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कश्मीरी नौजवानों के साथ ये रवैया कब बदलेगा?

क्या कश्मीरी होना अपने आप में अपराध हो चुका है कि जहां वे दिखाई दे वहां दो चार लोग लाठी डंडा लेकर पीटने लगें. क्या हम इस स्थिति में आ पहुंचे हैं, कभी सोचिएगा कि नफरत करने से पहले कश्मीर या कश्मीरियों के बारे में आप क्या जानते हैं.

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कश्मीरी नौजवानों के साथ ये रवैया कब बदलेगा?

हमारी लड़ाई कश्मीर को लेकर है, कश्मीरियों से नहीं है, प्रधानमंत्री ने यह बात देश से कही थी मगर उन्हीं की पार्टी के दो नौजवान कार्यकर्ताओं ने नहीं सुनी. क्या कश्मीरी होना अपने आप में अपराध हो चुका है कि जहां वे दिखाई दे वहां दो चार लोग लाठी डंडा लेकर पीटने लगें. क्या हम इस स्थिति में आ पहुंचे हैं, कभी सोचिएगा कि नफरत करने से पहले कश्मीर या कश्मीरियों के बारे में आप क्या जानते हैं. न्यूज़ चैनलों और व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के फैलाए प्रोपेगैंडा से आप कश्मीर और कश्मीरियों के बारे में राय रखते हैं तो आपको एक बार खुद को चेक करना चाहिए. वरना आधी अधूरी जानकारी आपको अपराध के रास्ते पर ले जा सकती है.

लखनऊ के दलीगंज ब्रीज के फुटपाथ पर अब्दुल सलाम और मोहम्मद अफ़ज़ल को ये नौजवान पीटने लगते हैं. एक हाथ में डंडा है. डंडा सही जगह लगे इसलिए एक को पकड़े रखता है. 1 मिनट और 20 सेकेंड के इस विजुअल में मारने वाले दो ही दिखाई दे रहे हैं. ज़ाहिर है घटना इतनी ही देर की नहीं होगी. यह घटना बुधवार शाम की है. इस वीडियो के अलावा भी आगे पीछे और भी बहुत कुछ हुआ होगा. किसी को सड़क से उठाकर इस तरह पीटा जाने लगे और उसकी पहचान खोज कर कि ये कश्मीरी है, आप उसकी हताशा और बेबसी को नहीं समझ सकते हैं. क्योंकी न्यूज़ चैनलों और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की प्रोपेगैंडा मशीनरी ने आपकी चेतना को नष्ट कर दिया है. यह दृश्य किसी कश्मीरी को मारने भर का नहीं है. इसका भी है कि अब कुछ लोग लाठी डंडा लेकर आएंगे और आपको भारत के संविधान की दी हुई पहचान और अधिकार से बेदखल कर देंगे. जो सलूक इन कश्मीरी नौजवानों के साथ हुआ है वो आपके साथ भी होगा, बल्कि इसी प्राइम टाइम में बताऊंगा कि जो कश्मीरी नहीं हैं उनके साथ भी हो रहा है. इनके कुर्ते के रंग से मुझे कोई शिकायत नहीं, बल्कि इस रंग के मेरे पास तीन कुर्ते हैं. लेकिन यह सवाल है कि क्या पिटाई करने से पहले इन लोगों ने इस रंग के कुर्तो को यूनिफार्म समझ कर पहना कि ये रंग डालकर ऐसी हरकत करेंगे तो कोई कुछ नहीं बोलेंगे. अगर ऐसा है तो इन्हें समझाना चाहिए कि यह रंग अब राजनीतिक भी हो चुका है. तो विचारधारा को पहनकर जब भी चलें ऐसी हरकत न करें.

बीस साल से मोहम्मद अफ़ज़ल नायक और अब्दुल सलाम लखनऊ आकर फुटपाथ पर काजू, किसमिस अखरोट और बादाम बेच रहे हैं. हम सबके मोहल्लों में कश्मीर के लोग शॉल लेकर आते हैं. अफ़ज़ल और अब्दुल सलाम को फुटपाथ से उठाकर मारा गया, आतंकवादी कहा गया और कश्मीरी कहा गया. भारतीय होने का प्रमाण मांगा गया. आपको भी चेक करना चाहिए कि क्या आपको कश्मीरी दिखने पर गुस्सा आता है, लगता है आप इन्हीं दिनों में कश्मीर नहीं गए हैं. वहां गए पर्यटकों से पूछिए. क्या उन्होंने कभी ऐसी शिकायत की है कि वहां के लोग देखते ही नफरत करने लगे हों. जम्मू कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक से पूछ लीजिए.

