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यूनिवर्सिटी सीरीज़ 23वां एपिसोड : अतिथि विद्वानों को बुनियादी सुविधाएं तक नसीब नहीं

हमने यूनिवर्सिटी सीरीज़ पर अतिथि विद्वानों की हालत पर कई बार दिखाया लेकिन लगता है कि किसी को फर्क नहीं पड़ा. फर्क नहीं पड़ने से जानने और समझने की हमारी कोशिश धीमी नहीं पड़ेगी.

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यूनिवर्सिटी सीरीज़ 23वां एपिसोड : अतिथि विद्वानों को बुनियादी सुविधाएं तक नसीब नहीं
यह यूनिवर्सिटी सीरीज़ का 23वां अंक है. नौकरी का मतलब होता आर्थिक तरक्की. आज हम ऐसी नौकरी की बात करेंगे जिसे करते हुए आदमी ग़रीब होता है. मध्य प्रदेश में जो ठेके पर रखे जाते हैं उन्हें अतिथि विद्वान कहते हैं. लाइब्रेरी में जो रखे जाते हैं उन्हें अतिथि ग्रंथपाल कहते है. कायदे से तो अतिथि की ख़ातिरदारी करने का दंभ भरते हैं मगर राज्य के अतिथि विद्वानों की सिस्टम ने ऐसी ख़ातिरदारी की है वे दस दस साल की नौकरी के बाद भी किसी की ख़ातिरदारी के लायक नहीं रहे. हमने यूनिवर्सिटी सीरीज़ पर अतिथि विद्वानों की हालत पर कई बार दिखाया लेकिन लगता है कि किसी को फर्क नहीं पड़ा. फर्क नहीं पड़ने से जानने और समझने की हमारी कोशिश धीमी नहीं पड़ेगी. जफर मुल्तानी की मदद से हम अतिथि विद्वानों के घर चलेंगे और उनकी आर्थिक स्थिती का अंदाज़ा लगाएंगे. दस साल की नौकरी के बाद भी उनकी क्या हालत हो गई है.

कैलाश प्रसाद गढ़वाल का घर किसी अच्छे इलाके में नहीं है. कैलाश जी जिस घर में हमें ले जा रहे हैं वो आठ बटे दस फुट का ही है. आप एक ज़िंदगी में झांक कर देखते रहिए कि नौकरी की उम्मीद किसी की क्या हालत कर देती है. सरकारों के बेरोज़गारी दूर करने के नारे इतने खोखले हैं कि वह रोज़गार भी देती है तो बेरोज़गार से भी बदतर हालत बना देती है. एक कमरे में तीन कमरे का काम चलता है और तीन लोगों का परिवार रहता है. कैलाश प्रसाद गढ़वाल, उनकी पत्नी और एक बेटी. 2000 किराया है इस एक कमरे का. 2007 में कैलाश प्रसाद गढ़वाल 6000 महीने में कमा लेते थे, आज 2017 में 12000 कमा पाते हैं. दस साल में उनकी जितनी कमाई थी, उतनी ही रह गई. एक तरह से दस साल पहले वे जितना राशन ला सकते थे, आज भी उतना ही ला सकते हैं. ये एक अतिथि ग्रंथपाल का जीवन है जो आप देख रहे हैं. लाइब्रेरी साइंस में एम फिल किया है, एम लिब किया है, इसके बाद भी 580 रुपये की दिहाड़ी कभी भी महीने में 12000 से अधिक नहीं कमाने देती है. 12000 किराया, बिजली बिल, फीस, दवा और राशन में ही तमाम हो जाता है. पति पत्नी का एक बीमा है इसके अलावा कोई सेविंग नहीं है. अप्रैल में जब कॉलेज बंद होता है तो जुलाई तक कैलाश जी गांव खेती करने चले जाते हैं. परिवार के लोग सपोर्ट करते हैं. बेटी का स्कूल खुलता है तो शहर आ जाते हैं. सैलरी आठ महीने की ही मिलती है जबकि किराया वे बारह महीने का देते हैं. वैसे भी सितंबर और अक्टूबर की सैलरी नहीं मिली है.

दस साल की नौकरी के बाद भी कैलास गढ़वाल आयकर देने लायक नहीं हो सके. जब उनकी महीने की कमाई 6000 से 12000 ही हुई तो आयकर की श्रेणी में कैसे आते. इंफ्लेशन का हिसाब लगाएंगे तो 2007 में जो 100 रुपया था, उसका मूल्य 2017 में 205 से अधिक हो जाता है. इस हिसाब से कैलाश जी की महीने की कमाई दस साल में बिल्कुल नहीं पढ़ी. वह भी साल के चार महीने की सैलरी नहीं मिलती है. इंफ्लेशन के हिसाब से देखेंगे तो दस साल की मेहनत के बाद कैलाश गढ़वाल जहां थे वहीं हैं. बल्कि वे नौकरी करते हुए ग़रीब हो गए हैं. आपको एक अतिथि ग्रंथपाल की पत्नी की बात सुनाते हैं.

