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मोदी सरकार का ये आर्थिक सर्वे क्या इशारा कर रहा है?

आठ लोगों के हाथ में आर्थिक सर्वे है. जिसके बीच में हैशटैग 5 ट्रिलियन डॉलर यानी 5 ख़रब की अर्थव्यवस्था का नया टारगेट है जो अगले पांच साल में हासिल करना है.

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नई दिल्ली:

आठ लोगों के हाथ में आर्थिक सर्वे है. जिसके बीच में हैशटैग 5 ट्रिलियन डॉलर यानी 5 ख़रब की अर्थव्यवस्था का नया टारगेट है जो अगले पांच साल में हासिल करना है. जीडीपी को 7 प्रतिशत तक पहुंचाना है. हैश टैग वाले इस आर्थिक सर्वे के कवर पर 10 गोले बने हैं. इनमें से आठ गोले में अलग अलग टारगेट लिखे हैं. नौकरी, निवेश, निर्यात, बचत, डेटा और कानून इसके अलावा एक है नज (Nudg). डिक्शनरी में देखेंगे तो नज का मतलब धकेलना होगा लेकिन इकोनमी में एक थ्योरी नज इकोनमिक्स कहलाती है. इसे 2017 के अर्थशास्त्र में नोबल पुरस्कार विजेता और अमेरिकी अर्थशास्त्री रिचर्ड थेलर ने प्रतिपादित किया है. नज इकोनोमी में लोगों के वित्तीय व्यवहार को बिना ज़ोर ज़बरदस्ती के निर्देशित किया जाता है. यानी सरकार एक तरह से आपकी आदतों को बदलेगी कि आप आर्थिक क्रियाकलाप कैसे करेंगे. रिचर्ड थेलर की किताब Nudge कई यूनिवर्सिटी में पढ़ी जाती है और पढ़ाई जाती है. 2010 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के दफ्तर में एक टीम बनाई गई थी जिसका उद्देश्य नज थ्योरी की मदद से सरकारी नीतियों को सफलता से लागू करना है और कम खर्चे में योजनाओं का प्रचार प्रसार करना है. भारत में भी नीति आयोग इस लाइन पर सोचता रहा है. क्या इस थ्योरी के अनुसार कम खर्चे में प्रचार प्रसार हुआ.

दुनिया में तेज़ी से शहरीकरण हो रहा है. देखते देखते हमारे आस-पास मकानों का जंगल उग आता है. अगले चालीस साल में दुनिया की आधी से अधिक आबादी शहरी इलाके में रहने लगेगी. इसके लिए हर महीने न्यूयॉर्क के बरबार एक महानगर धरती पर बनेगा. बिल्डिंग सेक्टर से बड़ी मात्रा में ग्रीन हाउस गैस निकलती है जिससे जलवायु पर लगातार बुरा असर पड़ रहा है. लेकिन इस सेक्टर में सीमेंट और स्टील की खपत से जीडीपी के आंकड़े रंगीन हो जाते हैं. तो एक तरफ ग्रीन हाउस गैस का ख़तरा है तो दूसरी तरफ जीडीपी का सपना है. पिछले कई साल से अर्थव्यवस्था को लेकर कुछ नया मॉडल सामने नहीं आया है. किताब एक ही है. बस उसका कवर बदल-बदल कर हर साल नया संस्करण आ जाता है. अब देखिए नदियों या पानी के संसाधन जिन पांच दस लोगों की नितियों और सांठगांठ के कारण बर्बाद हुए अगर वही बदल जाएं तो आपको पूरे देश से अपील करने की ज़रूरत ही नहीं होगी कि सबको मिलकर पानी का संकट दूर करना होगा. ज़रूर यह कहना चाहिए कि सभी को मिलकर कुछ करना होगा लेकिन उससे पहले यह सवाल भी करना चाहिए कि क्या सबने मिलकर इस जल संकट को पैदा किया है. क्या अच्छा नहीं होता कि जिन लोगों की नीतियों के कारण अभी भी जलसंकट के कारण पैदा हो रहे हैं वही बदल जाएं. कहने का मतलब है कि आर्थिक संकट और आर्थिक संभावना को लेकर हम कुछ नया नहीं सोच रहे हैं. एक ही तरह के विचारों को अलग अलग तरीके से पेश किया जाता रहता है. जीडीपी का ज़िक्र आ गया है. आर्थिक सर्वे आ गया है.
 