उत्तर प्रदेश पुलिस ने इस मामले में चार लोगों को गिरफ्तार किया है. दो विश्व हिन्दू दल के हैं. दो भारतीय जनता युवा मोर्चा के हैं. जो बीजेपी की युवा शाखा है. हमारे सहयोगी आलोक पांडे ने इन दोनों के फेसबुक प्रोफाइल पर जाकर देखा है.

फेसबुक प्रोफाइल से बंजरंग सोनकर के बारे में काफी कुछ पता चलता है. भारतीय जनता युवा मोर्चा का नेता बजरंग सोनकर विश्व हिन्दू दल का महानगर प्रमुख है. अलग अलग पोज में बंदूक के साथ उसकी तस्वीरों को देखकर डरने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि यही बजरंग सोनकर जब समंदर के किनारे तस्वीर खींचाता है तो बाहें फैला लेता है. समंदर को देखकर उसके भीतर आई यह उदारता किस वजह से इतनी संकुचित हो जाती है वह निशाना साधने की सोचने लगता है यह तो बजरंग के साथ बातचीत करने पर ही पता चलेगा. उसका यह पोस्ट है कि हम हिन्दू और सेना के लिए लड़ रहे हैं. बजरंग सोनकर ने घटना के बाद अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट साझा किया है. जिससे पता चलता है कि वो भले अलग दल में है मगर उसका संबंध भारतीय जनता युवा मोर्चा के नेताओं से भी है. अभिजात मिश्रा भारतीय जनता युवा मोर्चा का महासिचव है. दलीगंज घटना में गिरफ्तार हिमांशु अवस्थी का भी एक पोस्ट साझा किया है कि वह एक चैनल के डिबेट शो में गया था. उस वीडियो में रिब्लिक का संवाददता हिमांशु अवस्थी से बातचीत कर रहा है. यानी हिमांशु अवस्थी इतना भी गुमनाम शख्स नहीं है.

लखनऊ पुलिस का कहना है कि बजरंग सोनकर कई बार अपराध कर चुका है. हत्या के एक मामले में आरोपी भी है. फिर भी वह फेसबुक और लखनऊ में सेना और हिन्दू के लिए काम करना चाहता है. अच्छे लोगों को किसे ज़रूरत नहीं होती है. बंजरंग सोनकर ने एक सवाल किया है कि हम हिन्दू और सेना के लिए लड़ रहे हैं, कितने लोग साथ देंगे तो 548 कमेंट आए हैं. कई लोगों ने बजरंग की आलोचना की है और कई लोगों ने साथ देने की बात कही है. एक अन्य आरोपी है हिमांशु अवस्थी.

हिमांशु अवस्थी खुद को विश्व हिन्दू दल का प्रदेश अध्यक्ष कहते हैं. बीजेपी के साथ अपने संबंधों का खुलकर प्रदर्शन करते हैं. फेसबुक में हिमांशु अवस्थी ने खुद को बीजेपी का पूर्व नेता बताया है. हिमांशु अवस्थी 6 मार्च को 2 बज कर 36 मिनट पर पोस्ट किया है कि मैं रिपब्लिक चैनल पर लाइव रहूंगा. फिर 4 बजकर 44 मिनट पर उस वीडियो को शेयर करता है. तीसरे आरोपी का नाम है अमर मिश्रा जो बीजेपी के लिए काम करते हैं. सोशल मीडिया प्रोफाइल से पता चलता है. संगठन अलग हैं मगर सोच एक है इन तीनों की. हिमांशु अवस्थी की यह तस्वीर बताती है कि वह एक एक ईंट जोड़ने के लिए कितनी मेहनत कर रहा है, किसके लिए मेहनत कर रहा है. वह मोदी ईंट को सबसे भरोसेमंद ईंट मानता है और लिखा है कि घर भी बनेगा तो मोदी ईंट से बनेगा. विश्व हिन्दू दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा है कि वे बीजेपी के समर्थक हैं और बीजेपी के संरक्षण में काम करते हैं बीजेपी के लिए काम करते हैं. बीजेपी के प्रवक्ता हीरो वाजपेयी ने कहा है कि बहुत से लोग उनकी विचारधारा का पालन करते हैं, कानून तोड़ने पर कार्रवाई होगी.

फिलहाल चारों गिरफ्तार हैं. मीडिया में बात उठने से पहले हिमांशु अवस्थी ने पोस्ट किया था कि तुम अपनी जान बरकरार रखो, मैं अपने जलवे बरकरार रखूंगा. लगता है हिमांशु में एक अच्छा शायर होने की संभावना अब भी बाकी है. वर्ना जान और जलवे के साथ बरकार रखने का इतना अच्छा मीटर नहीं बिठा पाता. हिमांशु पर लखनवी मिज़ाज की छाप देखर मुझे कुछ उम्मीद नज़र आती है. अफ़ज़ल नायक और अब्दुल सलाम के साथ जो हुआ वो ठीक नहीं था. तब हुआ जब 23 फरवरी को प्रधानमंत्री टोंक में कह चुके थे कि हमारी लड़ाई कश्मीर से है, कश्मीरियों से नहीं. हिमांशु और बजरंग जैसे सोनकरों को तो अपने नेता की बात ठीक से सुननी चाहिए. नेता को भी अपनी बात इन जैसे नौजवानों तक ठीक से पहुंचानी चाहिए.

