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पेट्रोल-डीज़ल के बढ़ते दाम- क्यों ज़ख्मों पर नमक छिड़क रही है सरकार?  

आला सरकारी सूत्रों ने एनडीटीवी से कहा कि मौजूदा समय में कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों को देखते हुए कीमतें कुछ और समय तक बढ़ी रह सकती हैं.

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पेट्रोल-डीज़ल के बढ़ते दाम- क्यों ज़ख्मों पर नमक छिड़क रही है सरकार?  
पेट्रोल डीजल की कीमतें नई ऊंचाई पर और डॉलर के मुकाबले रुपया अब तक के सबसे निचले स्तर पर. 8.2 फीसदी की जीडीपी के बीच आम लोगों से जुड़ी अर्थव्यवस्था की ये खबरें सरकार के सामने चुनौती पेश कर रही हैं, लेकिन पेट्रोल डीज़ल की कीमतों में लगी आग के बीच सरकार ने जले पर नमक छिड़कते हुए कीमतें घटाने से इनकार कर दिया है. आला सरकारी सूत्रों ने एनडीटीवी से कहा कि मौजूदा समय में कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों को देखते हुए कीमतें कुछ और समय तक बढ़ी रह सकती हैं, लेकिन सरकार उन्हें कम करने के लिए एक्साइज़ ड्यूटी में अब कोई कटौती नहीं करेगी. 

सरकार का कहना है कि अगर एक्साइज ड्यूटी में कटौती की गई तो इससे बजट घाटा बढ़ेगा और सरकार का पूरा आर्थिक हिसाब-किताब गड़बड़ा जाएगा. इस बीच, तेल की बढ़ी कीमतों पर राजनीतिक तूफान तेज होता जा रहा है. जनता हो या नेता हर कोई यही पूछ रहा है कि तेल की कीमतें कम क्यों नहीं हो रहीं? मोटे तौर पर यही लगता है कि तेल की कीमतों में लगी आग को कम करने के दो ही तरीके हैं. या तो केंद्र सरकार इस पर लगने वाले टैक्स को कम करें या फिर राज्य सरकारें. लेकिन केंद्र सरकार ने टैक्स कम करना तो दूर बढ़ाया ही है. नवंबर 2014 से लेकर जनवरी 2016 के बीच केंद्र सरकार ने 9 बार एक्साइज ड्यूटी बढाई और सिर्फ एक बार कम की. बजट में बाजीगरी की गई. दो रुपए बेसिक एक्साइज ड्यूटी में और 6 रुपए अतिरिक्त एक्साइज ड्यूटी में घटा कर 8 रुपए प्रति लीटर का फायदा दिया, लेकिन उसी वक्त 8 रुपए प्रति लीटर का रोड सेस लगा कर यह सुनिश्चित कर दिया कि पेट्रोल डीजल के दाम में कोई बदलाव न हो. जब केंद्र एक्साइज ड्यूटी कम करने में आगे नहीं आती तो राज्य क्यों आगे आएं? यही वजह है कि राज्य सरकारें बड़ी आसानी से पेट्रोल डीजल के बढ़े दामों का ठीकरा केंद्र पर फोड़कर निश्चिंत हो जाती हैं.

राज्य सरकारें टैक्स घटाना नहीं चाहती हैं. ये अलग बात है कि सियासत के हिसाब से राज्य सरकारों का रुख भी बदलता रहता है. जब केंद्र में यूपीए की सरकारें थीं तब कुछ बीजेपी शासित राज्यों में टैक्स कम कर केंद्र पर दबाव बनाने की कोशिश की गई. अब अधिकांश राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं, लेकिन वे टैक्स कम करने के लिए तैयार नहीं हैं. पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम ने इसे लेकर बीजेपी पर निशाना भी साधा है. चिदंबरम ने सरकार से पूछा है कि वो पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी के तहत क्यों नहीं ला रही? उन्होंने एक ट्वीट कर कहा कि बीजेपी कहती आई है कि वो 19 राज्यों में शासन कर रही है. ऐसे में केंद्र और राज्यों को मिल कर काम करना चाहिए. कांग्रेस की यह मांग है कि पेट्रोल और डीजल को तुरंत जीएसटी के तहत लाया जाए.