आठ लोगों के हाथ में आर्थिक सर्वे है. जिसके बीच में हैशटैग 5 ट्रिलियन डॉलर यानी 5 ख़रब की अर्थव्यवस्था का नया टारगेट है जो अगले पांच साल में हासिल करना है. जीडीपी को 7 प्रतिशत तक पहुंचाना है. हैश टैग वाले इस आर्थिक सर्वे के कवर पर 10 गोले बने हैं. इनमें से आठ गोले में अलग अलग टारगेट लिखे हैं. नौकरी, निवेश, निर्यात, बचत, डेटा और कानून इसके अलावा एक है नज (Nudge). डिक्शनरी में देखेंगे तो नज का मतलब धकेलना होगा लेकिन इकोनमी में एक थ्योरी नज इकोनमिक्स कहलाती है. इसे 2017 के अर्थशास्त्र में नोबल पुरस्कार विजेता और अमेरिकी अर्थशास्त्री रिचर्ड थेलर ने प्रतिपादित किया है. नज इकोनमी में लोगों के वित्तीय व्यवहार को बिना ज़ोर ज़बरदस्ती के निर्देशित किया जाता है. यानी सरकार एक तरह से आपकी आदतों को बदलेगी कि आप आर्थिक क्रियाकलाप कैसे करेंगे. रिचर्ड थेलर की किताब Nudge कई यूनिवर्सिटी में पढ़ी जाती है और पढ़ाई जाती है. 2010 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के दफ्तर में एक टीम बनाई गई थी जिसका उद्देश्य नज थ्योरी की मदद से सरकारी नीतियों को सफलता से लागू करना है और कम खर्चे में योजनाओं का प्रचार प्रसार करना है. भारत में भी नीति आयोग इस लाइन पर सोचता रहा है. क्या इस थ्योरी के अनुसार कम खर्चे में प्रचार प्रसार हुआ. तबके मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर ने लोकसभा में बताया था कि 2014 से दिसंबर 2018 तक सरकारी योजनाओं के प्रचार प्रसार 5,245 करोड़ रुपये खर्च किए गए. यूपीए सरकार ने अपने दस साल के कार्यकाल में 5,040 करोड़ खर्च किया था. फिर नज थ्योरी का क्या फायदा हुआ. इसमें प्रचार प्रसार को लेकर तर्क है कि लोगों का व्यवहार बदलेगा तो राज्यवर्धन राठौर ने तब बताया था कि हमने आंकलन नहीं किया है कि इन विज्ञापनों का क्या प्रभाव पड़ा.

एक बात आर्थिक सर्वे के कवर के बारे में करना चाहता हूं. पिछली बार यानी 2018-19 के आर्थिक सर्वे के कवर का रंग गुलाबी था. पूरी वेबसाइट ही गुलाबी हो गई थी. तब हर प्रमुख बातें गुलाबी रंग के गोले में बताई गई थीं. तर्क दिया गया कि देश भर में चल रहे महिलाओं के आंदोलन के प्रति समर्थन जताने के लिए सर्वे का रंग गुलाबी कर दिया गया है. गुलाबी करने का कारण यह बताया गया था कि दुनिया भर में महिलाओं के खिलाफ हो रही हिंसा का अंत करने के लिए जो आंदोलन हो रहे हैं उसका समर्थन जताने के लिए आर्थिक सर्वे का रंग गुलाबी कर दिया गया है. गुलाबी रंग करने से महिलाओं के आंदोलन और उनकी स्थिति पर क्या असर पड़ा है ये कम से कम इस बार के सर्वे रिपोर्ट में होना चाहिए था. आर्थिक सर्वे बनाने वाली टीम ने आसानी से इस बार का कवर गुलाबी से नीला कर दिया है. एक नया नारा दे दिया है ब्लू स्काई थिंकिंग. सर्वे के हिन्दी अंक में लिखा है कि नीले गगन के समान विस्तृत विचारधारा से आर्थिक समीक्षा प्रेरित है. लेकिन रंगों के इस बदलाव के क्या नतीजे होते हैं, ये हम जैसे ज़्यादा रिसर्च करने वाले एंकरों को नहीं बताया गया है. कम से कम सरकार बताती कि मैटरनिटी लीव एक्ट जो बना था, उसके क्या नतीजे निकले. दिसंबर 2018 में लाइव मिंट में ऋतुपर्णा चक्रवती का विश्लेषण छपा है. वे बता रही हैं कि मैटरनिटी लीव एक्ट बनने का कोई खास असर नहीं पड़ा. उल्टा कंपनियां औरतों को कम नौकरी देने लगीं ताकि उन्हें गर्भवती होने पर छुट्टी न देनी पड़ जाए.

