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रफाल मामले में क्या सरकार को वाकई क्लीनचिट मिल गई?

देखना चाहिए कि अदालत ने फैसले में क्यों लिखा है कि कई सवालों की समीक्षा उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है, तो फिर उन सवालों का जवाब कहां से मिलेगा.

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रफाल मामले में क्या सरकार को वाकई क्लीनचिट मिल गई?
नई दिल्ली:

रफाल पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया है. इस फैसले को बीजेपी अलग तरीके से पढ़ रही है और कांग्रेस अपने तरीके से पढ़ रही है. 29 पेज का ही फैसला है इसलिए आप सभी को पढ़ना चाहिए. देखना चाहिए कि अदालत ने फैसले में क्यों लिखा है कि कई सवालों की समीक्षा उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है, तो फिर उन सवालों का जवाब कहां से मिलेगा. अदालत ने यह कहीं नहीं लिखा है कि अब इन सवालों का जवाब कहीं और से न अदालत से नहीं लिया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच का फैसला है. इस बेंच में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस के एम जोसेफ थे. चार याचिकार्ता थे, जिनके बारे में जान लेते हैं कि वे अलग-अलग याचिकाओं में अदालत से क्या चाहते थे.

मनोहर लाल शर्मा अपनी याचिका में एफआईआर दर्ज कर जांच की मांग कर रहे थे. भारत और फ्रांस के बीच 36 रफाल विमानों की खरीद रद्द करने की मांग कर रहे थे. विनीत ढांडा ने अपनी याचिका में कहा है कि अखबारों में छप रही खबरों के कारण रिट याचिका दायर कर दी है. तीसरे याचिकाकर्ता सांसद संजय सिंह की मांग थी कि इस डील में खरीद की प्रक्रिया अवैध है और पारदर्शिता नहीं बरती गई. कोर्ट जांच करे कि विमान की कीमत में कैसे बदलाव आया, कोर्ट इसकी जांच करे. चौथे याचिकाकर्ता यशवंत सिन्हा प्रशांत भूषण और अरुण शौरी की मांग थी कि उनकी शिकायत पर सीबीआई ने एफआईआर दर्ज नहीं की है. उनका मानना था कि इसमें भ्रष्टाचार हुआ है. इसलिए कोर्ट एफआईआर दर्ज करने और जांच का आदेश दे.


अब अदालत इस सवाल को लेकर आगे बढ़ती है कि क्या वह टेंडर और कांट्रेक्ट से संबंधित प्रशासनिक फैसलों की न्यायिक समीक्षा कर सकती है. तीन फैसलों का उदाहरण देते हुए फैसले में लिखा गया है कि यह सड़क या पुल बनाने के टेंडर का मामला नहीं है, रक्षा से संबंधित खरीद की प्रक्रिया का मामला है. इसलिए न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित हो जाता है. फैसला अंग्रेज़ी में है इसलिए अनुवाद करने में चूक हो सकती है, फिर भी यही लगा कि अदालत रक्षा मामले के टेंडर को सड़क और पुल के टेंडर की प्रक्रिया में फर्क कर रही है. इससे दो बातें हो सकती हैं. आने वाले दिनों में रक्षा सौदों में कोई इसके आधार पर अदालत की समीक्षा से बच निकल सकता है, यह भी हो सकता है कि इसके सहारे कोई ग़लत और बेबुनियाद आरोपों से भी बच निकल सकता है. संभावनाएं दोनों हैं.

अदालत ने बार बार साफ किया है कि इस मामले में उसकी सीमा है. अरुण जेटली ने अदालत की सीमा की बात कही है. क्या इस फैसले से जवाब मिलता है कि हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड को डील से क्यों बाहर किया गया, इस पर फैसले में लिखा है कि '126 मीडियम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट जिनमें से 18 तैयार अवस्था में आने थे और बाकी 108 हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड द्वारा बनाए जाने थे. जिन्हें साइन करने की तारीख के बाद से 11 साल के भीतर तैयार करना था. सरकारी कागज़ात के अनुसार 126 विमानों की खरीद का अनुरोध प्रस्ताव मार्च 2015 में वापस लिया गया. 10 अप्रैल 2015 को 36 रफाल विमान खरीदने का भारत और फ्रांस के साझा घोषणापत्र में एलान होता है. इसे DAC, रक्षा खरीद कमेटी ने मंज़री दी थी. जून 2015 में 126 विमान खरीदने का अनुरोध प्रस्ताव वापस ले लिया जाता है.'

