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अखिलेश शर्मा की कलम से : बीजेपी क्यों नहीं चाहती कांग्रेसमुक्त दिल्ली...?

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नई दिल्ली : कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के मंगलवार को दिल्ली में हुए रोड शो पर बीजेपी की नज़रें खासतौर से लगीं थीं। राहुल का रोड शो कालकाजी में हुआ, और यह सीट पिछले चुनाव में बीजेपी-अकाली दल गठबंधन ने जीती थी। राहुल के रोड शो में झुग्गी-झोंपड़ियों से बड़ी संख्या में लोग निकलकर बाहर आए। खुद बीजेपी के नेता दावा कर रहे हैं कि राहुल के रोड शो में भारी भीड़ दिखाई दी। वे चाहते हैं कि राहुल के रोड शो में भीड़ उमड़ने का यह सिलसिला बरकरार रहे, लेकिन सिर्फ झुग्गी-झोंपड़ी और मुस्लिम-बहुल इलाकों में और यह कांग्रेस के लिए वोटों में भी तब्दील हो।

यह वही बीजेपी है, जिसने 'कांग्रेसमुक्त भारत' का नारा दिया है, लेकिन दिल्ली में आकर यह नारा रुक गया है। ठीक वैसे ही, vजैसे जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव में बीजेपी मना रही थी कि कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस का घाटी में प्रदर्शन अधिक खराब न हो, ताकि पीडीपी घाटी की अधिकांश सीटें जीतने में कामयाब न हो सके। वहां ऐसा ही हुआ और अब हालात ऐसे हैं कि बिना बीजेपी के वहां सरकार नहीं बन सकती। पार्टी की कोशिश कश्मीर की इसी रणनीति को कुछ हद तक दिल्ली में आज़माने की भी है।

वजह बिल्कुल साफ है। बीजेपी को लग रहा है कि वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में जो तबका आम आदमी पार्टी के साथ चला गया था, उसमें अब सेंध लग चुकी है। लोकसभा चुनाव में मोदी लहर थी, जिसके सहारे बीजेपी उच्च-मध्यम वर्ग और अन्य मध्यम वर्ग को अपने साथ लाने में कामयाब रही। दिल्ली के ग्रामीण इलाकों में उसका असर बरकरार रहा, लेकिन गरीब, दलित, निम्न-मध्यम वर्ग और मुस्लिम वोट मजबूती के साथ आम आदमी पार्टी के साथ खड़ा है। यह वही बीजेपी-विरोधी वोट है, जो परंपरागत रूप से कांग्रेस का साथ देता आया है, लेकिन अब वह कांग्रेस का विकल्प तलाश रहा है और 'आप' (आम आदमी पार्टी) के साथ खड़ा हो गया है।

बीजेपी के रणनीतिकारों को इस बात की चिंता है कि दिल्ली में कांग्रेस का वोट प्रतिशत लगातार कम हो रहा है, क्योंकि यह 'आप' की ओर खिसक रहा है। वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 25 फीसदी वोट मिला, जो सिर्फ पांच महीनों में घटकर 15 फीसदी रह गया। कांग्रेस के घटे 10 फीसदी वोटों का एक बड़ा हिस्सा 'आप' को गया। दिल्ली की सातों सीटें हारने के बावजूद 'आप' को 33 फीसदी वोट मिले, जो वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव से तीन फीसदी ज्यादा हैं। बीजेपी का वोट भी 33 से बढ़कर 47 फीसदी पहुंच गया, लेकिन लोकसभा चुनाव में लड़ाई सिर्फ दो पार्टियों बीजेपी और 'आप' में नज़र आ रही थी, जिसका फायदा 'आप' को भी मिला।

दो पार्टियों के बीच वोटों का ध्रुवीकरण अगर विधानसभा चुनाव में भी होता है और कांग्रेस के वोट और अधिक गिरकर 10 फीसदी से भी नीचे पहुंच जाते हैं, तो न सिर्फ दिल्ली में त्रिशंकु विधानसभा बनेगी, बल्कि 'आप' सबसे बड़ी पार्टी के रूप में भी उभर सकती है, जबकि कांग्रेस के वोट 15 फीसदी के आसपास बने रहने पर बीजेपी बहुमत का आंकड़ा पार कर सकती है। बीजेपी इसी वजह से बहुजन समाज पार्टी नेता मायावती की सभाओं की भी उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रही है।

7 फरवरी को होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए कई ओपिनियन पोल आए हैं, और सभी इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि बीजेपी लोकसभा चुनाव में बनी अपनी बढ़त को बरकरार नहीं रख पा रही है। मोदी के नाम पर मिली वोटों की बंपर फसल अब धीरे-धीरे कम हो रही है, हालांकि बीजेपी को अब भी 36 से 38 फीसदी वोट मिलने की संभावना जताई जा रही है। अगर ऐसा ही होता है तो वह बहुमत का आंकड़ा छू सकती है। दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी के वोट प्रतिशत में इजाफा हो रहा है। इशारा यह भी मिल रहा है कि कांग्रेस के वोट प्रतिशत में भी बढ़ोतरी हो रही है, जिसकी अपनी राजनीतिक वजह हैं।

कांग्रेस बहुत आक्रामक अंदाज़ में दिल्ली का चुनाव लड़ रही है। होर्डिंग-पोस्टर-बैनर की लड़ाई में वह बीजेपी और 'आप' को बराबरी की टक्कर दे रही है। उसने अजय माकन का चेहरा सामने रखा है, जो न सिर्फ प्रशासनिक रूप से अनुभवी हैं, बल्कि उनकी छवि भी साफ-सुथरी मानी जाती है। राहुल गांधी और सोनिया गांधी को भी दिल्ली के चुनाव मैदान में उतारा गया है। हालांकि कार्यकर्ता मानकर चल रहे हैं कि पार्टी को तीसरे नंबर पर आना है, इसलिए उनमें कोई जोश नहीं है।

परन्तु बीजेपी इसी उम्मीद में है कि कांग्रेस से छिटका उसका परम्परागत वोट इस बार उसके साथ चाहे कुछ संख्या में ही सही, लेकिन वापस आए, ताकि उन वोटों का आम आदमी पार्टी के पक्ष में ध्रुवीकरण रुक सके। वैसे आसार कम ही दिखते हैं कि बीजेपी की यह उम्मीद पूरी हो सके।

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