बजट पेश होने के बाद आर्थिक सर्वे की चर्चा पीछे रह जाएगी लेकिन इस सर्वे के चैप्टर 2 में सर्वे और सरकार की योजनाओं के पीछे छिपे मनोवैज्ञानिक आधार के बारे में विस्तार से बताया गया है. कोई सरकार खुल कर इस तरह नहीं बताती है कि वह आपके व्यवहारों को कैसे बदल रही है ताकि आपकी आदतें उसकी योजनाओं में फिट हो सके. इस मनोवैज्ञानिक आधार को समझने से आप सरकार की कई योजनाओं का मकसद समझ पाएंगे. इसलिए हम नज थ्योरी पर थोड़ा फोकस करना चाहते हैं. हिन्दी के अखबार या चैनल शायद ही इसकी बात करें लेकिन संयोग से हमारी सहयोगी बानी बेदी ने रिचर्ड थेलर की किताब Nudge पढ़ी है तो लगा कि आपसे इसके बारे में साझा करते हैं.

इस थ्योरी के स्वामि रिचर्ड थेलर और कैस संसटीन ने एक किताब लिखी है जिसका नाम है Nudge: improving decisions about health, wealth and happiness. कैस संस्टीन राष्ट्रपति ओबामा के सूचना सलाहकार थे. ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने अपने ऑफिस में नज यूनिट बनाई थी जिसके सलाहकार रिचर्ड थेलर थे. इस किताब का कवर दिलचस्प है. हथिनी अपने बच्चों को हल्के से धकेलते हुए रास्ते पर चला रही है. इस किताब में दोनों लेखक समझा रहे हैं कि हमारे आंदोलन का नाम लिबर्टेरियन पेटर्नलिज़्म है. पैटर्नलिज़्म से आप समझिए कि जैसे माता पिता बच्चे को बता रहे हैं कि उन्हें क्या करना है क्या नहीं करना है. जो लोग अंग्रेज़ी भाषा के मुहावरों का इस्तमाल करते हैं वो पेटर्नलिज़्म का मतलब एक दूसरे अर्थ में करते हैं. जैसे आप उनकी लाइफ में बहुत दखल दें, उनके फैसलों पर इस तरह से दखल देते रहें कि आप से ज्यादा उन्हें या मां बाप को ज़्यादा पता है. तो जवाब मिलता है कि ऐसा करने वालों का नज़रिया बहुत ही पेटर्नलिस्टिक है या पेट्रनाइज़िंग है. ये दोनों लेखक कहते हैं अच्छे मकसद के लिए नज किया जा सकता है.

