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आख़िर नाम भी तो संजय है...

पर पानी मारने से भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा. ये जद्दोजहद पिछले कई हफ़्तों से चल रही थी. ज़िद और जरूरत के बीच संघर्ष ने सबसे पहले चैन को अपना शिकार बना लिया. मौके की नज़ाकत को भांपते हुए सुकून बेचैनी के रास्ते से स्वत: हट गया.

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आख़िर नाम भी तो संजय है...

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर

"मेरे साथ ऐसा नहीं हो सकता'. खीज के साथ झुंझलाहट बढ़ती जा रही थी. कंप्यूटर पर अक्षर धुंधले नज़र आ रहे थे. आंखें फैलाई. मिचमिचाई. मल कर भी देखी. वाशरूम जाकर पानी से धो भी ली. (दिल्ली में 23 साल से रहते-रहते "बाथरूम" कब "वाशरूम" बन गया पता ही नहीं चला.) पर पानी मारने से भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा. ये जद्दोजहद पिछले कई हफ़्तों से चल रही थी. ज़िद और जरूरत के बीच संघर्ष ने सबसे पहले चैन को अपना शिकार बना लिया. मौके की नज़ाकत को भांपते हुए सुकून बेचैनी के रास्ते से स्वत: हट गया.

चालीस से ज़्यादा वसंत देख चुकी आंखों पर हमेशा से बहुत गर्व रहा है. दूसरे अंग समय-समय पर शिकायत दर्ज कराते रहे हैं लेकिन आंखों ने कभी दिमाग़ के दरबार में दुखड़ा नहीं रोया. एकाध दफे आंखें आयीं लेकिन कुछ दिन लालिमा फैलाकर चली गईं .बिना निशान छोड़े.

'मेरी आंखों की क्षमता पर तो दोस्तों को भी हैरानी होती थी!' बुदबुदाना जारी था. आज भी याद है. वक़्त के साथ याददाश्त धुंधली जरूर पड़ने लगती हैं लेकिन कुछ बातें ऐसी होती हैं जो कभी मानस पटल से मिटती नहीं. कॉलेज के दिनों में पटना के बेली रोड के ऑफ़िसर फ़्लैट में एक दोस्त रहता था- आशीष कृष्णन. नाम से गच्चा मत खाइएगा. बिहारी है. पटना से सटे दानापुर में पुश्तैनी घर था. अभी मुंबई में एक्सिस बैंक में वाइस प्रेसीडेंट है. हम दोस्त लोग हर तीसरे दिन उसके घर धमक जाते थे. ऑफ़िसर फ़्लैट के छत पर अल्हड़पने में हवाबाज़ी करना और सपने बुनने का अपना ही मज़ा था. आंखों का ज़िक्र चल रहा है तो ये छुपाना खुद से बेईमानी होगा कि वहां अड्डा ज़माने का मक़सद आंखें सेंकना भी होता था. चिली सॉस के साथ आशीष के घर की निमकी का स्वाद जिह्वा पर ऐसा चढ़ा कि आज भी भुला नहीं पाया. अब तो बच्चों को भी निमकी और चिली सॉस का चटकारा पसंद है.

एक शाम हमारी महफ़िल फिर जमी. एक बहुत दूर कोई बोर्ड लगा हुआ था. मैंने आसानी से उस पर लिखी बातें पढ़ दीं. चश्मा लगाने के बाद भी आ़शीष पढ़ नहीं पाया. तब उसने कहा था, "कितनी तेज़ हैं तुम्हारी आंखें!" उसकी ये बात मुझे आज भी याद है.

कॉलेज का एक और दोस्त था- अंबर सेन वैद्य. गोरा-चिट्टा स्मार्ट. सेंट माइकल का पढ़ा-लिखा था. उसकी इंग्लिश बहुत ज़बरदस्त थी. इंग्लिश गाने सुनता था. हम ठहरे सरकारी स्कूल वाले. हम तर्क देते थे कि इंग्लिश गानों में बस शोर शराबा होता है, मेलोडी नहीं होती. तब उसने मुझे ब्रायन एडम्स का कैसेट दिया और 'एवरी थिंग आई डू, आई डू इट फ़ॉर यू...' सुनने के लिए कहा. गाना सचमुच 'सूदिंग' लगा. उन दिनों देसी मैडोना अलीशा चिनॉय भी ज़बरदस्त हिट चल रहीं थी ख़ासकर मैडोना से चुरायी धुन पर उनका 'मेड इन इंडिया' गाना धूम मचाए हुए था. उनके कैसेट तो अपने पास थे ही. कैसेट ख़रीदने का एक तरह का जुनून हुआ करता था. एक बार तो समांथा फ़ॉक्स का भी कैसेट ख़रीद लाया था, कवर देखकर. 'स्पोर्ट्स स्टार' मैगज़ीन भी टेनिस में दिलचस्पी से ज़्यादा स्टेफी ग्राफ़ और गैबरिएला सबातिनी के पोस्टर के लिए ख़रीदे. बहरहाल इंग्लिश गानों का सुरूर अपन पर चढ़ नहीं पाया.

अम्बर सेन के पिताजी इंग्लिश के प्रोफ़ेसर थे. नाम था समीर सेन गुप्ता. नाम सुना हुआ सा लग रहा हो तो बता देता हूं कि वे रेडियो पर कॉमेंट्री भी करते थे. उनके एक और साथी कॉमेंटेटर थे- प्रेम कुमार. उनसे जुड़ा एक मज़ेदार वाक़या है. फ़ुटबॉल कॉमेंट्री के दौरान गोल होने पर जोश में एक बार प्रेम कुमार चिल्ला गए- ले लोट्टा, गोल!

