प्राइम टाइम इंट्रो : जानलेवा सूखा, पानी भरते-भरते दम तोड़ गई नन्ही योगिता

प्राइम टाइम इंट्रो : जानलेवा सूखा, पानी भरते-भरते दम तोड़ गई नन्ही योगिता

शोक में डूबे योगिता के परिजन

सच बात तो यह है कि हम आज इस विषय पर प्राइम टाइम करना चाहते थे कि क्या सेलिब्रेटी को ब्रांड की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। आज केंद्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान ने जानकारी दी कि सेंट्रल कंज़्यूमर प्रोटेक्शन काउंसिल ने फ़ैसला किया है कि किसी भी प्रोडक्ट के लिए सेलिब्रिटीज़ को भी ज़िम्मेदार माना जाएगा। ऐसे में कोई भी विज्ञापन करने से पहले सेलिब्रिटीज़ को उस प्रोडक्ट से जुड़ी सारी जानकारी हासिल करनी चाहिए। सेलिब्रेटी की ज़िम्मेदारी की बात तो हम कर रहे हैं और इस मुद्दे पर चर्चा होनी भी चाहिए, क्योंकि अब तो आपके सांसद भी उत्पाद का विज्ञापन कर रहे हैं। सेलिब्रेटी के लिए ज़िम्मेदारी है तो क्या विज्ञापन में आने वाले सांसद की जवाबदेही भी तय की जाएगी? यह भी एक गंभीर विषय तो है ही लेकिन तभी मुंबई दफ्तर से एक ईमेल आया। इस ईमेल ने ज़िम्मेदारी के सवाल को सिरे से पलट दिया। मुझे लगा कि योगिता भी किसी सेलिब्रेटी से कम नहीं है। वो 11 साल की है, तो क्या हुआ। पर मुझे नहीं मालूम की योगिता की ज़िम्मेदारी कौन लेगा और योगिता किसको ज़िम्मेदार ठहराएगी। हमारे पास पानी भरते हुए योगिता की तस्वीर नहीं है लेकिन हम किन्हीं और तस्वीरों के ज़रिये उसकी कहानी बताना चाहते हैं।

योगिता लातूर के पास बीड ज़िले की रहने वाली एक 11 साल की लड़की का नाम है। जो अपने घर से 400 मीटर दूर लगे हैंडपंप से पानी भरने जाया करती है। मेहरबानी होगी अगर आप ड्राईंग रूम में बैठे-बैठे जल्दी से कल्पना कर लें कि 400 मीटर कितनी दूरी होती है। तब समझना आसान होगा कि हैंडपंप से घड़ा भरकर घर तक आने में कितनी मेहनत लगती होगी। क्योंकि तभी आप योगिता की कहानी को समझ पायेंगे कि हैंडपंप से पानी भरना, सर पर लादकर घर लाने में उसे कितनी मेहनत लगती होगी। आम तौर पर एक घड़े को भरने में दो घंटे लग जाते हैं। हैंडपंप खाली तो होता नहीं है इसलिए वहां भी लाइन में लगना होता होगा। मुझे तो यकीन नहीं हो रहा है कि योगिता एक चक्कर में 10 लीटर पानी भर कर घर ले आती है। मुझे तो यह भी यकीन करने के लिए कहा गया कि वो छुट्टी वाले दिन 8 से 10 चक्कर लगा लेती है। इस हिसाब से इस उम्र में वो एक दिन में 80 लीटर पानी भर कर लाती होगी। सूखा कवर करने गई सांतिया ने बताया कि हैंडपंप चलाना काफी मुश्किल होता है। बच्चे को काफी ताकत लगानी होती है तब जाकर पानी मुश्किल से निकलता है। इतनी गर्मी में दिन भर पानी के लिए बाहर जाना, लाइन में लगना और घड़ा भरकर घर आना और फिर दूसरी खेप के लिए निकल जाना।