क्या उस साझा घोषणापत्र में लिखा है कि 126 विमानों वाला प्रस्ताव वापस लिया जाएगा? मार्च 2015 में 126 विमानों की खरीद का अनुरोध प्रस्ताव वापस लेने की बात अदालत के फैसले में है. अब ज़रा याद कीजिए. डील होती है 10 अप्रैल 2015 को. इसके दो दिन पहले यानी 8 अप्रैल को विदेश सचिव जयशंकर कहते हैं कि एचएएल डील में शामिल है. 10 अप्रैल के 14 दिन पहले यानी मार्च 2015 में ही रफाल के सीईओ एचएएल के डील में होने की बात पर खुशी जाहिर करते हैं. क्या उन्हें पता नहीं था, क्या उनकी जानकारी के बगैर कुछ बदल रहा था. इसका जवाब अदालत के फैसले से नहीं मिलता है. 

अब दूसरा सवाल है कि फैसले की प्रक्रिया क्या सही थी. तो अदालत कहती है कि हम इस बात से संतुष्ट हैं कि प्रक्रिया को लेकर संदेह करने का कोई मौका नहीं मिला. अगर कोई मामूली विचलन भी हुआ होगा, तो अदालत की समीक्षा की ज़रूरत नहीं है. हम इसकी समीक्षा नहीं कर सकते कि सरकार ने 126 की जगह 36 विमान क्यों खरीदे. एक बड़ा विवाद विमान की कीमतों को लेकर हुआ. बड़ा आरोप यही था कि यूपीए के समय की तुलना में विमान बहुत अधिक दाम में खरीदा गया है. और ऐसा किसी उद्योगपति को फायदा पहुंचनाने के लिए किया गया है. क्या कोर्ट ने इस पर क्लीन चिट दी है. कोर्ट ने जो लिखा है वो इस तरह से है...

'यह कहना पर्याप्त होगा कि सरकारी कागज़ात में दावा किया गया है कि 36 एयरक्राफ्ट की खरीद में व्यावसायिक लाभ है. यह भी दावा किया गया है कि रखरखाव और हथियारों के पैकेज के बारे में भी शर्तें बेहतर हैं. निश्चित रूप से यह कोर्ट का काम नहीं है कि वह इस तरह के मामले में कीमतों को लेकर तुलना करे. हम नहीं करेंगे क्योंकि इस मामले को गुप्त रखना ज़रूरी है.'

तो कोर्ट ने कीमतों को लेकर खुद कुछ नहीं कहा. सही है या गलत है ये नहीं कहा. फैसले में सरकारी दावे की बात कही गई है और आप भी पढ़ सकते हैं मगर यह नहीं कहा है कि हम सरकार के दावे को खारिज करते हैं या संतुष्ट हैं. बल्कि उसकी जगह यह कहा कि अदालत का यह काम नहीं है. तो सवाल है कि यह किसका काम है. इस सवाल पर आते हैं. अब आते हैं कि क्या अदालत ने अपने फैसले में अनिल अंबानी की कंपनी को ऑफसेट पार्टनर बनाए जाने को लेकर कुछ कहा है. भारतीय आफसेट पार्टनर के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हमने रिकार्ड पर पर्याप्त सामग्री नहीं देखी जिससे पता चलता हो कि यह मामला भारत सरकार द्वारा किसी को व्यावसायिक लाभ पहुंचाने का हो. भारत सरकार के हाथ में आफसेट चुनने का विकल्प नहीं है. 