रिचर्ड और संसटीन ने इसे आंदोलन का रूप दिया है. उनका कहना है कि लोगों को आज़ादी होगी लेकिन उनकी बेहतरी के लिए ज़रा सा सौम्य तरीके से उनके व्यवहार को प्रभावित किया जा सकता है. क्योंकि कई बार लोग अपना फैसला ग़लत करते हैं. आर्थिक सर्वे के चैप्टर नंबर 2 में लिखा है कि कैसे स्वच्छ भारत मिशन और बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ में इसका सफल इस्तमाल हुआ. इस आर्थिक नीति को ठीक से समझने की ज़रूरत है. आर्थिक व्यवहार और राजनीतिक व्यवहार दोनों ही क्षेत्रों में. अर्थशास्त्र की शाखा है व्यावहारिक अर्थशास्त्र. यानी लोग हमेशा तार्किक फैसले नहीं करते हैं. इस सिद्धांत को संस्कृत के एक श्लोक से समझाया गया है.

तर्को प्रतिष्ठ: श्रुतयोविभिन्नानैको ऋषिर्यस्य: मतं प्रमाणम. मतलब यह हुआ कि केवल तर्कपूर्ण चिंतन को ही परम सत्य नहीं माना जा सकता है क्योंकि यह भी पूर्वाग्रह से मुक्त नहीं है.

तो क्या सरकार का कदम पूर्वाग्रहों से मुक्त हो सकता है? इसी श्लोक के अनुसार सरकार का जो सत्य है वह किस तर्क से परम सत्य हो गया. आखिर लोगों को ही समझना होगा कि जो सरकार कर रही है वह सही है या नहीं. वेदों का विश्लेषण निरुक्त में किया गया है. एक ऋषि हुए हैं, यास्क. आचार्य कौन कहलाता है, इसके जवाब में यास्क कहते हैं कि आचारम ग्राह्यति, आचरति, आचिनोति अर्थान, आचिनोति बुद्धिम. मतलब आचार्य वह होता है जो खुद आचरण करता है, आचरण ग्रहण कराता है, अच्छे शब्दों का चयन करता है और बुद्धि का चयन करता है. मतलब कि आप दूसरों को उपदेश देने जा रहे हैं कि आपका व्यवहार क्या हो लेकिन आपका अपना आचरण कैसा है. क्या सरकार के व्यवहार को बदलने की ज़रूरत नहीं है, उसके लिए रिचर्ड थेलर और संसटीन भाइयों ने क्या मार्ग बताया है. मैं बस हिन्दी के सामान्य दर्शक और पाठक की तरह गहराई से समझना चाहता हूं. क्या आम जनता जानती है कि सरकार एक योजना की सफलता के लिए उसका व्यवहार क्यों बदल रही है, कहीं इसके ज़रिए एक रोबोटिक समाज की रचना तो नहीं हो रही है, जहां हर किसी को कदमताल का प्रशिक्षण दिया जा रहा है. आखिर क्यों लोगों के मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक आदतों को सौम्य तरीके से बदलने पर इतना ज़ोर दिया गया है. सरकार इसे आर्थिक क्षेत्र में अपना रही है मैं इसके असर को राजनीतिक क्षेत्र में देखना चाहता हूं. सर्वे के चैप्टर दो में आगे लिखा है कि भारत में जिस प्रकार सामाजिक एवं धार्मिक मान्यताओं की व्यवहार को प्रभावित करने में मुख्य भूमिका है, उसी प्रकार व्यवहारात्मक अर्थशास्त्र बदलाव का एक मूल्यवान साधन प्रदान कर सकता है. ऐसे मित्र, पड़ोसी, रोल मॉडल, जिन्हें लोग पहचानते हों, उनके सहयोग से सामाजिक मानकों को प्रोत्साहित किया जा सकता है.