अब हम आपको अतिथि सहायक ग्रंथपाल कैलाश विश्वकर्मा के घर ले जाना चाहते हैं. इन्हें 500 रुपये प्रति कार्यदिवस मिलता है. आप विश्वकर्मा का घर देखिए. एक बिस्तर से ज्यादा रखने की जगह नहीं है. रसोई किसी कोने में तीन चार बर्तनों से बसी हुई है. कैलाश विश्वकर्मा 2007 में प्राइवेट कॉलेज में काम करते थे जहां 15000 मिलता था, सरकारी नौकरी में ठेके पर आ गए यह सोच कर कि कभी नौकरी पक्की होगी और सैलरी बढ़ेगी. दस साल पहले वे महीने का 15000 कमाते थे, आज वे 12000 कमाते हैं. 3000 कम हो गई. एक तरह से दस साल में इनकी कमाई करीब 40 फीसदी कम हो गई. दस साल की मेहनत के बाद गरीब हो गए. आप उनके घर की तस्वीर देखते चलिए और अंदाज़ा लगाइये कि लोगों की ज़िंदगी बदल रही है या नहीं.

आपने चुनावों में वो पोस्टर देखे हैं, मिलेगा सबको काम, अब नहीं होगा पलायन. नेता चुनावों में उम्मीद क्यों बेचता है, क्योंकि उम्मीद बेचने का वही टाइम होता है. आखिर जब जीडीपी बढ़ने का दावा हो रहा है, आर्थिक तरक्की का दावा हो रहा है तो कैलाश गढ़वाल और कैलाश विश्वकर्मा का जीवन स्तर क्यों नहीं बढ़ रहा है. विश्वकर्मा जहां रहते हैं उनके साथ दो और अतिथि विद्वान रहते हैं.

शहर से दूर हाईवे पर हम आपको एक मकान में ले चलना चाहते हैं. आसपास कोई मकान नहीं है. कांशीराम प्रजापति स्नातक के छात्रों को गणित पढ़ाते हैं, कमरे में उनकी ज़िंदगी में गणित का कोई नामोनिशान नहीं बचा है. दो साल से कालेज में पढ़ाने के बाद उन्हें यही ज़िंदगी हासिल है. महीने में 12000 ही कमा पाते हैं, उसमें भी साल के चार महीने कुछ नहीं मिलता है. किराया नहीं दे सके हैं तो कमरा खाली करने का दबाव बना रहता है. गणित का लेक्चरर होने के बाद भी आयकर दाता की हैसियत में नहीं आ सके हैं. परिवार का सपोर्ट न होता तो चार महीने बिना सैलरी की ज़िंदगी बितानी मुश्किल हो जाती है. कांशीराम प्रजापति की शादी हो चुकी है, एक बच्चा भी है. प्रथम वर्ष से लेकर तृतीय वर्ष के करीब 100 छात्रों को गणित पढ़ाने वाले मास्टर की आर्थिक हैसियत का अंदाज़ा आप कर सकते हैं. कांशीराम प्रजापित के पास किसी प्रकार का बीमा भी नहीं है.

12000 रुपये में कालेज में कोई गणित पढ़ाने के लिए मजबूर है. होगा कुछ नहीं यह सोचकर यह सीरीज़ बंद नहीं की जा सकती, कम से कम हम जनता के रूप में अपनी हालत तो देख ही सकते हैं. ज़िंदाबाद और मुर्दाबाद का नतीजा क्या निकला इसका हिसाब तो कर ही सकते हैं. आपने जिन अतिथि विद्वानों की हालत देखी वो इंदौर से 160 किमी दूर आगर मालवा ज़िले के सुसनेर कस्बे के एक कालेज में पढ़ाते हैं. सुसनेर राजस्थान और मध्यप्रदेश की सीमा पर स्थित है. इस कालेज का नाम विवेकानंद शासकीय महाविद्यालय है. विवेकानंद की मूर्ति बनाने के नाम पर इस देश में राजनीतिक दल दंगा करा देंगे, कई सौ करोड़ की मूर्ति बनाने का एलान कर देंगे मगर उनके नाम पर बने कालेज में पढ़ाने वाले शिक्षकों की हालत में सुधार नहीं करेंगे. जब शिक्षकों की ये हालत है तो फिर इस देश में शिक्षक दिवस क्यों मनाया जाता है. सागर के दैनिक भास्कर के संदीप तिवारी ने एक रिपोर्ट छापी है. इस रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश के 435 कालेजों में 4 लाख 43 हज़ार छात्र पढ़ रहे हैं. यूजीसी की गाइडलाइन है कि 30 छात्रों पर एक शिक्षक होने चाहिए. यूजीसी की गाइडलाइन के हिसाब से 15000 शिक्षक होने चाहिए. मगर मध्य प्रदेश में शिक्षकों के लिए स्वीकृत पदों की संख्या मात्र 9,246 ही है. आवश्यकता से 6000 कम पद स्वीकृत हैं. जो 9246 पद स्वीकृत हैं वो भी पूरे नहीं भरे हैं. शिक्षकों के 4385 शिक्षकों के पद ख़ाली हैं. उच्च शिक्षा विभाग द्वारा सहायक प्राध्यपकों के लिए 2461 पदों की बहाली आने वाली है.

