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कहीं BJP को झुलसा न दे पेट्रोल-डीजल की कीमतों की आग

दिल्ली में पिछले 9 दिनों में पेट्रोल के दाम 2.24 रुपये और डीजल के दाम 2.15 रुपये बढ़ा दिए गए. इस तरह 14 सितंबर 2013 का रिकॉर्ड टूट गया.

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कहीं BJP को झुलसा न दे पेट्रोल-डीजल की कीमतों की आग
ऐसा क्यों होता है कि जब देश के किसी भी हिस्से में चुनाव होता है तो पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ते, लेकिन चुनाव खत्म होते ही दाम बढ़ने लगते हैं. कर्नाटक में चुनावों के दौरान 19 दिनों तक पूरे देश में पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर रहे. लेकिन वोटिंग पूरी होते ही पिछले 9 दिनों से हर दिन पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ रहे हैं. कहने को तेल कीमतों को सरकार के नियंत्रण से बाहर कर दिया गया है और अब तेल कंपनियां हर रोज तेल के दाम तय करती हैं, लेकिन साफ है कि यह कदम सिर्फ दिखावे का है क्योंकि चुनावों के वक्त दाम नहीं बढ़ता और चुनाव के बाद बढ़ जाता है.

दिल्ली में पिछले 9 दिनों में पेट्रोल के दाम 2.24 रुपये और डीजल के दाम 2.15 रुपये बढ़ा दिए गए. इस तरह 14 सितंबर 2013 का रिकॉर्ड टूट गया. तब जब दाम बढ़ते थे तब सड़कों पर क्या होता था? बीजेपी नेता तब साइकल चलाकर पेट्रोल डीजल का दाम बढ़ने का विरोध जताते थे. अब ये मंत्री हैं और राहुल विपक्ष में इसलिए साइकल चलाने की बारी उनकी है.

तब बीजेपी कहती थी कि यूपीए सरकार की तेल कंपनियों से सांठ-गांठ है. पर अब उसी बीजेपी को तेल की बढ़ी कीमतों के सवाल चुभते हैं और वो सरकार के खिलाफ एजेंडे का हिस्सा लगते हैं. कल बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने तेल कीमतों के सवाल को एजेंडा करार दिया था. हालांकि आज अमित शाह ने फिर प्रेस कांफ्रेंस की. इसमें वे तेल की बढ़ी कीमतों पर खुल कर बोले. उन्होंने कहा कि पेट्रोल की बढ़ी कीमतों को सरकार गंभीरता से ले रही है. कल पेट्रोलियम मंत्री बैठक करेंगे. तीन-चार दिन में ठीक हो जाएगा.

वैसे बीजेपी के पुराने नेता याद दिलाते हैं कि कैसे 2004 में 'इंडिया शाइनिंग' का नारा उसे ले डूबा था. तब बेंगलुरु को छोड़कर देश के सभी बड़े शहरों से बीजेपी साफ हो गई थी. देश के मिडिल क्लास ने बीजेपी से  बदला लिया. अब बढ़ी महंगाई, टैक्स का बोझ और बेरोजगारी मिडिल क्लास को तंग कर रही है. तो एक बार फिर बीजेपी नेताओं को 2004 याद आ रहा है.

2014 में मोदी सरकार बनने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बेहद कम थे तब भी सरकार ने दाम नहीं घटाए. 9 बार एक्साइज ड्यूटी बढ़ाई. कहा कि आगे कभी बढ़ेंगे तो घटाने में आसानी होगी. पर अब जब कच्चे तेल के दाम बढ़ रहे हैं, सरकार यहां भी दाम बढ़ा रही है. अब पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने दखल दिया है. वे सभी तेल कंपनियों के अध्यक्षों से कल मिलेंगे. संभावना है कि तेल के दामों में कुछ कमी आए. लेकिन हकीकत यह है कि केंद्र सरकार के हाथ बंधे हैं.

आपको बता दूं कि आप एक लीटर पेट्रोल का जो दाम चुकाते हैं उसका चालीस फीसदी सिर्फ टैक्स है जो केंद्र और राज्य सरकारों के बीच आपस में बंटता है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, रुपये का गिरता मूल्य और ओपेक द्वारा तेल आपूर्ति में कटौती की वजह से संभावना है कि आने वाले दिनों में दाम और बढ़ें. पिछले साल अक्टूबर में पहली बार केंद्र ने एक्साइज में कटौती की थी.

इसके बाद बीजेपी और उसके सहयोगी दलों के शासन वाले 20 राज्यों में से सिर्फ चार राज्यों महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में वैट में कटौती की गई थी. केंद्र अब भी यही कहता है कि राज्यों को वैट कम करना चाहिए, लेकिन दिलचस्प बात है कि बीजेपी शासित राज्यों जैसे महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, असम, राजस्थान में पेट्रोल पर अब भी 30 फीसदी से अधिक वैट है. इसी तरह बीजेपी के शासन वाले असम, छत्तीसगढ़, गुजरात, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान में डीजल बीस फीसदी से अधिक टैक्स है. अगर महाराष्ट्र की ही बात करें तो बीजेपी नेता मजबूरी बताते हैं कि किसानों के कर्ज माफ करने के लिए जो तीस हजार करोड़ रुपये दिया गया, उसकी भरपाई तो इसी से करनी होगी. जब भी पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ते हैं तो राज्यों का खजाना भरता है, जबकि केंद्र को नुकसान होता है.

राज्य अपने कर कम करने को तैयार नहीं हैं. एक लीटर पेट्रोल पर केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी फिक्स है. यह है 14 रुपए 78 पैसे. लेकिन कई राज्यों में टैक्स की दर इससे भी ज्यादा हो गई है. जैसे पश्चिम बंगाल में राज्य का टैक्स बढ़ कर 16 रुपये 8 पैसे हो गया है, लेकिन ममता बनर्जी इसे कम करने की बात नहीं करतीं. हैदराबाद में यह 19 रुपए 83 पैसे है. गोवा में सबसे कम है. राज्य पेट्रोल-डीज़ल को जीएसटी मे रखने को भी तैयार नहीं, क्योंकि इससे उन्हें घाटा उठाना पड़ सकता है.

कुल मिला कर एक जमाने में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर जमकर राजनीति करने वाली बीजेपी खुद सवालों के घेरे में है. चूंकि कीमतें हर रोज बदलती हैं इसलिए इन पर ज़्यादा ध्यान नहीं जाता, लेकिन जब कीमतें सिर्फ बढ़ें और घटे न, तो सवाल उठना लाजमी है. बीजेपी को इस बात की परेशानी है कि कहीं उसे 2019 में इसकी राजनीतिक कीमत न चुकानी पड़ जाए.

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(अखिलेश शर्मा एनडीटीवी इंडिया के राजनीतिक संपादक हैं)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.


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