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क्या नीतीश कुमार एक बार फिर मारेंगे पलटी?

क्या नीतीश कुमार एक बार फिर पलटी मारेंगे? यह सवाल इसलिए क्योंकि बीजेपी के साथ उनकी खटपट शुरू हो गई है. सीटों के बंटवारे को लेकर ज़ोर-आज़माइश हो रही है.

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क्या नीतीश कुमार एक बार फिर मारेंगे पलटी?

क्या नीतीश कुमार एक बार फिर पलटी मारेंगे? यह सवाल इसलिए क्योंकि बीजेपी के साथ उनकी खटपट शुरू हो गई है. सीटों के बंटवारे को लेकर ज़ोर-आज़माइश हो रही है. एक-दूसरे पर बयानों के तीखे तीर चलाने का सिलसिला शुरू हो गया है. इसी बीच नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद को फोन कर दिया. बताया गया कि बातचीत का मुद्दा लालू की सेहत थी. लेकिन इससे बीजेपी-जेडीयू गठबंधन की सेहत पर सवाल उठ गए. 

पूरा मुद्दा समझने की कोशिश करते हैं. महाराष्ट्र में शिवसेना और बिहार में जेडीयू बीजेपी का 'बड़ा भाई' बनना चाहते हैं. हैं तो दोनों ही बीजेपी के पुराने सहयोगी, लेकिन बीजेपी से जबर्दस्त तकरार भी हुई है. शिवसेना और बीजेपी विधानसभा का चुनाव अलग-अलग लड़े तो वहीं, नीतीश तो लालू और कांग्रेस के साथ महागठबंधन बना कर बीजेपी को हरा चुके हैं. ये बात अलग है कि तेजस्वी यादव के साथ नीतीश की पटरी नहीं बैठी और लालू प्रसाद के परिवार पर भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद नीतीश नाटकीय घटनाक्रम में बीजेपी के पास वापस आ गए. 

पर अब लोक सभा चुनाव सिर पर हैं. नीतीश 'बड़ा भाई' बनकर लोकसभा चुनावों में पुराना 25-15 के पुराने फॉर्मूले पर वापस जाना चाहते हैं, जिसमें जेडीयू 25 और बीजेपी 15 सीटों पर लड़ती थी. लेकिन बीजेपी 2014 की याद दिला रही है जहां नीतीश को केवल दो सीटों पर जीत मिली थीं. जबकि बीजेपी ने रामविलास पासवान और उपेंद्र कुशवाह के साथ 31 सीटें जीती थीं. बीजेपी सिटिंग-गेटिंग की बात करती है. नीतीश इसके लिए तैयार नहीं हैं. उनकी पार्टी चाह रही है कि सीटों के बंटवारे पर अभी बात हो जाए. जेडीयू महासचिव संजय सिंह कह चुके हैं कि बिना नीतीश बीजेपी 2019 नहीं जीत सकती.


कुछ दिनों पहले इस बात पर बयानबाजी हुई थी कि बिहार में नेता कौन है. जेडीयू कहती है चाहे दिल्ली में मोदी हों लेकिन बिहार में तो नीतीश ही नेता हैं. सुशील मोदी ने बीच-बचाव कर कहा कि नीतीश और मोदी दोनों ही नेता हैं. इस बीच, खबर आई कि कांग्रेस चाहती है कि नीतीश फिर महागठबंधन में वापस आ जाएं. लेकिन तेजस्वी इसके लिए तैयार नहीं हैं. कल यह खबर आने के बाद कि लालू को नीतीश ने फोन किया, तेजस्वी ने दो ट्वीट किए. पहले में उन्होंने पूछा कि यह फोन करने में चार महीने क्यों लगे और दूसरा यह कि महागठबंधन के दरवाजे नीतीश के लिए बंद हैं. पर कांग्रेस नीतीश को दिल्ली और तेजस्वी को बिहार में रहने का सुझाव दे रही है. जाहिर है इसके लिए न नीतीश तैयार होंगे और न ही तेजस्वी.

उधर, गठबंधन पर खतरे को भांप कर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह हरकत में आए हैं. वे 11 जुलाई को पटना जाएंगे. उनकी नीतीश कुमार से मुलाकात होगी. इसमें 2019 के लिए सीटों के बंटवारे पर भी चर्चा होगी. लेकिन इससे पहले सात और आठ जुलाई को दिल्ली में जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक है. 2013 में जब गोवा में बीजेपी ने मोदी को प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाया था तो उसके बाद नीतीश ने दिल्ली में अपनी पार्टी की कार्यकारिणी में अलग जाने का इशारा कर दिया था.

क्या इस बार भी जेडीयू कार्यकारिणी से कोई संकेत मिलेगा. वैसे एक रास्ता यह हो सकता है कि जिन सीटों पर आरजेडी जीती वे नीतीश को दे दी जाएं. कुछ सीटें बीजेपी छोड़े और कुछ पासवान और कुछ कुशवाह. लेकिन बड़ा भाई बनने का लक्ष्य लेकर चल रहे नीतीश को क्या यह मंजूर होगा. पर सवाल यह भी है महागठबंधन में वापसी कर नीतीश क्या हासिल कर लेंगे? तेजस्वी के तेवर देख कर नहीं लगता कि उन्हें नीतीश बतौर सीएम मंजूरी होंगे. तो ऐसे में नीतीश को महागठबंधन में वापस जाकर भी क्या मिल जाएगा. एक रास्ता तीसरी ताकत के रूप में अलग चुनाव लड़ना हो सकता है, लेकिन ऐसा करने से पहले क्या वे सीएम की कुर्सी गंवाना पसंद करेंगे.

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(अखिलेश शर्मा एनडीटीवी इंडिया के राजनीतिक संपादक हैं)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.



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