पिछले दिनों कहां क्या हुआ, घटना छोटी थी की बड़ी थी, कश्मीरी बच्चों के साथ हिन्दुस्तान के किसी कोने में क्या हुआ क्या नहीं, मुद्दा ये नहीं है. इस देश में ऐसा नही होना चाहिए. हेडलाइन बनाने के चक्कर में हम ध्यान नहीं देते कि प्रधानमंत्री ने क्या कहा. उनकी निंदा या सलाह का क्या मतलब रह जाएगा जब वे खुद ही बोलेंगे कि क्या हुआ क्या नहीं हुआ मुद्दा ये नहीं है. यही तो मुद्दा है. और क्या है मुद्दा फिर. अफज़ल नायक और अब्दुल सलाम को अकेला महसूस नहीं करना चाहिए. क्योंकि उसी मारने वालों की भीड़ में एक अकेला ऐसा भी था जो सामने आया और मारने वालों से कहा कि आप क्यों मार रहे हैं. कानून का सहारा लीजिए. कानून हाथ में मत लीजिए.

अकेला बोलना वाकई जोखिम भरा काम हो गया है. इसलिए हम इस शरीफ शहरी की तारीफ करते हैं. और अब आपको ले चलते हैं मुज़फ्फरनगर जहां एक अकेले को सवाल करने पर पीटा गया. घटना 6 मार्च की है.

इतने सारे लोग मिलकर एक नौजवान को इसलिए मार रहे हैं क्योंकि उसने एक टीवी शो में मोदी सरकार की नीतियों पर सवाल कर दिया. मीडिया रिपोर्ट में चैनल का नाम नहीं है, यूपी के चैनल भारत समाचार के लिए डिबेट हो रहा था दिन के 11 बजे. भारत समाचार लखनऊ का चैनल है. इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार कार्यक्रम का नाम था माहौल बनाए रखिए. क्विंट वेबसाइट ने लिखा है कि अदनान सऊदी से मुजफ्फरनगर बोर्ड का इम्तहान देने आया था. कहीं से आ रहा था तो टीवी डिबेट देखकर रुक गया. शामिल हो गया. वहां जैसे ही सरकार की रोज़गार, कानून व्यवस्था से लेकर कृषि संकट पर सवाल किया तभी वहां मौजूद लोग उसे खींच कर मारने लगे. अदनान के मुताबिक उसे आतंकवादी तक कहा गया. मीडिया रिपोर्ट में मारने वालों को बीजेपी का कार्यकर्ता बताया गया है. जिसे हम अपनी तरफ से सत्यापित नहीं कर रहे हैं.

इंडियन एक्सप्रेस के अमित भटनागर ने भारत समाचार के एंकर नरेंद प्रताप से बात की है. नरेंद्र प्रताप ने कहा है कि वे पास के इलाके में युवाओं के बीच कार्यक्रम करने गए थे. कई तरह के सवालों पर बात हो रही थी. जब भी कोई असहज बातें करता था, बीजेपी के कार्यकर्ता प्रधानमंत्री मोदी के पक्ष में जयकारे लगाने लगते थे और भारत माता की जय बोलने लगते थे. और अदनान को मारने लगे.

भीड़ कब बन रही है, क्यों बन रही है किसकी बन रही है इसे समझने के लिए केमिस्ट्री में 100 नंबर लाना ज़रूरी नहीं है. शुक्रिया अरशद जमां और अरशद पाशा का जो वहां से गुज़र रहे थे और उस भीड़ से अदनान को खींच लाए.

अगर बचाया नहीं गया होता तो उसे मारा ही जाता. रफाल मामले पर हिन्दू अखबार के एन राम की खोजी रिपोर्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट मे जो दलील रखी गई वह दलील भी उस प्रक्रिया का हिस्सा है जो सवाल पूछने को तरह तरह से संदिग्ध कर रही है. अदालत में अटॉर्नी जनरल ने कहा कि सीक्रेट फाइल चोरी हो गई है. उसी के आधार पर रिपोर्ट छपी है. अखबार के खिलाफ आफिशियस सीक्रेट एक्ट के तहत कार्रवाई होनी चाहिए. इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि अटॉर्नी जनरल ने द हिन्दू और एएनआई दोनों का नाम लिया. आपको याद दिला दें कि 8 फरवरी को जब रक्षा मंत्री का नोट्स एन राम ने छापा था तब रक्षा मंत्री का बयान आया था. उस बयान में उन्होंने नहीं कहा कि सीक्रेट फाइल चोरी हो गई है. बल्कि वो तो यह बता रही थीं कि रिपोर्ट छापने वाले पत्रकार ने पूरा नोट नहीं छापा. ज़ाहिर है उस वक्त वो फाइल या नोट्स निर्मला सीतारमण के संज्ञान में होगी. और यह कैसी चोरी थी कि जो डाक्यूमेंट एन राम ने छापे, उसी का पूरा हिस्सा एएनआई ने ट्वीट किया था.

