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60 करोड़ भारतीयों के आगे गंभीर जल संकट...

हर जगह टैंकर दौड़ रहे हैं. इस वक्त भारत में पानी अगर कहीं हैं तो टैंकर में है. हमारे सहयोगी प्रमोद गुप्ता ने इस पर पहले स्टोरी की थी, हम फिर से इसके बारे में बताना चाहते हैं.

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मध्य प्रदेश में 15 साल में 35000 करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं कि घर घर से नल से जल पहुंचे. नल कहां गया, जल कहां गया और धन कहां गया. आज हम एक लंबी रिपोर्ट बताने वाले हैं. हम आपको बिहार में सामर्सिबल पंप के ज़रिए सूखा पैदा किए जाने की फैक्ट्री के बारे में भी बताएंगे. चेन्नई के संकट के बारे में भी बताएंगे. आप भारत में पैदा किए जा रहे पानी के संकट के बारे में पढ़ते चलिएगा. कुछ दिनों में मॉनसून की बारिश होने लगेगी और कहीं कहीं से बाढ़ की ख़बरें आने लगेंगी. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भारत में पानी का संकट कम हो जाएगा. बारिश के दौरान भी देश के कुछ हिस्सों में सूखा रहता ही है. पानी का संकट तेज़ी से हमारे करीब आ रहा है. आप भले टीवी पर नहीं देख पा रहे हैं लेकिन गांव-गांव पानी के संकट के कारण खाली हो रहे हैं. कहीं कहीं जल संरक्षण के काम भी हो रहे हैं. आज से और अभी से पानी को लेकर कुछ नहीं किया गया तो बोतल का पानी भी एक दिन नहीं मिलेगा. नीति आयोग की रिपोर्ट कह रही है कि 60 करोड़ भारतीय गंभीर जल सकंट से गुज़र रहे हैं. यानी भारत की आधी आबादी पानी के गंभीर संकट से घिरी हुई है. साफ पानी नहीं मिलने के कारण हर साल दो लाख भारतीय मर जाते हैं. हर दिन साफ पानी के कारण भारत में 547 लोग मर जाते हैं. क्या ये आंकड़े काफी हैं पानी को लेकर कुछ करने के लिए या अभी हम इंतज़ार करेंगे कि हर दिन 1000 लोग मरेंगे तब कुछ करेंगे. 2030 का साल आते आते पानी का संकट और गहरा हो जाएगा. सोचिए इस संकट के रहते क्या हमारी कोई भी उपलब्धि बताने या गाने लायक हो सकती है. ब्रिटेन के अखबार इंडिपेंटेंड ने लिखा है कि अब अगर धरती पर जितनी ज़मीन बची है उस पर भी पेड़ लगा दें तब भी ग्लोबल वार्मिंग से हम नहीं बचने वाले हैं. हमारे पास रास्ते कम बचे हैं.

चेन्नई की खबरें आप तक कम पहुंच रही हैं. आज चेन्नई की पहचान प्लास्टिक की रंग बिरंगी गगरियों से हो रही हैं. चेन्नई से आ रही तस्वीरें बता रही हैं कि जब तक गांव सूख रहे थे, कस्बे सूख रहे थे तब तक तो महानगरों को चिन्ता नहीं हुई लेकिन अब भारत का एक महानगर सूखने लगा है. पानी लेने की कतार में खड़ी औरतों को देखिए. भारत में कहीं भी देखिए. आपको लगेगा कि पानी का संकट सिर्फ औरतों का संकट है. मर्दों का है ही नहीं. मर्द जैसे हवा पीकर काम चला रहे हैं. आखिर वो क्यों नहीं पानी ढोते नज़र आते हैं. जहां भी देखिए भारत में औरतें और बच्चे खासकर बच्चियां पानी ढोती नज़र आ रही हैं. लगातार तीन साल से चेन्नई सूखा झेल रहा है. अस्पताल तक में पानी नहीं है. आईटी सेक्टर में भी कहा जा रहा है कि लोग घरों में रह कर काम करें. दफ्तर न आएं. सरकार ने पानी की सप्लाई में 40 प्रतिशत की कटौती कर दी है. मद्रास रेसिडेंसी में कभी हज़ारों तालाब हुआ करते थे मगर उन्हें भर कर शहर के लिए प्लॉट काट दिया गया. चेन्नई शहर की अडयार नदी के फ्लड बेसिन में एयरपोर्ट बना दिया. फ्लड बेसिन का मतलब हुआ कि बाढ़ के दिनों में नदी का पानी जहां तक फैलता है. हमने नदियों की ज़मीन हड़प ली. यहां की दलदली ज़मीन को भर कर मास रैपिड ट्रांजिट सिस्टम बना दिया गया. लिहाज़ा यह शहर दिसंबर 2015 में बाढ़ में डूब गया था. सैकड़ों लोग मारे गए थे. बारिश का पानी ज़मीन सोख सके, इसके लिए प्रकृति ने जो ज़मीन दी थी, वो गायब हो गई. उसके बाद से यहां सूखा ही सूखा है. लोग एक टैंकर के लिए 2500 रुपये तक देने लगे हैं. अब वो भी महंगा होने लगा है. टैंकर भी तो कहीं से पानी ला रहे हैं. जिससे जल स्तर घट ही रहा होगा. टैंकर का आना बता रहा है कि किसी और जगह पर पानी का संकट तेज़ी से तैयार हो रहा है.


