अखिलेश शर्मा की कलम से : अमित शाह की अगुवाई में नई और 'तेज़ रफ्तार' बीजेपी

अखिलेश शर्मा की कलम से : अमित शाह की अगुवाई में नई और 'तेज़ रफ्तार' बीजेपी

फाइल चित्र

नई दिल्ली:

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में 9 अगस्त को बीजेपी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में अपने अध्यक्षीय भाषण के दौरान पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों को लेकर पार्टी की रणनीति का संकेत दे दिया था, लेकिन तब अधिकांश राजनीतिक विश्लेषक इसे पकड़ पाने में नाकाम रहे। अगर शिवसेना तब शाह के शब्दों को गौर से सुन रही होती तो शायद वह सीटों के बंटवारे को लेकर बीजेपी के साथ न इस तरह उलझी होती और न गठबंधन टूटने की नौबत आती।

अमित शाह ने अपने भाषण में चार राज्यों के विधानसभा चुनावों के संदर्भ में कहा था कि इन सभी राज्यों में सरकार बनाने का बीड़ा पार्टी को उठाना होगा, और शाह सिर्फ यहीं नहीं रुके थे। उन्होंने 'सुराज्य' देने के बारे में भी एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही थी। उन्होंने कहा था, "बीजेपी कार्यकर्ता के नाते सभी देशवासियों को सुराज्य देना हमारा परम कर्तव्य है... मगर इस कर्तव्य का पालन तभी हो पाएगा, जब कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कोहिमा तक हर प्रदेश में बीजेपी या बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकारें होंगी..."

अब ज़रा इन शब्दों पर गौर फरमाएं। अमित शाह साफ कह रहे थे कि या तो बीजेपी की खुद की सरकार हो या फिर बीजेपी की अगुवाई वाली। यानि, अगर गठबंधन की सरकार भी बनी तो उसकी अगुवाई बीजेपी ही करेगी। यह केंद्र में अपने बूते पर बहुमत हासिल करने वाली पार्टी के अध्यक्ष द्वारा अपने कार्यकर्ताओं के लिए एक बड़ा लक्ष्य तय करना था। वह साफ कह रहे थे कि केंद्र में सबसे बड़ी पार्टी अब राज्यों में छोटे और क्षेत्रीय दलों की पिछलग्गू नहीं बनी रहेगी। वह अपनी ताकत के हिसाब से हक मांगेगी। एक जाति, क्षेत्र, भाषा या धर्म की राजनीति करने वाली, वंशवाद पर चलने वाली क्षेत्रीय पार्टियों के सामने बीजेपी अब नए अवतार में आएगी।

...और ऐसा ही हुआ... महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव में अपने हिस्से को कम कर शिवसेना और सहयोगी दलों को ज्यादा सीटें देने वाली बीजेपी ने शिवसेना को इस बार याद दिलाया कि राज्य में उसका आधार मजबूत हुआ है। लंबी बातचीत के बाद आखिरकार बीजेपी ने शिवसेना के सामने 147-127-14 का फॉर्मूला रखा। गौरतलब है कि बीजेपी ने पिछले विधानसभा चुनाव में 119 सीटों पर चुनाव लड़ा था, सो, पार्टी सिर्फ आठ सीटें अधिक चाहती थी और वह यह भी चाहती थी कि शिवसेना सहयोगी दलों को अपने कोटे से 14 सीटें दे। ठीक वैसे ही, जैसे बीजेपी ने लोकसभा चुनाव में सीटों का अपना हिस्सा कम किया, लेकिन उद्धव ठाकरे 151 से नीचे जाने के लिए किसी सूरत में तैयार नहीं हुए।

यानि, यह कहा जा सकता है कि चार सीटों के लिए शिवसेना और आठ सीटों के लिए बीजेपी ने यह गठबंधन तोड़ दिया। मगर असली पेंच मुख्यमंत्री पद को लेकर ही रहा, क्योंकि शिवसेना को लगता था कि कम सीटों पर लड़ने के बावजूद बीजेपी उससे ज्यादा सीटें जीतकर मुख्यमंत्री पद पर दावेदारी कर सकती है।

हरियाणा की कहानी तो और भी दिलचस्प है। गैर-जाट वोटों की किलेबंदी करने के लिए बीजेपी ने कुछ साल पहले कुलदीप बिश्नोई के साथ विचित्र समझौता किया था। सिर्फ एक सांसद वाली एक छोटी क्षेत्रीय पार्टी के साथ लोकसभा-विधानसभा चुनाव के काफी पहले ही समझौता हो गया कि लोकसभा में बीजेपी आठ और हरियाणा जनहित कांग्रेस दो सीटों पर लड़ेगी, जबकि विधानसभा में दोनों 45-45 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी और ढाई-ढाई साल के लिए दोनों पार्टियों का मुख्यमंत्री रहेगा। तब भी कई लोगों को लगा कि बीजेपी ने बिश्नोई को उनकी ताकत से ज्यादा दे दिया, लेकिन लोकसभा चुनाव में आए नतीजों ने इसकी पुष्टि की, जब बीजेपी ने आठ में से सात सीटें जीत लीं, मगर मोदी लहर के बावजूद बिश्नोई की पार्टी दोनों सीटें हार गई।

इसके बावजूद बीजेपी ने गैर-जाट वोटों के बिखराव को रोकने के लिए बिश्नोई के सामने 20 विधानसभा सीटों की पेशकश की। पार्टी ने यह भी कहा कि उपमुख्यमंत्री का पद हरियाणा जनहित कांग्रेस को दिया जा सकता है, लेकिन बिश्नोई इसके लिए तैयार नहीं हुए। नतीजे तो रविवार को आएंगे, मगर एक्ज़िट पोल बिश्नोई की पार्टी को लेकर बहुत अच्छी तस्वीर नहीं दे रहे हैं। उन्हें शून्य से लेकर पांच सीटें मिलने की संभावना जताई जा रही है। यानि, जो पार्टी अपने बूते पर हरियाणा में पांच सीट भी नहीं पा रही है, उसे पता नहीं क्या सोचकर 45 सीटें देने का करार कर लिया गया था।

यही अमित शाह की बीजेपी है। उत्तराखंड, बिहार और उसके बाद उत्तर प्रदेश के उपचुनावों में हुई हार को भुलाकर हरियाणा और महाराष्ट्र के नतीजों का इंतज़ार कर रही इस बीजेपी को भरोसा है कि रविवार के बाद से इस नई बीजेपी की रफ्तार और तेज होगी। यह जरूर है कि पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, ओडिशा जैसे राज्यों में शायद बीजेपी या बीजेपी के नेतृत्व की सरकार बनाने का उनका लक्ष्य असंभव लगता है, मगर हरियाणा और महाराष्ट्र में अगर बीजेपी अपने बूते सरकार बनाने में कामयाब होती है तो झारखंड और जम्मू-कश्मीर के चुनावों में पार्टी नए हौसले के साथ मैदान में उतरेगी। और बाद में होने वाले बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के लिए उसे नई ऊर्जा और ताकत मिलेगी। पार्टी का लक्ष्य 'कांग्रेसमुक्त राज्यसभा' है। सरल भाषा में कहें तो वह चाहती है कि राज्यसभा में उसे खुद बहुमत मिले, ताकि अगले लोकसभा चुनाव से पहले अपने हिसाब से संसद में कानून बनवा सके। इसके लिए भी राज्यों की लड़ाई जीतना उसके लिए जरूरी है, और अमित शाह इसी दिशा में काम कर रहे हैं।

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