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और इंडियन विमेन्स प्रेस कोर की तरफ से साझा बयान आया है. इस बयान में सुप्रीम कोर्ट में अटॉर्नी जनरल की बात पर गहरी चिन्ता जताई गई है. उन्होंने कहा था कि दि हन्दू अखबार में रफाल पर छपी रिपोर्ट रक्षा मंत्रालय के चोरी किए गए दस्तावेज़ पर आधारित हैं.

खुली अदालत में यह कहा गया है कि इस रिपोर्ट को छापने से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा पहुंचा है और यह आपराधिक मामला है. सरकार में कानून के सबसे बड़े अधिकारी के इस बयान का असर न सिर्फ मीडिया पर होगा बल्कि सूचना के लिए सूत्रों पर निर्भर रहने वाले पत्रकार भी इससे प्रभावित होंगे. सरकार का यह कहना कि ऑफिशियल सक्रेट एक्ट का उल्लंघन हुआ है, भारत जैसे लोकतंत्र में फ्री प्रेस की मूल अवधारणा पर चोट करता है. चौथे स्तंभ का कर्तव्य है कि वह जनहित में रिपोर्ट करे और सवाल करे. चाहे किसी की भी सरकार हो. यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि अपना दायित्व निभाने पर सरकार के बड़े अधिकारी कलंकित कर रहे हैं.

एडिटर्स गिल्ड ने भी बयान जारी कर एन राम का समर्थन किया है और अटॉर्नी जनरल के बयान की आलोचना की है. गिल्ड ने कहा है कि अटॉर्नी जनरल ने बाद में कहा कि वकील या पत्रकार के खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी मगर उनका यह कहना कि रिपोर्ट चोरी की गई फाइल के आधार पर है, चिन्ता का विषय है.

इससे मीडिया में डर बैठेगा और रिपोर्ट करने की स्वतंत्रता पर असर पड़ेगा. ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट के इस्तमाल का कोई भी प्रयास निंदनीय है. पत्रकार को बाध्य नहीं किया जा सकता है कि वह अपना सोर्स बताए. गिल्ड ऐसी धमकियों की निंदा करता है. सरकार से अपील करता है कि वह ऐसी कोई कार्रवाई करने से बचे जिससे मीडिया की स्वतंत्रता प्रभावित हो.

राहुल गांधी ने दस्तावेज चोरी होने के सवाल को लेकर प्रेस कांफ्रेंस की, रविशंकर प्रसाद ने जवाब में प्रेस कांफ्रेंस की.

रक्षा घोटालों का इतिहास रहा है. चंद दस्तावेज़ों को हासिल कर ही बात पहले सामने आई है फिर आगे बढ़ी है. दस्तावेज़ निकालकर खबर छापना राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलवाड़ नहीं है. इससे सेना का मनोबल नहीं गिरता है बल्कि हर सैनिक का मनोबल ऊंचा होता है कि भारत में अब भी कुछ पत्रकार हैं जो पत्रकारिता करते हैं तलवे नहीं चाटते हैं. एन राम की रिपोर्टिंग से सेना का मनोबल बढ़ा होगा. सेना के मनोबल की बात हुई है तो आज पुलवामा आतंकी हमले में सीआरपीएफ के 44 शहीदों में से एक के परिवार के एक सदस्य ने व्हाट्स एप किया. कहा कि मैं शहीद अजीत कुमार आज़ाद का भाई बोल रहा हूं. यूपी के उन्नाव ज़िले के पूर्वा तहसील के रहने वाले हैं अजीत कुमार आज़ाद. शहादत के बाद अजीत कुमार आज़ाद के परिवार को सरकार ने सब कुछ दिया. देरी नहीं हुई. पत्नी नीना गौतम को सहायक क्लर्क की नौकरी दी है. जो अजीत जी का वेतनमान था उसी वेतनमान पर नौकरी मिली है. यूपी सरकार ने 25 लाख और केंद्र ने 35 लाख दिए. इसके बाद भी अजीत कुमार आज़ाद के भाई और उनकी पत्नी चाहती हैं कि पुलवामा मामले की चुनाव से पहले जांच हो.



(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)
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