पानी का संकट अब हर जगह है. बिहार का मधुबनी और दरभंगा का इलाका जहां कदम कदम पर तालाब हुआ करता था वहां अब पानी नहीं है. लाखों तालाब की इस धरती पर तालाब कहां गए. ज़ाहिर है कोई लूट ले गया होगा. अतिक्रमण कर घर और दुकान बना लिया होगा. हम सबने ऐसे ही बर्दाश्त किया है और अब सबको इसके बदले में पानी का संकट झेलना ही होगा. तालाब सूख गए तो लोगों को लगा कि बोरिंग से काम चल जाएगा मगर बोरिंग से भी पानी ऊपर नहीं आ रहा है. हर जगह टैंकर दौड़ रहे हैं. इस वक्त भारत में पानी अगर कहीं हैं तो टैंकर में है. हमारे सहयोगी प्रमोद गुप्ता ने इस पर पहले स्टोरी की थी, हम फिर से इसके बारे में बताना चाहते हैं.

दरभंगा में 9 ऐसे विशाल तालाब हैं जो 900 साल से अधिक पुराने हैं. इस वक्त यहां सरकारी और प्राइवेट तालाबों की संख्या 839 है. ज्यादातर सूख गए हैं. इस ज़िले का एक प्रखंड है बिरौल जहां 890 तालाब हैं. इस ज़िले के किसी भी प्रखंड में जाइये 200-250 तालाब मिलेंगे जिन्हें स्थानीय भाषा में पोखर कहा जाता है. 40 साल पहले दरभंगा ज़िले में करीब चार हज़ार तालाब थे. आधे लापता हैं और बाकी सूख चुके हैं. सरकार दीवारों पर स्लोगन लिख कर चली जाती है. जल न रहे यदि जगत में, जीवन है बेकार टाइप. घरों के सामने हैंडपंप सूख गए हैं. अब सबको सबमर्सिबल मिल गया है. इसके लिए यूपी और राजस्थान से बोरिंग मशीनें लगाई गईं हैं. दरभंगा में धड़ाधड़ पानी का स्तर नीचे जा रहा है. एक शहर में इतने सारे सबर्सिमल लगा दिए गए हैं, इसका नतीजा कुछ ही दिनों में दिखने लगेगा. ज़ाहिर है पानी के संकट को लंबे समय तक अनदेखा किया गया और अब भी किया गया. हो सकता है बारिश की बाढ़ में संकट की यह कहानी पीछे चली जाए लेकिन बारिश के बाद वही स्थिति लौटने वाली है. तालाब का सिस्टम सूखा ही नहीं बल्कि अतिक्रमण का भी शिकार हुआ है. प्लॉट काट कर इमारतें बनी हैं और मॉल बने हैं. सोचिए इन तालाबों से लाखों को रोज़गार मिलता था. मछली और मखाना से कमाई होती थी. अब वो भी गया. पानी का संकट एक साथ कितने संकट लेकर आता है. अब आपको बार बार बताने की ज़रूरत नहीं है. प्रमोद गुप्ता ने बताया कि दरंभगा ज़िले से कभी 29 नदियों की धारा गुज़रती थी इनमें से कई गायब हो गई हैं.