स्वच्छता को लेकर शुरू में ट्विटर पर कई लोग ब्रांड अंबेसडर बने. उन्होंने कहीं झाड़ू लगाया, फोटो ट्वीट किया और गायब हो गए. फिर नज़र नहीं आए. ऐसा झांसा देने के लिए भी हो सकता है कि किसी एक्टर को ले आओ. अभी नैतिक शिक्षा देगा लोग प्रभावित होंगे, फिर वो गायब होगा, फिर दूसरा एक्टर आएगा और वो दूसरे विषय पर नैतिक शिक्षा देगा. प्रेरणा के नाम पर. इस प्रेरणा से समाज कैसा बना रहा है. क्या सरकार यह तर्क दे रही है कि वह एक तरह से आपको ढाल रही है कि आप क्या पसंद करें, क्या नहीं पसंद करें. हालांकि इनका उदाहरण सरकार अपनी योजनाओं की कामयाबी में दे रही है, हो सकता है कि बहुत बुरा न हो. बानी बेदी ने बताया कि ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और भारत में भी इस रास्ते से कुछ योजनाओं में लाभ होता है लेकिन इससे सरकार के पास ऐसी शक्तियां आ जाती हैं जिसके नतीजे ख़तरनाक भी हो सकते हैं.

सरकार ने अपनी नीतियों को लागू करने का मनौवैज्ञानिक आधार बताया है. वह बता रही है कि कैसे प्रचार प्रसार के मानकों के ज़रिए प्रेरित किया जा रहा है, लोगों के व्यवहार को बदला जा रहा है. ऐसा कभी किसी सरकार ने नहीं बताया. हिन्दी प्रदेशों में इस पर बात होनी चाहिए. क्या सरकार इसके बहाने आपके दूसरे फैसले भी बदल रही है या उनका आधार गढ़ रही है. क्या होगा अगर सरकार आपकी पसंद तय करने लगे जिसे अंग्रेज़ी में मैनिपुलेट कहते हैं तब उसके आर्थिक और राजनीतिक परिणाम क्या होंगे. क्या इस टेकनिक के इस्तमाल से सियासी फैसले के व्यवहार को भी बदला जा रहा है. नज थ्योरी वाले चैप्टर में बताया गया है कि कैसे संदेश पहुंचाने के लिए नमामि गंगे या आयुष्मान जैसी योजनाओं का मैसेज लोगों तक पहुंचाया गया. पर क्या गंगा साफ हुई, सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा बेहतर हुआ. हमें देखना होगा कि इससे व्यवहार बदलता है या फिर लोगों के दिमाग में सरकार को लेकर कोई बात बैठ जाती है. बानी बेदी ने इंटरनेट पर इसकी आलोचना या दूसरा पक्ष खोजने का प्रयास किया. कैंब्रीज यनिवर्सिटी प्रेस का एक प्रमुख जर्नल है. यूरोपीयन जर्नल ऑफ रिस्क रेगुलेशन. इसमें नज थ्योरी की संतुलित आलोचना लगी.

Nudge तभी काम करता है जब आप लोगों की पंसद को मैनिपुलेट करें. इसके ज़रिए लोगों के आम स्वभाव की जगह आटोमेटिक व्यवहार गढ़ा जा रहा है. जिसे आप डिफाल्ट सेटिंग कहते हैं कंप्युटर की ज़ुबान में. व्यवहार बदलने का अधिकार सरकार को दे रहे हैं लेकिन इस आटोमेटिक व्यवहार की जवाबदेही कौन लेगा. कोई सरकार व्यवहार बदलने की किस हद तक जा सकती है. इसके बचाव में थेलर और संस्टीन ही मानते हैं कि नजिंग मेनिपुलेशन है. पर दोनों की दलील लोकतंत्र में पसंद या फैसले का मैनिपुलेशन हमेशा होता है. हम लोगों को Nudge कर रहे हैं मगर लोगों के पास विकल्प है. आप फ्री हैं.  फिर दोनों कहते हैं कि हम इसे प्रचार प्रसार से ही जोड़कर आज़माएंगे.

