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प्रधानमंत्री क्यों देते पत्रकारों के सवालों के जवाब

प्रधानमंत्री का यह रुख़ दरअसल बताता है कि वे इस पत्रकारिता की परवाह नहीं करते.अगर उनको यह एहसास होता कि पत्रकारों से बात न करने के नुक़सान होंगे तो वे ख़ूब बात करते, तमाम सवालों के जवाब देते.

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प्रधानमंत्री क्यों देते पत्रकारों के सवालों के जवाब

पांच साल में पहली बार प्रेस कॉन्फ़्रेंस में आए प्रधानमंत्री ने अगर पत्रकारों के सवालों के जवाब नहीं दिए तो वे इतने मायूस क्यों हैं? प्रधानमंत्री का यह रुख़ दरअसल बताता है कि वे इस पत्रकारिता की परवाह नहीं करते.अगर उनको यह एहसास होता कि पत्रकारों से बात न करने के नुक़सान होंगे तो वे ख़ूब बात करते, तमाम सवालों के जवाब देते. लेकिन यह नुक़सान क्योंकर होगा? जिस प्रधानमंत्री ने पत्रकारों को एक सेकेंड का समय नहीं दिया, उसे मीडिया ने बिल्कुल सिर आंखों पर बिठाए रखा.प्रधानमंत्री अपने दौरों पर मीडिया को नहीं ले जाते रहे, बस एक टीम उनके साथ हुआ करती थी,  लेकिन क्या मज़ाल कि उनके किसी भी भाषण की रिपोर्ट छूटी हो.पिछले पांच साल में वे जहां-जहां गए, जो-जो बोले, जिन-जिन के गले लगे या पड़े, उन सबकी रिपोर्ट मीडिया ने बड़ी निष्ठा से की.प्रधानमंत्री ने बताया कि किसी देश से 100 मिलियन डॉलर का निवेश आ रहा है तो बिना तस्दीक किए मान लिया कि वे सच ही बोल रहे होंगे, अगर प्रधानमंत्री ने बताया कि उनके रहते आतंकियों के हौसले टूट चुके हैं तब किसी ने नहीं पूछा कि फिर इतने आतंकी हमले क्यों हो रहे हैं.अगर बीते पांच साल में अलग-अलग नेताओं को मिले मीडिया कवरेज का हिसाब लगाया जाए तो प्रधानमंत्री दूसरों से कोसों आगे नज़र आएंगे.अगर पिछले प्रधानमंत्रियों से भी उनकी तुलना की जाएगी तो भी प्रधानमंत्री सबको काफ़ी पीछे छोड़ते दिखेंगे.यह अलग बात है कि इसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह और बीजेपी को फिर भी मीडिया से शिकायत रही और मौक़ा मिलते वे अपने से असहमत पत्रकारों को पत्रकारिता सिखाने की कोशिश करते नज़र आए.

जब किसी प्रधानमंत्री को बिना प्रेस कॉन्फ्रेंस किए इतनी कवरेज मिलेगी तो वह क्योंकर प्रेस कॉन्फ़्रेंस करेगा? जब पत्रकारिता उसके आगे श्रद्धानत रहेगी तो वह क्यों उनको आंखों में आंख डाल कर सवाल पूछने का अवसर देगा.
ऐसा नहीं कि प्रधानमंत्री ने इस दौरान इंटरव्यू दिए ही नहीं.उन्होंने कई इंटरव्यू दिए.कुछ इंटरव्यूज़ के बारे में कहा गया कि उनमें सवाल और जवाब पहले से तय थे.इन पंक्तियों के लेखक के पास इसकी पुष्टि का कोई ज़रिया नहीं है.कुछ इंटरव्यू उन्होंने प्रसून जोशी और अक्षय कुमार जैसे लोगों को देना ज़रूरी समझा.प्रसून जोशी का इंटरव्यू सबसे लंबा था लेकिन चापलूसी की अद्भुत मिसाल था.उस इंटरव्यू को देखकर सीखा जा सकता है कि इंटरव्यू कैसे नहीं लेना चाहिए.


लेकिन पत्रकारिता से जु़डे इंटरव्यू भी अच्छे सवालों वाले नहीं रहे.चुनाव के दौर में भी प्रधानमंत्री ने अलग-अलग चैनलों के पत्रकारों से बात की.किसी एक भी इंटरव्यू में यह नहीं दिखा कि उन्हें असुविधा में डालने वाले सवाल उनसे पूछे गए हों.इसके अलावा पांच साल के दौरान उनके तरह-तरह के भाषणों का अविकल प्रसारण करने वाले टीवी चैनलों ने कुछ अवसरों पर बहुत स्पष्ट तौर पर पकड़ में आने वाली गलतियों को छोड़ कर कोई गंभीर सवाल उठाया- यह याद नहीं आता.तो जब ऐसा अबाध प्रचार प्रधानमंत्री को बिना प्रेस कॉन्फ़्रेंस के मिल रहा हो तो वे पत्रकारों के जवाब देना क्यों ज़रूरी समझते.

