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क्‍या सरकार रोजगार में गिरावट को छुपा रही है?

इस रिपोर्ट में है कि नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस के लेबर फोर्स सर्वे 2017-18 के साल में बेरोज़गारी की दर 6.1 तक पहुंच गई जो 45 साल में सबसे अधिक है.

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क्‍या सरकार रोजगार में गिरावट को छुपा रही है?

अगर आपको यह बताया जाए कि 2017-18 के साल में भारत में बेरोज़गारी की दर पिछले 45 साल में सबसे अधिक है, तो आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी. लेकिन आपको उसके बाद यह बताया जाए कि जिस रिपोर्ट में यह बात है, उसे भारत सरकार सार्वजनिक नहीं करने दे रही है तब आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी. अगर सरकार यह रिपोर्ट जारी कर देती, कि 2016-17 के साल में बेरोज़गारी की दर 45 साल में सबे अधिक थी तो फिर उस सरकार के बाकी दावों का क्या होगा. आपसे कई बार कहा है कि रिपोर्टर के बग़ैर एंकर कुछ नहीं होता है. यह रिपोर्टर की ही रिपोर्ट है कि आज दिल्ली में सब इसकी चर्चा कर रहे हैं. बिजनेस स्टैंडर्ड के सोमेश झा की इस रिपोर्ट ने तहलका मचा दिया है.

इस रिपोर्ट में है कि नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस के लेबर फोर्स सर्वे 2017-18 के साल में बेरोज़गारी की दर 6.1 तक पहुंच गई जो 45 साल में सबसे अधिक है. यही वो रिपोर्ट है जिसके जारी न करने के विरोध में राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के कार्यवाहक प्रमुख पी सी मोहनन और सदस्य जे वी मीनाक्षी ने इस्तीफा दे दिया है. सरकार के पास पिछले दिसंबर से यह रिपोर्ट पड़ी है. जुलाई 2017 से जून 2018 के बीच सर्वे किया है. इसमें यह बात निकल कर आई है कि नोटबंदी के बाद शहरों में बेरोज़गारी की दर 7.8 प्रतिशत हो गई थी और गांवों में 5.3 प्रतिशत. अगर यह रिपोर्ट बाहर आती तो आप जान पाते कि 15 से 29 साल के युवाओं के बीच बेरोज़गारी की दर 17.4 है. आम तौर पर 3 प्रतिशत बेरोज़गारी की दर ही काफी मानी जाती है लेकिन युवाओं में 17.4 प्रतिशत बेरोज़गारी की दर हो तो आप समझ सकते हैं कि ज़मीन पर क्या हालात हैं.


यह रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है. उसी के विरोध में मोहनन ने राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग से इस्तीफा दे दिया है. एनडीटीवी की मरियम से फोन पर बात करते हुए उन्होंने बताया है कि काफी समय से महसूस हो रहा था कि सरकार उन्हें दरकिनार कर रही है.

क्या सरकार को यह रिपोर्ट पब्लिक के सामने नहीं रख देनी चाहिए. सेंटर फॉर मानिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के महेश व्यास लगातार लिख कर बता रहे हैं कि नौकरी की स्थिति बहुत ख़राब है. उनके सर्वे में भी हमेशा बेरोज़गारी इसी तरह झलक रही थी. कुछ हफ्ते पहले प्राइम टाइम में बात करते हुए उन्होंने कहा था कि उनके जो आंकड़े हैं वो काफी सहम कर बताए जा रहे हैं. अगर सही सही देखा जाए तो बेरोज़गारी की दर 9 प्रतिशत से भी अधिक है. जब 6.1 प्रतिशत में ही 45 साल का रिकार्ड टूट गया तो सोचिए 9 प्रतिशत में क्या हाल होता.