योगिता अब अपनी कहानी बताने के लिए इस दुनिया में नहीं है। वो होती तो अपने वाक्यों में कभी था या थी का इस्तेमाल नहीं करती इसलिए हमने भी नहीं किया। हमारे सहयोगी मनोज सतपुडे का कहना है कि योगिता पानी भरते-भरते मर गई। घर के लिए घड़ा भरते-भरते उसके शरीर का पानी ख़त्म हो गया। रविवार को योगिता 10 लीटर पानी लेकर घर आई थी। ये उसका पहला चक्कर था। दूसरे चक्कर के लिए घर से निकली और हैंडपंप के पास बेहोश हो गई। वहां से उसे अस्पताल ले जाया गया जहां वो बच नहीं सकी। शनिवार को उसने दो ही चक्कर लगाए थे। मनोज सतपुडे की डॉक्टर से बात नहीं हो सकी, हमारी सहयोगी सांतिया ने भी डॉक्टर को फोन लगाया मगर बात नहीं हो सकी। डेथ सर्टिफिकेट पर लिखा हुआ है कि बच्ची को हीट स्ट्रोक और भारी डिहाईड्रेशन था। यानी लू लगी थी और पानी की कमी हो गई थी। कार्डियो रेस्पिरेटिरी डिसोर्डर के कारण दिल और फेफड़े ने काम करना बंद कर दिया। शरीर में पानी की कमी और लू लगने से ऐसा होता है।

जिस दिन योगिता की मौत हुई उस दिन बीड का तापामान 44 डिग्री सेल्सियस था। योगिता का एक बड़ा भाई है 15 साल का। वो रविवार को बाहर गया हुआ था। 15 साल की उम्र में बाहर का मतलब खेलने या पढ़ने ही गया होगा या फिर दोस्तों के घर गया होगा। माता पिता हैं। पानी भरने का भार योगिता पर आया तो वो झेल न सकी। बहुत सारे बच्चे इस सूखे के कारण हाड़तोड़ मेहनत कर रहे हैं। जब सारा घर पानी लाने में लगा होगा तब आप सोच सकते हैं कि उनके शरीर को कितनी खुराक मिलती होगी।

हम लगातार तस्वीरों में देख रहे हैं कि सूखे के कारण मराठवाड़ा में औरतों और बच्चों की ज़िंदगी कितनी बदल गई है। क्या पता हम और आप इन तस्वीरों को देखते देखते सामान्य हो गए हों और ट्विटर पर मैच खेलने में लगे हों कि किसकी सरकार के समय क्या-क्या काम हुआ। इस झूठ को फैलाने में लगे हों कि पहली बार पानी की रेल चली है, जैसे पानी की रेल चलने से ही समाधान हो गया हो। आज बंगलुरू से एक और घटना हुई है।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा है कि कर्नाटक में सूखे का असर कुपोषण के शिकार बच्चों पर काफी गहरा पड़ रहा है।
साफ पानी न पीने से बच्चों को डायरिया से लेकर कोलरा तक की बीमारी होने लगी है। रायचूर, कलबुर्गी, बेल्लारी जैसे इलाकों में तापमान भी 44 डिग्री के पार चला गया है। इन इलाकों में 5 साल के नीचे के 30 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। एक दावे के अनुसार 2010 से 2016 के बीच यहां 3000 बच्चों की मौत हुई है।

गांव देहात में दस्त कोलेरा होने के समय बच्चे को जो अस्पताल मिलता होगा उसके बारे में क्या बतायें। सूखा पड़ता है तो पानी के साथ घर में अनाज की कमी हो जाती है, आमदनी कम हो जाती है तो बाहर से खरीद कर लाने का भी सवाल नहीं होता। बच्चा कम खाएगा तो क्या होगा अब ये तो बताने की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि हम सब हिन्दू-मुस्लिम टॉपिक में इतने पारंगत हो गए हैं कि ये सब मसले तो चुटकी जैसे लगते होंगे। डॉक्टर लोग कह रहे हैं कि कुपोषण के शिकार बच्चों को तरह-तरह की बीमारियों का ख़तरा है। कई बच्चों को मुश्किल से दो वक्त का खाना मिल पाता है। ये कर्नाटक है, जहां से भारत सॉफ्टवेयर से कोई सुपर पावर बनने वाला है। मंगलवार के 'इंडियन एक्सप्रेस' में गिरिश कुबेर ने एक लेख लिखा है जिसमें बताया है कि ये सूखा प्रकृति के कारण नहीं, बल्कि इंसानी करतूतों के कारण आया है। मराठवाड़ा में 40 प्रतिशत कम बारिश हुई है। लेकिन क्या यही कारण हो सकता है। पिछले साल बारिश का राष्ट्रीय औसत 1100 मिमि है और महाराष्ट्र का 1300 मिमि यानी महाराष्ट्र में राष्ट्रीय औसत से ज्यादा बारिश हुई। मराठवाड़ा में राष्ट्रीय औसत से काफी कम 882 मिमि बारिश हुई और विदर्भ में 1034 मिमि यानी राष्ट्रीय औसत से अधिक। लेकिन राजस्थान में तो औसत वर्षा 400 मिमि से अधिक ही नहीं रही तो, वहां क्यों नहीं मराठवाड़ा जैसे हालात हैं।

