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राज्यसभा उपसभापति पद के लिए उम्मीदवारी पर विपक्षी एकता की निकली हवा

विपक्षी पार्टियों को एकजुट करने का मंसूबा बांध रही कांग्रेस के पास ज्यादा विकल्प नहीं बचे, संभावना है कि चुनाव में कांग्रेस अब अपना ही उम्मीदवार खड़ा करे

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राज्यसभा उपसभापति पद के लिए उम्मीदवारी पर विपक्षी एकता की निकली हवा
राज्यसभा में विपक्षी एकता तारतार हो गई. उप सभापति पद के लिए संयुक्त विपक्ष का उम्मीदवार खड़ा करने की रणनीति औंधे मुंह गिर गई. एक दिन पहले ही लोक लेखा समिति में दिखी विपक्षी एकता चौबीस घंटे भी नहीं टिकी और एनडीए के उम्मीदवार हरिबंश को चित करने के मंसूबे धराशाई हो गए. कम से कम एनसीपी के रुख से तो ऐसा ही लगता है क्योंकि उसने अपनी उम्मीदवार वंदना चव्हाण को मैदान में उतारने से पहले ही उनका नाम वापस ले लिया. ऐसा बीजू जनता दल और शिवसेना के रुख के बाद किया गया.

दरअसल, एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने बीजेडी प्रमुख और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से बात कर उनसे चव्हाण के समर्थन की अपील की. लेकिन जेडीयू प्रमुख और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पटनायक से पहले ही बात कर चुके थे, लेकिन बीजेडी के रुख पर अब भी असमंजस बना हुआ है. बीजेडी नेता जेडीयू को यह याद दिलाने से नहीं चूक रहे कि कैसे राष्ट्रपति चुनाव में नीतीश कुमार ने नवीन पटनायक की अपील को दरकिनार कर दिया था. दरअसल, बीजेडी ने पी ए संगमा को समर्थन दिया था लेकिन नीतीश ने एनडीए का हिस्सा होने के बावजूद प्रणब मुखर्जी का साथ दिया था. नवीन के मन में यह कसक अब भी है. 

उधर, शिवसेना भी अविश्वास प्रस्ताव की तरह आखिरी मौके तक ना-नुकर करने के मूड में है. हालांकि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और नीतीश कुमार दोनों ने उद्धव ठाकरे से समर्थन मांगा है. उपसभापति के चुनाव में बीजेपी को आंखें दिखा रहे अकाली दल ने भी नीतीश से दोस्ती का सम्मान रखा. जेडीयू नेता याद दिलाने से नहीं चूके कि किस तरह 350वें प्रकाश पर्व पर पटना में नीतीश सरकार ने आयोजन को कामयाब बनाने में पूरी जान लगा दी थी. पुरानी दोस्ती का हवाला भी दिया गया.

अब ऐसे में विपक्षी पार्टियों को एकजुट करने का मंसूबा बांध रही कांग्रेस के पास ज्यादा विकल्प नहीं बचे हैं. संभावना है कि गुरुवार के चुनाव में कांग्रेस अब अपना ही उम्मीदवार खड़ा करे. पर लगता है यह मुकाबला अब सांकेतिक ही रहेगा.

एक बार अंक गणित पर नज़र डाल लेते हैं. राज्यसभा में कुल संख्या 245 है और अभी 244 सदस्य हैं. बहुमत का आंकड़ा 123 का है. एनडीए के पास शिवसेना और अकाली दल को मिलाकर 95 सदस्य हैं. अगर एआईएडीएमके, बीजेडी, टीआरएस और अन्य साथ दें तो यह आंकड़ा 124 तक पहुंच जाता है. जबकि कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए के 61 सांसद हैं. सपा, बसपा, टीएमसी जैसी अन्य पार्टियों के समर्थन से यह आंकड़ा 118 रहता है. इस लिहाज से हरिबंश की जीत तय दिखती है. लेकिन पीडीपी ने मतदान में हिस्सा न लेने का फैसला किया है. अगर एनडीए में फूट पड़ती है और शिवसेना और अकाली दल मतदान से दूर रहते हैं तो एनडीए के लिए दिक्कत हो जाएगी. तब सदन की संख्या घटकर 236 रह जाएगी और बहुमत का आंकड़ा 119 होगा. एनडीए और यूपीए दोनों को 118-118 मिल सकते हैं और ऐसे में मुकाबला बेहद दिलचस्प और कठिन हो जाएगा. लेकिन फिलहाल इसकी संभावना कम ही है.

तो पहले अविश्वास प्रस्ताव और अब उपसभापति का चुनाव, क्या विपक्ष ने समय से पहले अपने पत्ते खोलकर विपक्षी एकता के मिथक को तोड़ने का काम किया है? क्या आने वाले चुनावों के मद्देनज़र विपक्ष में पड़ी यह फूट बीजेपी के लिए फायदेमंद होगी? साथ ही अकाली दल और शिवसेना के रुख से क्या एनडीए में बिखराव के संकेत भी नहीं मिलने लगे हैं? ये सारे ऐसे सवाल हैं जिन्हें लेकर बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही परेशान होंगी. इन्हीं सवालों के जवाबों में मिशन 2019 की दिशा और दशा छिपी है.

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(अखिलेश शर्मा NDTV इंडिया के राजनीतिक संपादक हैं)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.



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