महेश व्यास की संस्था सीएमआई की ताज़ा रिपोर्ट और नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस की लेबर रिपोर्ट के नतीजों में खास फर्क नहीं है. बल्कि महेश व्यास के आंकड़े में तो बेरोज़गारी और भी अधिक है. जनवरी के पहले हफ्ते में महेश व्यास ने डेढ़ लाख से अधिक घरों के सर्वे के नतीजे में बता दिया था कि दिसंबर 2018 में बेरोज़गारी की दर 7.4 प्रतिशत हो गई है. पिछले 15 महीने में यह सबसे अधिक है. महेश व्यास ने बताया कि दिसंबर 2017 में जितने लोग काम पर थे, उसकी तुलना में दिसंबर 2018 में काफी कमी आई. एक साल के भीतर 1 करोड़ दस लाख लोगों के हाथ से काम चला गया था. रोज़गार में यह बहुत ही भारी गिरावट है.

अब एक तारीख याद रखें. मई 2017 में प्रधानमंत्री कार्यालय एक टास्क फोर्स बनाता है कि वह नौकरी का डेटा विश्वसनीय तरीके से पता लगाने के लिए उपाय सुझाए. इसका काम दिया गया उस समय नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया को. उनकी अध्यक्षता में बने टास्क फोर्स ने 30 अगस्त 2017 को ही अपनी रिपोर्ट जमा करा दी. 31 अगस्त 2017 को अरविंद पनगढ़िया ने नीति आयोग के उपाध्यक्ष पद को अलविदा कह दिया और वे कोलंबिया यूनिवर्सिटी चले गए जो न्यूयार्क में है. उनका कहना था कि ऐसी नौकरी फिर नहीं मिलेगी.

अब सोमेश झा ने 2 जनवरी 2019 को इस रिपोर्ट के बारे में खबर लिखी थी. सोमेश ने लिखा है कि अरविंद पनगढ़िया ने 30 अगस्त 2017 को अपनी रिपोर्ट सौंप दी जो प्रधानमंत्री कार्यालय के अलावा श्रम मंत्रालय, नीति आयोग के पास है. सोमेश की रिपोर्ट के अनुसार दो साल पहले जमा हुई इस रिपोर्ट में सुझाव दिया गया था कि गांवों और शहरों में रोज़गार की स्थिति का डेटा हर महीने कैप्चर किया जाए. अरविंद पनगढ़िया की रिपोर्ट में यह बात थी कि फिलहाल के लिए जो नेशनल सैंपल सर्वे आफिस का डेटा आने वाला है वो नौकरी के डेटा में जो अंतर आता है, उसे भर सकता है. यानी जिस रिपोर्ट के बारे में सोमेश ने लिखा है कि 45 साल में बेरोज़गारी सबसे अधिक है, उस रिपोर्ट से ठीक ठाक पता चल सकता है, यह बात अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में जमा टास्क रिपोर्ट में कही गई है. जिसका ड्राफ्ट तो पब्लिक किया गया था मगर अंतिम रिपोर्ट का आज तक पता नहीं है.

जब 2017 में नौकरियों के डेटा जुटाने को लेकर टास्क फोर्स बन चुका था तो फिर जून 2018 में सरकार ने टी सी अनंत की अध्यक्षता में कमेटी क्यों बनाई गई. उस वक्त हुआ ये था कि भविष्य निधि संगठन आयोग के डेटा को लेकर सरकार बताने लगी कि इतने लाख लोगों को रोज़गार मिला है. फिर जब लोगों ने ईपीएफओ के डाटा को चैलेंज किया, सवाल उठाए तो टी सी अनंत की अध्यक्षता में एक पैनल बनाया गया. 16 जनवरी 2019 को टीसी अनंत ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है. इसकी रिपोर्टिंग भी सोमेश झा ने ही की है.