अब आते हैं हमारी राजनीति की धरा को सिंचित करने वाले भू माफिया पर. भू माफिया पहले सरकारी रिकॉर्ड रूम से तालाबों का रिकॉर्ड गायब करवाता है. फिर तालाब को भरने में लग जाता है. कोई नागरिक शिकायत करता है तो अधिकारी उससे कहता है कि तालाब कहां है रिकॉर्ड लाओ. ज़िले के रिकॉर्ड रूम में तालाब का रिकॉर्ड नहीं मिलता. तब वह पटना और रांची जाता है. इस बीच तालाब का स्वरूप ही बदल चुका होता है. फर्जी नाम से तालाब का मालिक कोई और बनता है और फिर ज़मीन बिक जाती है. भारतीय व्यवस्था में भू माफिया कालजयी संस्था है. वह हर जगह पाया जाता है. जहां जगह नहीं होती है वहां भी होता है और जहां जगह होती है वहां तो होता ही है. बिहार सरकार के भू राजस्व विभाग ने मार्च 2017 में पटना हाई कोर्ट को बताया था कि 12000 से अधिक तालाब अतिक्रमण के शिकार हैं. भू माफिया एकदम से निर्दयी नहीं होता है. वह पहले तालाब हड़पता है मगर टैंकर माफिया बनकर पानी भी बेचता है. इतना प्यारा भू माफिया दुनिया के किसी भू-भाग में नहीं मिलेगा. सरकार जब ज़मीन हड़पती है तब उसे भू माफिया नहीं कहते. विकास कहते हैं. जैसे पटना का एम्स कहां बन रहा है. जहां बन रहा है वहां पहले 35 एकड़ ज़मीन में फैली झील थी जिसे भर दिया गया. प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि घर घर पानी पहुंचाएंगे. बिहार में हर घर को नल से जोड़ने की योजना चल रही है. ये पानी कहां से आएगा. पानी पहुंचाने से पहले हम सभी को नीति आयोग की रिपोर्ट पढ़नी चाहिए.

2020 तक 21 शहरों में पानी का भीषण संकट आने वाला है. दिल्ली, बंगलुरु, चेन्नई, और हैदराबाद भी इनमें शामिल है. इन शहरों के दस करोड़ अगले साल से ही पानी के संकट की चपेट में आ जाएंगे. 2030 तक भारत की आबादी का 40 फीसदी हिस्सा पानी से वंचित होगा. भारत का 70 प्रतिशत पानी प्रदूषित हो चुका है. प्रदूषित पानी के मामले में भारत 122 देशों में 120 नंबर पर है.

ऐसा नहीं है कि हम या आप इस तरह के आंकड़ों से पहले नहीं गुज़रे हैं. इनका इस्तेमाल ज़्यादातर निबंध और फेसबुक पोस्ट लिखने में होता है, समाधान में कम. वैसे जब भी ऐसी रिपोर्ट या घोषणा देखें कि पाइप से पानी पहुंचाया जाएगा उसके बारे में ठीक से छानबीन करेंगे. हम पानी के साथ सामूहिक और सामुदायिक जीवन जीते रहे हैं. पाइप का पानी बेहतर जीवन की उम्मीद जगाता है लेकिन पानी कहां से आएगा पहले इस पर बात होनी चाहिए. ठीक है कि 75 प्रतिशत घरों में पाइप से पानी नहीं पहुंचता मगर इन घरों को जहां से पानी मिल रहा था, उस पर हमला किसने किया. वो क्यों सूख गए. पाइप का पानी समाधान नहीं है. चेन्नई में ही पाइप की सप्लाई में 40 फीसदी की कमी करनी पड़ी है. प्रधानमंत्री कहते हैं कि घर-घर पानी पहुंचा देंगे. पानी बचेगा तभी पहुंचेगा. बिहार में 31 मार्च 2020 तक सभी घरों को पाइप से पानी पहुंचाने का कार्यक्रम चल रहा है.