लेकिन बिहार के उपमुख्यमंत्री और जीएसटी परिषद के सदस्य सुशील मोदी कह चुके हैं कि यह फिलहाल संभव नहीं है. ऐसा तभी हो पाएगा जब हर महीने एक लाख करोड़ रुपए के राजस्व का लक्ष्य पूरा हो. वैसे अभी कई बीजेपी शासित राज्यों जैसे महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और गुजरात में पेट्रोलियम पदार्थों पर टैक्स सबसे ज्यादा है. विपक्ष के शासन वाले आंध्र प्रदेश, पंजाब और तेलंगाना में अधिक दर पर टैक्स है. राज्य सरकारें इन्हें छूना नहीं चाहतीं, क्योंकि ये उनके लिए कमाई का सबसे बड़ा ज़रिया है. पिछले साल कें सरकार ने पेट्रोलियम पदार्थों पर टैक्स से 3.43 लाख करोड़ रुपए कमाए, जबकि राज्यों ने 2.09 लाख करोड़ रुपए. 2014-15 की तुलना में राज्यों के राजस्व में तीस फीसदी की और केंद्र की करीब 100 फीसदी की बढोत्तरी हुई है.

बीजेपी प्रवक्ता नलिन कोहली कहते हैं कि दाम बढ़ने का कारण है विदेश की स्थिति क्योंकि आपूर्ति घट रही है. वेनेजुएला, ईरान जैसे देशों में आपूर्ति को लेकर कुछ दिक्कतें हैं. डॉलर मजबूत हो रहा है और रुपया उसके सामने गिर रहा है. इन सबसे यह फर्क पड़ता है. साथ-साथ यह भी मन में रखने की आवश्यकता है कि राज्यों में भी जब पैसे बढ़े हैं तो उनकी भी वैट लगता है, सेल्स टैक्स  लगता है. हर बार उनके टैक्स में वृद्धि होती है. यह तो हुई सियासतदानों की बात. अब बात करते हैं इस फील्ड के जानकारों की. आपको याद होगा कि किसी जमाने में पेट्रोल डीजल के दाम सरकारें हर पंद्रह दिन में तय करती थी, लेकिन अब दाम हर दिन बदलते हैं. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि आठ साल पहले किरीट पारिख समिति ने पेट्रोल और डीजल के दामों को विनियंत्रित करने की सिफारिश की थी. आज किरीट पारिख को लगता है कि पेट्रोलियिम पदार्थों पर एक्साइज ड्यूटी कम की जा सकती है. उनकी दलील है कि आज अर्थव्यवस्था 8.2 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही है. जीएसटी कलेक्शन भी बढ़ रहा है. ऐसे में सरकार अपने मुनाफे का कुछ हिस्सा एक्साइज ड्यूटी में कटौती कर आम लोगों को राहत देने में कर सकती है.

किरीट पारिख कहते हैं कि अगर केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी दो से तीन रुपए प्रति लीटर घटाती है और राज्य सरकारें वैट में पांच फीसदी तक की कमी करती हैं तो देश में पेट्रोल और डीज़ल के दाम में पांच रुपए प्रति लीटर तक की कमी आ सकती है. लेकिन सवाल उठता है कि सरकारें ऐसा क्यों नहीं कर रही हैं? आला सरकारी सूत्र बजट घाटे की जिक्र करते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि जिस तरह से तमाम कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर मोदी सरकार ने खजाने के दरवाजे खोले हैं, उसके लिए फिलहाल चुनावी साल में अपने राजस्व में कटौती कर पाना संभव नहीं है. लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या चुनावी साल में बीजेपी को पेट्रोल और डीजल के बढ़े दामों से जूझते मध्य वर्ग की नाराजगी का डर नहीं सता रहा? और अगर हां, तो वो कब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों में कमी का इंतजार करेगी? या फिर एक्साइज ड्यूटी में कटौती कर जख्मों पर नमक छिड़कने के बजाए कोई राहत देगी ताकि उसे चुनाव में खमियाजा न भुगतना पड़े.

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(अखिलेश शर्मा NDTV इंडिया के राजनीतिक संपादक हैं)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.


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