तो क्या सारा मकसद प्रचार प्रसार पर है, शायद इसलिए इस सर्वे में पुराने नारों की जगह नए नारे आ गए. जनधन का ही उदाहरण लीजिए. इसके लाभ भी बताए गए लेकिन सपना भी बेचा गया या लोग झांसे में आए कि 15 लाख खाते में आंएंगे. इसका राजनीतिक परिणाम किसके पक्ष में गया. जैसे नज थ्योरी के अनुसार दावा किया जाए कि आप स्वतंत्र हैं कि सरकार की न्यू पेंशन स्कीम में निवेश न करें. लेकिन सरकार ने तो अपनी पेंशन स्कीम खत्म कर दी है. तो फिर आपके पास विकल्प क्या बचा है. बाज़ार का ही तो विकल्प है. मैं आर्थिक विषयों का ज्ञानी नहीं हूं लेकिन इस आर्थिक सर्वे में कोई बात अगर बहस करने लायक है, समझने लायक है तो यह नज थ्योरी है. गार्डियन ने लिखा है कि 2008 में मंदी आई तब उसी के साथ यह थ्योरी पोपुलर हुई.

गार्डियन अखबार ने 1 जून 2014 को लिखा है कि नज इकोनोमिक्स जो पहले एक समाधान लगता था, अब एक प्लास्टर जैसा लगता है. जैसे लीपा पोती कर दी गई हो. इस साल नज यूनिट को कैबिनिट कंट्रोल से हटा दिया. लगता है कि प्रधानमंत्री कैमरन अब इसे उतना महत्व नहीं देते हैं. 2010 में ब्रिटेन की कैबिनेट में नज यूनिट बनाई गई थी. जब कैमरेन ने यह यूनिट बनाई थी तब कहा था कि राजनेता तभी सफल होगा जैसी जनता है, वैसा बर्ताव करे. अगर इस विचार को हम विहेवियर इकोनोमी से जोड़ेंगे तो समाज का भला होगा. कैमरन अब प्रधानमंत्री नहीं हैं. कैमरन ने इसके बारे में कैलिफोर्निया में टेड टॉक में बताया था. जनता जैसी है बर्ताव वैसा ही हो उसके साथ का मतलब तो यह भी हुआ कि अगर उसके भीतर किसी समुदाय के प्रति नफरत है तो फिर उस नफरत को हर लेवल पर उभारो और राजनीतिक लाभ लो. यह मेरा प्रश्न है.

आज कल आप सुनते होंगे कि भारत की इकोनमी 5 ट्रिलियन डॉलर की हो जाएगी. नीति आयोग की बैठक में भी प्रधानमंत्री मोदी ने 5 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य तय कर चलने को कहा था. आर्थिक सर्वे में कहा गया है कि 2024-25 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनमी के लिए ज़रूरी है कि जीडीपी को लगातार 8 प्रतिशत होना होगा. अमरीका की अर्थव्यवस्था का आकार 19.39 ट्रिलयन डालर है. चीन का 12.24 ट्रिलयन डॉलर है. सिर्फ यही दो देश है जिनकी अर्थव्यवस्था का आकार 5 ट्रिलियन डॉलर से ज़्यादा है. आर्थिक सर्वे में लिखा है कि 2014-15 में भारत ने 2.1 ट्रिलियन डॉलर पहुंचने का अनुमान बताया था. 2015-16 में भारत की अर्थव्यवस्था का आकार 1.99 ट्रिलियन डॉलर रहा. 2018-19 मे भारत की अर्थव्यवस्था का आकार 2.75 ट्रलियन डॉलर है.

2014 से 2019 तक भारत की अर्थव्यस्था के आकार में जो वृद्धि हुई है वह 1 ट्रिलियन डॉलर से भी कम रहा है. 2014 में चीन की अर्थव्यवस्था का आकार 10 ट्रिलियन डॉलर था जो 2019 में 12 ट्रिलियन डॉलर का है. चीन जैसा देश पांच साल में दो ट्रिलियन डॉलर जोड़ पाता है, भारत एक ट्रिलियन डॉलर से भी कम. तो अब भारत इस बार ऐसा क्या करने जा रहा है जो अगले पांच साल में, मोदी सरकार के पहले कार्यकाल से भी दुगना साइज़ कर लेगा. 1 ट्रिलियन भी नहीं जुड़ा तो अब कैसे पांच साल में 2.2 ट्रिलियन डालर जुड़ पाएगा. सपना बड़ा तो है, सपना पिछले बार भी बड़ा ही था, उस सपने का क्या हुआ, इस सपने का क्या होगा.