गिरीश कुबेर ने बताया है कि इसका कारण यही है कि सभी सरकारों ने मिलकर महाराष्ट्र में पानी की समस्या को अनदेखा किया है। महाराष्ट्र में 205 चीनी मीलें हैं। गन्ने की खेती के लिए आप जानते हैं कि पानी काफी लगता है। कुबेर ने लिखा है कि सरकार बताती है कि महाराष्ट्र में सिर्फ 4 प्रतिशत भूमि पर गन्ने की खेती होती है, लेकिन यह नहीं बताती है कि 4 प्रतिशत ज़मीन पर लगा गन्ना राज्य के पानी का 71.5 प्रतिशत हिस्सा पी जाता है। यह सबको पता है। लेकिन चीन मीलों के दम पर राज्य की राजनीति और नेताओं का साम्राज्य टिका हुआ है। यह भी कोई नहीं बात नहीं है। महाराष्ट्र जानता है लेकिन महाराष्ट्र ऐसे बर्ताव करता है जैसे ये बात नहीं जानता है। पिछले तीन साल में मराठवाड़ा में 20 चीनी मीलें खुली हैं। वहां 70 चीनी मीले हैं। अब महाराष्ट्र सरकार ने कहा है कि अगले पांच साल तक चीनी मीलें नहीं खुलेंगी, लेकिन जब तक आप इन चीनी मीलों के ज़रिये वहां की राजनीति को नहीं समझेंगे, इस समस्या का तो न समाधान होगा, न इस पर ठीक से बात।

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हमारे सहयोगी श्रीनिवासन जैन, तेजस मेहता, सांतिया ने उन इलाकों का ठीक-ठाक दौरा किया है। तमाम मराठी, अंग्रेजी अखबारों से लेकर न्यूज़ साइट पर भी इसकी चर्चा है। हर बार इतनी चर्चा तो हो जाती है मगर समाधान नहीं होता। कविता अय्यर ने 'इंडियन एक्सप्रेस' में लिखा है कि महाराष्ट्र के अन्य शहरों में भी पानी का गंभीर संकट है। हिंगोली कस्बे में लोगों को तीन दिन पर पानी मिल रहा है चूंकि तीन दिन में मिल जा रहा है वो इसे ही अपनी किस्मत समझ रहे हैं। तेरह लाख की आबादी वाले औरंगाबाद में भी लोगों को दूसरे या तीसरे दिन निगम का पानी मिल रहा है। देश भर में चुने गए 98 स्मार्ट सिटी में से एक औरंगाबाद में भी बनना है। पानी की हालत देखकर लगता है यहां पानी ईमेल से आयेगा। नांदेड़ में 100 मिलियन लीटर प्रति दिन पानी की मांग है लेकिन उपलब्ध है मात्र 50 मिलियन लीटर प्रति दिन। वही हाल परभणी और जालना का भी है। प्रसाद काथे की रिपोर्ट है कि राज्य सरकार 4356 टैंकरों से प्रभावित इलाकों में पानी की सप्लाई हो रही है। हज़ारों टैंकर लगाने के बाद भी संकट का यह स्वरूप है।

योगिता की मौत के बाद भी अगर हम नहीं देख पा रहे हैं कि सूखे ने मराठवाड़ा से लेकर बुंदेलखंड तक के बच्चों को कैसे प्रभावित किया होगा तो क्या किया जा सकता है। क्या आपने सुना है कि सूखा प्रभावित इलाकों में बच्चों के लिए क्या कुछ किया जा रहा है। हर तरफ बच्चे पानी भरते नज़र आ रहे हैं। बच्चे नहीं भरेंगे तो पानी नहीं आएगा और पानी भरेंगे तो बच्चा मर जाएगा।