यह नतीजा निकालना आसान है कि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा मोदी भक्ति में रमा रहा, इसलिए उसने अपनी आलोचनात्मक भूमिका खो दी.लेकिन सच्चाई यह है कि ख़ुद को सरकार विरोधी मानने वाले अख़बारों और चैनलों पर भी जानी-पहचानी आलोचना के अलावा कोई ऐसा गंभीर विमर्श नहीं दिखा जिससे लोगों को सही और सटीक सूचनाएं मिल सकें.

दरअसल यह पूरा दौर पत्रकारिता के एक बड़े संकट की सूचना का दौर है.शायद पत्रकारिता में जल्दी से जल्दी ख़बर देने का जो नया दबाव है, उसने पत्रकारिता के गुण धर्म को लगभग क्षतिग्रस्त कर दिया है.यह हड़बड़ाए हुए पत्रकारों का दौर है जिनके पास सूचनाओं की पुष्टि करने की भी फुरसत नहीं है.तो होता यह है कि किसी भी स्रोत से कोई सूचना चली आती है, पत्रकार उसके बस वाहक होकर रह जाते हैं, वह उसे संशोधित नहीं कर पाते, उससे प्रतिप्रश्न नहीं कर पाते.

मसलन, बीजेपी और प्रधानमंत्री का जो़र सबसे ज्यादा इस बात पर रहा कि उनके कार्यकाल में आतंकवाद को मुंहतोड़ जवाब मिला.अगर इसमें 2010 से 2014 के बीच और 2014 के अभी तक के आंकड़ों का तटस्थ विश्लेषण किसी के पास होता तो यह बात बहुत स्पष्ट हो जाती कि इस मामले में उनकी ओर से किया जा रहा दावा ग़लत है.इसी तरह सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान के पस्त पड़ जाने का दावा भी पूरी तरह संदिग्ध है.उल्टे पाकिस्तान सर्जिकल स्ट्राइक के बाद ज़्यादा तीखे ढंग से युद्धविराम उल्लंघन करता रहा.यही बात नोटबंदी के असर या दूसरे आर्थिक दावों को लेकर कही जा सकती है.

ऐसा नहीं कि इन आंकड़ों का किसी को ध्यान नहीं रहा होगा.लेकिन धीरे-धीरे यह संस्कृति ख़त्म होती जा रही है कि आप किसी ताकतवर आदमी से सवाल पूछें.या अगर कोई ताकतरवर आदमी किसी सवाल का ग़लत भी जवाब दे तो उससे फिर से नए सिरे से सवाल पूछा जाए.अमित शाह के पास यह सुविधा है कि वे प्रज्ञा ठाकुर को लेकर सवाल पूछे जाने पर पूरी जांच को ही ख़ाारिज कर दें.उन्हें कोई यह बताने वाला नहीं होता कि वे गलत बोल रहे हैं.पत्रकारिता में बस सवाल पूछने का दिखावा बचा है.टीवी पर अनवरत चलने वाली जो बहसें होती हैं उनमें सवाल भी जाने-पहचाने होते हैं, जवाब भी और उन बहसों के नतीजे भी.

ऐसी हालत में प्रधानमंत्री प्रेस कॉन्फ़्रेंस में आ भी जाएं तो पत्रकारों पर कृपा करते हैं.वे पत्रकारों के सवालों के जवाब नहीं देते तब भी किसी को बुरा नहीं लगता.बात आई-गई हो जाती है.

'टाइम्स ऑफ इंडिया' का संपादक रहते हुए कभी दिलीप पडगांवकर ने कहा था कि देश का सबसे ताकतवर आदमी इस देश का प्रधानमंत्री है और दूसरा सबसे ताकतवर आदमी 'टाइम्स ऑफ इंडिया' का संपादक है.तब भी इस वक्तव्य की बहुत आलोचना हुई थी.किसी अच्छे पत्रकार को ताकत के मोह में नहीं पड़ना चाहिए.यह मोह सबसे पहले उसकी पत्रकारिता का क्षरण करता है.लेकिन पत्रकारिता जब अपना काम कर रही होती है तब वह जिस नैतिक आभा से भरी होती है, उसकी ताकत के आगे भी सब सिर झुकाते हैं.

लेकिन यह शायद किसी और दौर की बात है.अब तो हालत ये है कि सत्ताधीश आता है, भाषण देता है, कृपा की तरह कुछ पत्रकारों का हालचाल पूछता है और किसी सवाल का जवाब देने की परवाह किए बिना निकल जाता है और उसके एक दिन बाद तमाम अख़बारों और चैनलों में उसकी संन्यासी मुद्रा में तस्वीरें होती हैं.ऐसे में वह किसके प्रति जवाबदेह हो और क्यों जवाबदेह हो.दरअसल पत्रकारिता को कुछ सवाल अपने-आप से भी पूछने की ज़रूरत है.

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प्रियदर्शन NDTV इंडिया में सीनियर एडिटर हैं..

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.



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