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नीतीश कुमार ने बिहार के हर घर को पाइप के ज़रिए पानी देने का निश्चय किया है. इस पर तेज़ी से काम भी हो रहा है लेकिन यह पानी कहां से आ रहा है. इसके लिए बिहार में हज़ारों की संख्या में सबमर्सिबल पंप लगाए जा रहे हैं. यानी ज़मीन से पानी खींच कर पानी पहुंचाया जा रहा है. एक नज़र में लगेगा कि यह कमाल की योजना है लेकिन जल्दी ही पानी ज़मीन के नीचे भी सूख जाएगा. पानी का स्तर और नीचे चला जाएगा. सबर्मिसबल किसी भी तर्क से रोज़ पानी के भयावह संकट को पैदा कर रहा है. 24 मई 2018 को पटना टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक रिपोर्ट छापी है. इसमें कहा गया है कि पटना नगर निगम ने अपने क्षेत्र में 375 सबमर्सिबल पंप को मंज़ूरी दी है. य‍ह शहर के सभी 75 वार्ड में लगाए जाएंगे. एक पंप की कीमत है 15 लाख. सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर पानी के संकट को जल्दी जल्दी बुला रही है. यह भी वही काम है जो टैंकर माफिया करते हैं. दरभंगा नगर निगम में भी 48 सबमर्सिबल पंप लग चुके हैं. जल्दी ही 96 सबमर्सिबल पंप और लगेंगे. यही नहीं राज्य के नागरिक अपनी तरफ से भी सबर्मिसबल पंप लगवा रहे हैं. दरभंगा में दुकानदार ने बताया कि हर दिन शहर में 16-17 सबमर्सिबल पंप लगवा रहे हैं. हरियाणा, राजस्थान और यूपी से बोरिंग की मशीनें मगंवाई गईं हैं. इस तरह से सिर्फ यहीं पर 1500 1600 पंप लग गए हैं. पूरे बिहार में सबमर्सिबल का धंधा बन गया है. पानी के लिए लोग 80 हज़ार से लेकर 1 लाख तक अपनी जेब से भी खर्च कर रहे हैं. राज्य में पानी नहीं है मगर घिनौने स्तर पर पानी का धंधा फैल चुका है. एक शहर में आप सैकड़ों सबमर्सिबल पंप लगवा देंगे तो आप सोच नहीं सकते कि पानी का संकट कितना गहराने वाला है. टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर है 2016 की. गया में एक प्राइवेट कंपनी को सबमर्सिबल पंप लगाने का काम दिया गया. प्राइवेट कंपनी ने घोटाला कर दिया और लोगों को पानी नहीं पहुंचा. मामला कोर्ट तक पहुंचा था.

ये सबमर्सिबल पंप बिहार को दो साल के भीतर पानी विहीन कर देगा. मेरी बात याद रखिएगा. अगर प्रधानमंत्री सबमर्सिबल पंप से पानी पहुंचाने की किसी योजना के बारे में सोच रहे हैं तो उन्हें बिहार में ही इसकी जांच करा लेनी चाहिए. यह जानी हुई बात है कि भूमिगत जल स्तर लगातार नीचे जा रहा है. सबमर्सिबल पंप इस प्रक्रिया को बुलेट ट्रेन की रफ्तार से तेज़ कर देगा. अब आते हैं मध्य प्रदेश. 11 संवाददाताओं की मेहनत से यह रिपोर्ट बनी है. मध्य प्रदेश में भी पानी का संकट भीषण हो गया है. राज्य के 350 से अधिक नगर निकाय हैं. म्यूनिसपल बॉडिज कहते हैं इंगलिश में. ये निकाय पानी नहीं दे पा रहे हैं. कहीं तीन दिन बाद पानी आ रहा है तो कहीं दो दिन बाद. अब इसकी कई वजहों में एक वजह घोटाला भी है. यह घोटाला देश के दूसरे हिस्सों में भी हो रहा होगा, लेकिन अनुराग द्वारी की यह रिपोर्ट रास्ता बता रही है कि पानी बचाने के नाम पर क्या हो रहा है. मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार ने 15 सालों में नल जल योजना पर 35,000 करोड़ खर्च किया. लेकिन पानी मिला मात्र 6 फीसदी ग्रामीण आबादी को. पैसा कहां गया और पानी कहां गया. भ्रष्टाचार के खेल में पैसा नेता ही नहीं हज़ारों अफसरों कर्मचारियों की जेब में भी गया होगा. लेकिन कीमत लोग चुका रहे हैं. आगर मालवा से ज़फ़र सिंगरौली से देवेंद्र, छतरपुर से अरविंद, डिडौरी से डेविड, मंदसौर से मनीष, झाबुआ से सचिन, कटनी से आरबी गुप्ता, देवास से अरविंद, बड़वानी से मुनाफ़ भिंड से दिलीप, रतलाम से साजिद और अनुराग द्वारी ने मिलकर यह रिपोर्ट तैयार की है.



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