अनिल अंबानी की कंपनी की तरफ से जवाब आया है. कहा गया है कि मैं कोर्ट के फैसले का स्वागत करता हूं. कोर्ट ने याचिकाओं को खारिज कर झूठ को उजागर कर दिया है. रिलायंस ग्रुप और मेरे खिलाफ आधारहीन और राजनीति से प्रेरित आरोप लगाए गए. हम भारत की सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्ध हैं. मेक इन इंडिया में अपना विनम्र योगदान दे रहे हैं.

कोर्ट ने बार बार कहा है कि कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कीमत या तकनीकि बातों की समीक्षा करना उसके दायरे की बात नहीं है. तो क्या यह निष्कर्ष सही होगा कि कोर्ट ने क्लीन चिट दे दिया है. अदालत ने अपने फैसले के निष्कर्ष में लिखा है कि हमें कोई कारण नज़र नहीं आता कि 36 विमानों की खरीद जैसे संवेदनशील मसले में दखल दें. कुछ लोगों की धारणा के आधार पर कोर्ट जांच के आदेश नहीं दे सकती है. खासकर ऐसे मामले में. इसलिए हम याचिकाओं को खारिज करते हैं.

अरुण जेटली के साथ रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण भी प्रेस के सामने मौजूद थीं और सवालों का जवाब दे रही थीं. बीजेपी इसे मानती है कि यह उसकी जीत है. राहुल गांधी ने झूठे आरोप गढ़े और वो अदालत में नहीं टिक सका. इसलिए उन्हें माफी मांगनी चाहिए. इस फैसले से उत्साहित बीजेपी अब संसद के दोनों सदनों में चर्चा के लिए तैयार है.

कांग्रेस का कहना है कि वह कोर्ट नहीं गई थी. रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि उन्होंने सितंबर के महीने में ही ट्वीट किया था. 14 सितंबर के ट्वीट में रणदीप सुरजेवाला ने कहा था कि 'हम रफाल घोटाले पर बीजेपी प्रस्तावित पीआईएल को रिजेक्ट करते हैं. यह जांच को गलत दिशा में भटकाने और पटरी से उतारने के लिए किया जा रहा है. हम संयुक्त संसदीय समिति की जांच की मांग उठाते रहेंगे.

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यह मामला फ्रांस में भी है. फ्रांस के एक पत्रकार ने ट्वीट किया है कि फ्रांस में नेशनल पब्लिक प्रोस्यिक्यूटर आफिस विचार ही कर रहा है कि इस मामले में जांच शुरू की जाए या नहीं. शाम साढ़े छह बजे राहुल गांधी मल्लिकार्जुन खड़गे को लेकर प्रेस के सामने आए. बीजेपी के हमले से लगा कि अब राहुल के पास कोई जवाब नहीं बचा है. उन्हें बैकफुट पर जाना होगा. लेकिन राहुल ने फिर कहा कि देश का चौकीदार चोर है.

इसके बाद राहुल गांधी जजमेंट के एक हिस्से को लेकर आक्रामक हो गए. फैसले में लिखा है कि कीमतों को लेकर सीएजी की रिपोर्ट को देखा गया है जिसे संसद की लोक लेखा समिति को सौंपा गया. राहुल ने कहा कि उस लोक लेखा समिति के अध्यक्ष तो मल्लिकार्जुन खड़गे हैं. उनकी जानकारी में ऐसी कोई सीएजी रिपोर्ट नहीं है तो फिर यह रिपोर्ट की बात कहां से आ गई. आपको बता दें कि करीब साठ पूर्व अधिकारियों ने सीएजी को लिखा था कि इसकी जांच करें. सीएजी की रिपोर्ट कहां है, वो कीमतों और खरीद की प्रक्रिया की जांच करेगी या नहीं लेकिन फैसले में सीएजी की रिपोर्ट का ज़िक्र देखकर राहुल गांधी आक्रामक हो गए. उन्होंने पूछा है कि जो रिपोर्ट किसी की नज़र में नहीं है, वो सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कैसे आ गई.



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