अंबर जक्कनपुरी में रहता था जबकि मेरा घर न्यू पाटलिपुत्र कॉलोनी में है. रूट में नहीं होने के बावजूद अक्सर मैं उसे अपने वेस्पा पर बैठाकर दरभंगा हाउस ले जाया करता था. पटना विश्वविद्यालय के एमए के क्लास दरभंगा हाउस में होते हैं. दरभंगा हाउस को नवलखा भवन भी कहा जाता है. इसे दरभंगा के महाराजा कामेश्वर सिंह ने बनवाया था. गंगा के किनारे स्थित इस इमारत में एक काली का मंदिर है जो देवी दुर्गा की पूजा के लिए जाना जाता है. दरभंगा महाराज अंग्रेज़ों के दोस्त कहे जाते थे. वैसे पत्रकारिता के क्षेत्र में दरभंगा महाराज का काफी योगदान रहा है. उन्होंने कई अखबार व पत्रिकाएं शुरू कीं. हमारे कॉलेज के दिनों में उनके 'द इंडियन नेशन' और 'आर्यावर्त' अख़बार बेहद लोकप्रिय हुआ करते थे. तब एक 'प्रदीप' अख़बार भी था. बाद में 'आज' ने सबका खेल खराब कर दिया. शायद स्पोर्ट्स को तवज्जो देने वाला 'आज' पहला अखबार था. हम तो खेल की रिपोर्ट के लिए ही 'आज' पढ़ने लगे. हम अख़बार आख़िरी पन्ने से पढ़ते थे. आख़िरी पन्ना खेल का हुआ करता था. स्कूली बच्चों और युवाओं के लिए आज भी खेल पहली ख़बर है. लेकिन अफ़सोस कि कई न्यूज़ चैनल खेल को अहमियत ही नहीं देते.

अंबर ने अपने धाराप्रवाह इंग्लिश से दरभंगा हाउस में भी अपना जलवा जमा लिया. उसी से हमने पहली बार 'पिलो फ़ाइटिंग' के बारे में जाना. एमए के दौरान मुझे जूनियर हिंदी ऑफिसर की सरकारी नौकरी मिल गई. लिहाज़ा एमए छोड़ दिया. उसके बाद आईआईएमसी में चयन हो गया तो सरकारी नौकरी भी छोड़ दिल्ली आ गया.

एमए के दिनों की बात है. मैं और अंबर क्लास ख़त्म कर लौट रहे थे. प्लेनेटोरियम के सामने सोना मेडिकल से कुछ दवा ख़रीद कर स्कूटर स्टार्ट कर बढ़ाया ही था कि पीछे से एक साइकल सवार अचानक निकल आया. मैंने तुरंत ब्रेक लगाया. अंबर की टिप्पणी मुझे आज भी याद है- "तुम्हारा रिफ्लेक्शन ज़बरदस्त है!"

अगर आपको याद हो तो 'रिफ्लेक्शन' ही वो चीज़ थी जिसे कमज़ोर बता कर वीरेंद्र सहवाग को टीम से बाहर किया गया था. ये उम्र के साथ आती है और उम्र के साथ जाने भी लगती है. हाल ही में एक शोध में पढ़ा था 18 साल से कम उम्र में ड्राइविंग की मनाही इसलिए होती है कि तब आपका 'रिफ्लेक्शन' डेवलप नहीं हुआ होता है.

कुछ कारणवश अंबर से दूरियां बन गईं. कई वर्षों बाद फ़ेसबुक पर मिला. पटना में ही टीचर है. मुझे न जाने क्यों लगता है कि अगर दिल्ली आ गया होता तो शायद वो अच्छा एंकर बन सकता था. लेकिन जो सुकून उसे वहां हासिल है वो नहीं मिल पाता.

"कल तक तो सब साफ़-साफ़ दीख ही रहा था. अचानक ये दिक़्क़त क्यों आ रही है?" साथी विमल मोहन ने हैरान हो कर कई बार पूछा भी था, 'तुम बिना चश्मे के पढ़ लेते हो?'

हालांकि 2010 में जब आई-चेक अप कराया था तभी डॉक्टर ने चश्मा तो बनवा दिया था लेकिन साथ में सलाह भी दी थी कि बहुत जरुरत होने पर ही लगाना वरना आदत पड़ जाएगी. इन वर्षों में जरुरत लगी भी नहीं. हालांकि दवा के शीशी पर एक्सपायरी डेट पढ़ पाने में मुश्किल पिछले एक साल से आने लगी थी.

चश्मा नहीं पहनने की ज़िद और जरुरत के बीच संघर्ष में जरुरत जीत गई है. जरुरत को आदत बनाने की क़वायद अब भी जारी है. ऑफ़िस में तो चश्मा ले जाना याद रहता है लेकिन कहीं और जाना हो तो याद नहीं रहता. मोबाइल की तरह सब जगह ढोने की आदत अभी नहीं डाल पाए हैं. लिहाजा पेट्रोल पंप पर रसीद, मॉल में टैग पर सामान के दाम और सुपर स्टोर पर बिल नहीं पढ़ पाने पर ग़ुस्सा आता है.

मन और शरीर उम्र से युवा योद्धा की तरह बदस्तूर लड़ रहे हैं. लेकिन जिस पर सबसे ज़्यादा नाज़ था वही सबसे पहले कमज़ोर पड़ गया लगता है. वैसे दूर की दृष्टि आज भी उतनी ही तेज़ है. आख़िर नाम भी तो संजय है.

संजय किशोर एनडीटीवी के खेल विभाग में एसोसिएट एडिटर हैं...
 
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