इसमें कहा गया है कि लेबर ब्यूरो के तिमाही सर्वे को बंद कर दिया जाए. या फिर लेबर ब्यूरो हर तिमाही एंटरप्राइज सर्वे करे जिसके आधार पर औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (iip) की तरह रोज़गार सूचकांक बनाया जा सके. जून 2017 में ही चीफ स्टेटिशियन प्रवीण श्रीवास्तव ने रोज़गार सूचकांक बनाने का विचार दिया था. जब वे श्रम मंत्रालय में अतिरिक्त महानिदेशक थे. रोजगार सूचकांक में ईपीएफ के डेटा का भी इस्तमाल हो सकता है. मार्च 2018 के बाद से लेबर ब्यूरो की तिमाही रिपोर्ट बंद कर दी गई थी.

सारी रिपोर्ट सोमेश झा की हैं. सरकार रिपोर्ट जबा रही है और सोमेश झा उनके बारे में रिपोर्टिंग कर देते हैं. सोमेश ने टीसीए अनंत कमेटी की रिपोर्ट को कवर किया. अरविंद पनगढ़िया वाले टास्क फोर्स की रिपोर्ट को कवर किया और अब 45 साल में सबसे अधिक बेरोज़गारी के आंकड़े को लिख दिया. इसका मतलब है कि यह रिपोर्टर अपना काम सधे हुए तरीके से किए जा रहा था. अब आपको एक और खबर की याद दिलाता हूं.

फरवरी 2018 में ईटी की यह खबर बता रही है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े मंत्रालयों से कहा है कि वे अपने सेक्टर में जो रोज़गार पैदा हुआ है उसकी सूची बनाएं. रेलवे, परिवहन विभाग, शहरी विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय जैसे विभागों की परियोजनाओं से कितने लोगों को रोज़गार मिला. अब प्रधानमंत्री कार्यालय ही बता सकता है कि फरवरी 2018 की इस रिपोर्ट का क्या रिज़ल्ट निकला.

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अब हम आपको बताते हैं कि सही डेटा क्यों ज़रूरी है. सही डेटा के आने से आपकी समझ में क्या फर्क आता है, इसके लिए पहले आप सूरत में प्रधानमंत्री का दिया भाषण पढ़िए. 'बलात्कार के आरोपियों को तीन दिन सात दिन मे सज़ा हो रही है. फांसी हो रही है.' प्रधानमंत्री का यह बयान ग़लत भी है और झूठ भी है. जब प्रधानमंत्री बलात्कार के मामले में सीधे सीधे गलत और झूठ बोल सकते हैं तो बाकियों का क्या कहा जाए. आप कैसे जानेंगे कि प्रधानमंत्री गलत और झूठ बोल रहे हैं तो आप अपने अनुभव से कह सकते हैं कि तीन दिन में तो एफआईआर दर्ज नहीं होती है, जांच, सुनवाई, सज़ा और फांसी कैसे हो जाएगी. क्या 7 दिन में हो सकती है. मगर डेटा बता देगा कि अभी तक निर्भया मामले के आरोपियों को ही फांसी नहीं हुई है. क्या प्रधानमंत्री सड़क पर किए जाने वाले न्याय की बात कर रहे हैं. जब लोगों के बीच यह खबर तेजी से फैली कि 45 साल में बेरोज़गारी की दर सबसे अधिक हो गई तब नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार मीडिया के सामने आए.

राजीव कुमार का तर्क है कि जीडीपी ग्रोथ हो रही है तो बिना रोज़गार के कैसे हो सकती है. आप इंटरनेट सर्च कीजिए. 2004-05 से लेकर 2009-10 के बीच जॉबलेस ग्रोथ की बात सरकार को स्वीकार करनी पड़ी थी. तब सरकार को इसी नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़े से दिक्कत हो गई थी मगर उस समय के किसी अर्थशास्त्री ने इसे बंद करने की बात नहीं की. 2010 से 2014 के बीच जब दोबारा सरकार आई तब भी किसी ने इसे बंद नहीं किया. जीडीपी रेट बढ़ने का मतलब यह कभी नहीं होता कि नौकरी की दर उससे अधिक हो जाएगी. यह किसने और किस आधार पर साबित किया है, हम भी जानना चाहेंगे.



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