सारे आंकड़े आर्थिक सर्वे, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक की साइट से लिए गए हैं. थोड़ा बहुत अंतर रहने की गुंज़ाइश है. अंतरराष्ट्रीय मुदा कोष की साइट पर अप्पैल 2019 का डेटा देख रहा था. इसके अनुसार पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था का आकार 87.27 ट्रिलयन डॉलर है. 28 देश हैं जिनकी अर्थव्यवस्था का आकार 1 ट्रिलियन डॉलर से ज़्यादा है. अंतरराष्ट्रीय मुदा कोष की साइट पर देखा जहां 2019 का जीडीपी साइज़ का डेटा है. उसके अनुसार आकार के मामले में भारत का स्थान दुनिया में पांचवा है. 2018 में भारत फ्रांस से आगे निकल गया था. फिर ब्रिटेन को भी पीछे छोड़ गया है. बहरहाल अमरीका और चीन के बाद जापान का स्थान तीसरा है, 5.18 ट्रिलियन डॉलर है. जर्मनी का स्थान चौथा है, 3.96 ट्रिलियन डॉलर है. भारत का स्थान पांचवा हैं, 2.97 ट्रिलियन डॉलर है. ब्रिटेन का स्थान छठा है, 2.83 ट्रिलियन डॉलर है. फ्रांस का स्थान सातवां है, 2.76 ट्रिलियन डॉलर है.

भारत के आर्थिक सर्वेक्षण में लिखा है कि अर्थव्यवस्था का आकार 2018-19 में 2.75 ट्रिलियन डॉलर है. आईएमएफ के ताज़ा डेटा में थोड़ा ज्यादा है. सरकार भी आईएमएफ के डेटा को कोट करती है. भोपाल में मई 2015 में वित्त मंत्री के रूप में अरुण जेटली ने कहा था कि भारत दो अंकों की जीडीपी हासिल कर सकता है लेकिन उसके अगले साल 2016 में इंडिया टुडे के कान्कल्वे में जेटली ने कहा कि मौजूदा स्थिति में दो अंकों की जीडीपी हासिल करना मुश्किल है. 2018-19 यानी पिछले आर्थिक सर्वे में जीडीपी का अनुमान था 7 से 7.5 प्रतिशत की दर होगी जीडीपी की लेकिन 6.8 प्रतिशत ही जीडीपी रही. आर्थिक सर्वे में लिखा है कि जीडीपी के मामले में भारत का स्थान सातवां हैं.

इस वक्त पिछले दौर के नारे सुनाई नहीं दे रहे हैं. मेक इन इंडिया और स्किल इंडिया जैसे नारे अब नेपथ्य में चले गए हैं. नए नारे आ गए हैं. पुराने नारे को सरकार ने या तो छोड़ दिया या बदल दिया या और नए नारे गढ़ लिए. बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की जगह बेटी आपकी धन लक्ष्मी और विजय लक्ष्मी यानी बदलाव का नारा आया है. स्वच्छ भारत की जगह सुंदर भारत आ गया है. एलपीजी की सब्सिडी छोड़े की जगह सब्सिडी के बारे में विचार करो. करों के अपवंचन से करों के अनुपालन तक.

अर्थव्यवस्था की हालत क्या है. जो ख़बरें बिजनेस अखबारों में छप रही हैं उन्हें देखकर लगता है कि चुनौतियां गंभीर होती जा रही हैं. लगातार 9 महीने से ऑटोमोबिल कंपनियों में उत्पादन ठप्प है. लघु एवं मझोले उद्योग का विकास रुक गया है. इनके लिए लोन की कमी हो गई है. जिन संस्थाओं से लोन मिलता है, उनकी हालत खराब है. एकर आरटीआई के अनुसार वित्त वर्ष 2019 में दूसरी तरफ मुदा लोन का एनपीए 126 प्रतिशत बढ़ा है. बैंकों की अपनी पूंजी लड़खड़ा रही है. वो सरकार की मदद पर निर्भर है.

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