बीजेपी की जीत में छिपे हैं कई संदेश, पार्टी को मिला नया रणनीतिकार

बीजेपी की जीत में छिपे हैं कई संदेश, पार्टी को मिला नया रणनीतिकार

बीजेपी नेता राम माधव (फाइल फोटो)

नई दिल्ली:

बीजेपी मुख्यालय पर आज जमकर जश्न मनाया गया। पिछले पूरे साल यहां ढोल-नगाड़े ख़ामोश रहे और पटाखों को दियासलाई दिखाने की नौबत नहीं आई। दिल्ली-बिहार की हार और हाल ही में उत्तराखंड के दुस्साहस से मिली चोट से बुझे चेहरों पर आज ज़बर्दस्त चमक दिखी। मोदी सरकार के दो साल का जश्न भी इसमें शामिल हो गया।

बीजेपी के लिए असम की जीत बहुत बड़ी है। आरएसएस के पुराने स्वयंसेवक और बीजेपी के कई नेताओं ने अपना पूरा जीवन उत्तर-पूर्व के राज्यों में आरएसएस और बीजेपी के संगठन को खड़ा करने में लगा दिया। वहां असम जैसे बड़े राज्य में अपनी सरकार उनका एक बड़ा सपना था, जो आखिरकार पूरा हुआ।

असम की जीत में बीजेपी के लिए कई संदेश हैं। पहला तो यह है कि स्थानीय स्तर के नेताओं को ज्यादा अहमियत देनी होगी। लोकसभा चुनाव में मोदी लहर का फायदा पार्टी ने महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर में उठाया। वहां पीएम मोदी का चेहरा ही सामने रखा गया। मगर दिल्ली और बिहार में ये आक्रामक रणनीति चारों खाने चित हो गई। बिहार में जगह-जगह लगाया गया मोदी के साथ शाह का चेहरा स्थानीय लोगो ने ख़ारिज कर दिया। असम में बीजेपी ने ये गलती नहीं की और सर्वानंद सोनोवाल को अपना चेहरा बनाया, जिसका फायदा मिला।

दूसरा संदेश है प्रचार की शैली का। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने के जैसे बयान शाह ने बिहार में दिए, असम में ऐसे बयानों से बचते रहे। वहां बीजेपी को न गाय याद आई और न ही राम मंदिर। बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ बयानबाज़ी हुई मगर ये ध्यान रखा गया कि ध्रुवीकरण न हो सके। बीजेपी बांग्लादेशी मुस्लिमों को भारतीय मुस्लिमों से अलग कर दिखाती रही। सोनोवाल और कांग्रेस से लाए गए हेमंत बिस्व सरमा बार-बार कहते रहे कि असम का सेक्यूलर मिज़ाज है और यहां ऐसे मुद्दों का जगह नहीं। प्रधानमंत्री मोदी और शाह की बिहार की तरह अंधाधुंध रैलियां करने के बजाए सोनोवाल और सरमा को प्रचार में आगे रखा गया।

गठबंधन को लेकर बीजेपी ने लचीला रुख़ अपनाया मगर सहयोगियों की मांगों के सामने अडिग रही। पार्टी को इसका फायदा मिला। बीपीएफ और एजीपी से तालमेल कर बीजेपी ने कांग्रेस के खिलाफ बड़ा गठबंधन तैयार कर लिया। कांग्रेस ने एआईयूडीएफ से गठबंधन नहीं कर बीजेपी को एक बड़ा मौका दे दिया।

इस जीत ने बीजेपी को एक बड़ा रणनीतिकार भी दे दिया है। जम्मू-कश्मीर में पार्टी की जीत में बड़ी भूमिका निभाने वाले पार्टी महासचिव राम माधव असम जीत के एक बड़े नायक के तौर पर उभरे हैं। पीडीपी के साथ साझा एजेंडे पर कई दिनों की मशक़्क़त से उन्होंने खुद को एक मंझे हुए वार्ताकार के तौर पर स्थापित किया। मुफ़्ती मोहम्मद सईद के निधन से बाद महबूबा के दबाव में न झुकना भी उनकी राजनीतिक चतुराई का सबूत रहा। असम जैसे कठिन राज्य में पार्टी के संगठन को मज़बूत करना, अलग-अलग गुटों को साथ लेना, प्रचार के मुद्दे और उम्मीदवार तय करने तक में उन्होंने निर्णायक भूमिका निभाई।

अब बीजेपी के सामने चुनौती अगले साल के उत्तर प्रदेश चुनाव हैं। साथ ही उत्तराखंड भी जहां चुनाव समय से पहले भी हो सकते हैं। उत्तराखंड में पार्टी की विफल रणनीति से मात खाए पार्टी अध्यक्ष शाह के लिए असम की जीत मरहम का काम करेगी। मगर इस जीत के संदेश वो यूपी में अमल में लाते हैं या नहीं, ये देखना होगा। यूपी में अखिलेश यादव और मायावती के चेहरों के सामने बीजेपी का कोई नया चेहरा उतारकर सिर्फ मोदी-राजनाथ-शाह के चेहरों पर ही भरोसा करना भारी भी पड़ सकता है। असम की ही तरह यूपी में भी कई सीटों पर मुस्लिम मतदाता अहम भूमिका में हैं। ऐसे में विकास के बजाए हिंदुत्व और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की चुनावी रणनीति शायद बीजेपी को मनमाफिक नतीजे न दे सके।

असम की जीत से मोदी सरकार को भी राहत मिलेगी। ख़ासतौर से राज्यसभा में जहां सरकार का बहुमत नहीं है। ममता बनर्जी और जयललिता की जीत बीजेपी के लिए सोने पर सुहागे जैसी है, क्योंकि इन दोनों ही पार्टियों का मुख्य मुक़ाबला कांग्रेस गठबंधन से था। इस लिहाज से वह संसद में शायद ही कांग्रेस का साथ दें। 11 जून के राज्यसभा चुनाव में भी ममता और जयललिता को फायदा होगा। बीजेडी, टीएमसी और एआईएडीएमके का न्यूट्रल समूह राज्यसभा में सरकार की मुद्दों के आधार पर मदद कर सकता है। इसीलिए अब ये कयास भी लग रहा है कि मॉनसून सत्र में जीएसटी का रास्ता थोड़ा आसान हो गया है।

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(अखिलेश शर्मा एनडीटीवी इंडिया के राजनीतिक संपादक हैं।)

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