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फादर्स डे - पि‍ता को बधाई ही नहीं, ‘छुट्टी’ भी दो

भारत दुनिया के उन 90 देशों में शामिल है जहां कि पितृत्व को लेकर कोई राष्टीय नीति नहीं है

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फादर्स डे - पि‍ता को बधाई ही नहीं, ‘छुट्टी’ भी दो
मातृत्व और पितृत्व सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों बराबर हैं। दोनों की भूमिकाएं अलग, लेकिन किसी को भी एक—दूसरे से कमतर नहीं किया जा सकता। फिर भला ऐसा कैसे हो जाता है कि जहां बच्चों की परवरिश की बात आ जाती है, वहां मां पहले आ खड़ी होती है। यह केवल सामाजिक व्यवहार में ही नहीं है। हम नीतिगत रूप से भी ऐसा मानते चले आए हैं। पितृत्व की भूमिका को व्यवस्थाओं और प्रावधानों ने सीमित करके रखा है।

 यूनीसेफ की ताजा रि‍पोर्ट के अनुसार भारत दुनिया के उन 90 देशों में शामिल है जहां कि पितृत्व को लेकर कोई राष्टीय नीति नहीं है। इसीलिए निजी ढांचों में तो नवजात बच्चों की देखभाल और उनके साथ समय बि‍ताने के लिए पर्याप्त वैतनि‍क छुट्टियों तक का प्रावधान नहीं हो पाया है। केवल भारत ही नहीं, रि‍पोर्ट के मुताबि‍क दुनि‍या में नए-नए आए दो ति‍हाई तकरीबन (9 करोड) बच्‍चे ऐसे हैं जि‍नके पि‍ताओं को एक भी दि‍न का वैतनि‍क अवकाश नहीं मि‍लता है।

हमें यह बात सोचनी चाहिए कि भारत दुनिया के उन संवेदनशील देशों में है जहां कि नवजात मृत्यु दर एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। यह एक बड़े कलंक की तरह है, लेकिन इससे निपटने के उपायों में केवल एक पक्ष ही शामिल क्यों हो। फादर्स डे जैसे मौके केवल कहानी—कविता और बधाई संदेशों के लिए ही तो नहीं हो सकता। यह केवल परीकथाओं सरीखा काल्पनिक संसार भी नहीं हो सकता, जहां हम पिता की वाहवाही करके उसे कुप्पा साबित कर सकें। पिता की भूमिका असल में निभाने के लिए कुछ और भी काम करने होंगे। हम फादर्स डे पर पिताओ को भले ही बधाईओं से गुलजार कर दें, पर क्या उनकी चुनौतियों और समस्याओं पर भी किसी संवाद के लिए तैयार होंगे।

भारत में बच्चों की स्थिति वैसे ही नाजुक है। नवजात बच्चों की तो और भी ज्यादा। देखिए कि भारत में वर्ष 2008 से 2015 के बीच आठ साल में 62.40 लाख नवजात शिशु मृत्यु का शिकार हुए हैं। जन्म के 28 दिन के अंदर मरने वाले इन बच्चों की यह संख्या थोड़ी नहीं है। देश के चार राज्यों (उत्तरप्रदेश, राजस्थान, बिहार और मध्यप्रदेश) में देश की कुल नवजात मौतों की संख्या में से 56 प्रतिशत मौतें दर्ज होती हैं। 

एक महीने से पांच साल की उम्र में बच्चों की मृत्यु का जितना जोखिम होता है, उससे 30 गुना ज्यादा जोखिम इन 28 दिनों में होता है। इसलिए सबसे बेहतर है कि इन 28 दिनों में बच्चों के खतरे को कम से कम करने के लिए उन्हें ज्यादा सुरक्षा, ज्यादा ध्यान और लाड़—प्यार दिया जाए, लेकिन ऐसा हो कहां पाता है। अपने आसपास ही देख लीजिए। कितने पिताओं को इसके लिए व्य​वस्थित रूप से छुटिटयां मिल पाती हैं, या दूसरी सुविधाएं मिल पाती हैं।

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एकल परिवार और नौकरीपेशा महि‍लाओं की बढती संख्‍या के कारण बच्चों की पर​वरिश का संकट और भयंकर रूप से बढ़ा है। परंपराओं में गर्भ से लेकर मातृत्व को प्राप्त होने तक और उसके बाद एक नवजात शिशु की परवरिश के जो ताने—बाने थे, वह भी तो इसके साथ ही साथ बिखर रहे हैं। समाज केवल रिश्ते ही तो नहीं खो रहा, उसके साथ भारतीय परिवेश के मुताबिक जो बेहतर और स्वभावजन्य था, वह भी खो रहा है, इसलिए जो चीजें व्यवहार से पीढ़ियों में आती थीं, वह गायब हैं। गूगल के अतिरेक नॉलेज में अपने काम की चीजें निकालना और उसे अपना लेना भी हम सहजता से कहां सीख पा रहे। 
देखिए कि आठ सालों में 26.30 लाख नवजात शिशुओं की मृत्यु समय पूर्व जन्म लेने के कारण हुई यानी 948 बच्चे हर रोज समय से पहले जन्म लेने के कारण ही मर जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन मानता है कि शिशु का समयपूर्व जन्म मृत्यु और जीवन में किसी न किसी किस्म की विकलांगता का बड़ा कारण बनता है। अब इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए कि समय पूर्व जन्म लेने वाले बच्चों की क्या चुनौतियां होती होंगी।

आखिर यह हालात बन ही क्यों रहे कि बड़ी संख्या में पहले ही जन्म हो रहे हैं। और यदि हो भी रहे हैं तो ऐसी परिस्थितियों में पिताओं की भूमिका कहीं बढ़कर हो जाती है, क्योंकि जन्म देने वाली ​स्त्री के पास उस परिस्थिति को भुगतने के सिवाय बहुत विकल्प नहीं होते, लेकिन ऐसी परिस्थितियों में निर्णय लेने से लेकर उसे अंजाम तक पहुंचा देने का काम तो केवल पिता का होता है। इस बात पर गौर भले ही नहीं किया जाता, पर मातृत्व की ​तरह पितृत्व भी तो उन्हीं ​चुनौतियों से गुजरता है।
वैसे इस बात पर अब चर्चा शुरू हो गई है। इस बात पर भी विचार किया जा रहा है कि पितृत्व को एक व्यवस्थित स्वरूप देकर उसे कानून प्रावधानों और नीतियों में लाया जाए। देखना है कि यह कब तक हो पाता है।


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