अपना एक द्वीप चीन को 99 वर्ष के लिए दे दिया है, जिसे लेकर श्रीलंका में काफी रोष है. यहां तक कोशिश है कि हम्बनटोटा बन्दरगाह पर से चीन की पकड़ कमज़ोर हो जाए.

 
बांग्लादेश ने तो चीन द्वारा पद्मावती नदी पर बनाए जाने वाले पुल तथा सड़क निर्माण की हज़ारों करोड़ डॉलरों वाले प्रस्ताव को मानने से साफ तौर पर इंकार कर दिया है.

 
चीन को सबसे अधिक चिन्तित करने वाली बात है - पाकिस्तान में बढ़ रहा चीन के प्रति असंतोष का भाव, जो इस पूरे क्षेत्र में नेपाल के बाद उसका सबसे विश्वसनीय मित्र है. ग्वादर बन्दरगाह को लेकर बलूचिस्तान में जबर्दस्त असंतोष जारी है. नागरिक इसे इस मायने में अपनी प्रभुसत्ता के विरुद्ध मान रहे हैं कि अपने ही देश के अपने ही बन्दरगाह में उनके प्रवेश करने की मनाही है. ठीक इसी प्रकार का विरोध बलूचिस्तान से होकर निकलने वाली उस सड़क का है, जो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को ग्वादर बन्दरगाह से जोड़ेगी. इस सड़क का निर्माण चीन कर रहा है. बलूचिस्तान में चीन के जबर्दस्त विरोध का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है कि कुछ दिन पहले ही बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी नामक एक संगठन ने कराची स्थित चीन के वाणिज्य दूतावास में बम विस्फोट कर विरोध जताया. बलूचिस्तान में चीन 46 अरब डॉलर का निवेश करने जा रहा है.

 
इन बातों से स्पष्ट है कि दुनिया के देश अब चीन की वास्तविक इच्छा को जानने लगे हैं. अपनी इस विस्तारवादी नीति को पूरा करना चीन के लिए आसान नहीं होगा. चीन को यह समझना ही होगा कि कहीं ऐसा न हो कि इसका दुष्प्रभाव उसके वर्तमान अंतरराष्ट्रीय स्थिति से भी उसे नीचे पहुंचा दे.

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डॉ. विजय अग्रवाल वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं...


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