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश में 30 कालेज ऐसे हैं जहां एक भी नियमित शिक्षक नहीं है. क्या भारत के नौजवानों के साथ यह मज़ाक नहीं है. क्या नौजवानों ने अपने साथ यह मजाक नहीं होने दिया. उन्होंने क्यों नहीं पूछा कि जिस कालेज में जाते हैं वहां शिक्षक क्यों नहीं है. अतिथि विद्वानों का शोषण नहीं होता तो मध्य प्रदेश के कालेज जितने चल रहे हैं उतने भी नहीं चल पाते. उन्हें आधी सैलरी देकर राज्य सरकार ने शिक्षा का बजट कितना बचाया होगा. इस भरम में न रहे कि यह हालत मध्य प्रदेश में ही है, दिल्ली यूनिवर्सिटी से लेकर बिहार यूपी राजस्थान हर जगह है.

आगर मालवा से 250 किमी दूर है भोपाल के नेशनल लॉ इंस्टिट्यूट यूनिवर्सिटी में छात्र 9 नवंबर से आंदोलन कर रहे हैं. छात्रों ने अपनी मांगों का पोस्टर कैंपस में हर जगह लगा दिया है. उनकी 50 मांगें हैं जिनमें से एक है यूनिवर्सिटी के निदेशक को तत्काल हटाया जाए. इस कालेज के संरक्षक भारत के मुख्य न्यायाधीश हैं. NILU मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय और नेशनल ज्यूडिशियल एकडमी के साथ मिलकर काम करता है. छात्रों के आरोप हैं कि निदेशक लड़कियों के पहनावे पर टिप्पणी करते हैं. यहां तक कहा है कि क्या वे अपनी इज्ज़त और शर्म बेचकर आई हैं. छात्रों का कहना है कि परिसर में जातिगत, लैंगिक भेदभाव पर कोई कार्रवाई नहीं होती है. परीक्षा की कापी भी ठीक से नहीं जांची गई जिसके कारण कई छात्र फेल हुए हैं. 500 छात्र अपने आंदोलन पर अड़े हुए हैं. भोपाल से बीजेपी के सांसद आलोक सजर ने इन छात्रों का समर्थन किया है और कानून मंत्री से बात करने का आश्वासन दिया है. निदेशक का कहना है कि दस साल के कार्यकाल में 9 साल तक उन पर कोई आरोप नहीं लगा है. अचानक क्या है. लगता है कि कुछ छात्र उनकी छवि ख़राब करने की कोशिश कर रहे हैं. निदेशक का कहना है कि छात्रों की ज़्यादातर मांगें मान ली गई हैं. निदेशक का बायोडेटा भी काफी तगड़ा है. पहले छात्रों को सुनिये फिर निदेशक का पक्ष भी आपके सामने होगा.

लॉ कालेज के छात्रों की जागरूकता इतनी तो है कि वे गलत सही को लेकर आंदोलन कर रहे हैं, यहां तो राज्य के राज्य कालेजों में पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं हैं मगर किसी को उफ्‌फ नहीं करना आता. हमारे नौजवान व्हाट्सऐप और फेसबुक पर बिजी हैं. उन्हें पता ही नहीं है कि अपने लिए मांगने का क्या मतलब होता है, इसलिए जब कोई दूसरा सवाल उठाता है तो इन्हीं में से कई फेसबुक पर आकर गाली देने लगते हैं कि सवाल क्यों कर रहे हों. शायद उनका यह मतलब होगा कि चुपचाप जैसे हम बर्बाद हुए हैं, वैसे ही तुम भी बर्बाद होते रहे.


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