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'उड़ता नहीं, उजड़ता कहिए जनाब' फिल्‍म नहीं, समाज को चाहिए कट-एडिट..

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'उड़ता नहीं, उजड़ता कहिए जनाब' फिल्‍म नहीं, समाज को चाहिए कट-एडिट..

उड़ता पंजाब में एक्‍टर शाहिद कपूर

आज की सुबह
उस अंधेरे कमरे में दरवाजे के कोनों, चादरों की छत, दीवार में हुए झरोखों और बंद खिड़की के सिरों से छन-छन कर रोशनी आ रही थी। दरवाजा बीते दो दिनों से बाहर और अंदर, दोनों ओर से बंद था। कुंडी दोनों ही ओर बेजान सी पड़ी थी, रात को कई बार बाहर और अंदर फड़फड़ा-फड़फड़ा कर थक चुकी थी... दरवाजे के एक छोर से कुछ कागज के टुकड़े, कुछ अखबार की कतरनें और कुछ तस्‍वीरें अर्श पर सजी थीं...

जहां ये सब खत्‍म होता, वहीं एक अंधेरे कोने में मुंह में कपड़ा ठूंसे, रस्‍सी से बंधे हाथ-पैरों में करतारा दुबका था...  यकायक उसके कान में आवाजें पड़ी- करतारा, करतारा... उसने देखा उसके सामने पड़े अखबार में उसकी तस्‍वीर छपी है। मां की गोद में करतारा का सर था और बाबा के हाथ में एक बंदूक... करतारा की आंखें नम हो आईं। उसने सोचा, '' लगता है बाबा ने मुझे मार ही दिया आखिर। रोज कहते थे कि इस नशे से अच्‍छा तो मैं ही मार दूं इसे एक बार में... देखो तभी तो अखबार में छपी तस्‍वीर में बंदूक आसमान की ओर तानी हुई है... खुशी से हवा में फायरिंग कर रहे हैं। और मां... मां मुस्‍कुरा क्‍यों रही है??... क्‍या वो भी खुश है?'' इस अखबार की कतरन को करतारा ने संभाल कर रखा हुआ है, अक्‍सर वो इस कतरन को देखकर जी भरकर रो लेता है कि उसके मां-बाबा उसके मरने से खुश हैं...

करतारा को हमेशा लगता कि बाबा उसके सबसे बड़े दुश्‍मन हैं। क्‍योंकि जो चीज उसे सबसे अजीज है वही बाबा को नपसंद... करतारा का दोस्‍तों के साथ स्‍वैग मारना, मस्‍ती करना भी बाबा को पसंद नहीं। रोज चश्‍मा उतरवा कर आंखें देखते थे उसकी... जरा से डोप में जाने से उन्‍हें जाने क्‍या दिक्‍कत थी। वो क्‍या जानें, डोप के बाद लगने वाले पंख उसे कितनी ऊंची उड़ान देते थे। 10वीं में फेल होने का दुख, बचपन में हुए उत्‍पीड़न की याद, खुद बाबा की नफरत भरी डांट भी फुर्र हो जाती... बाबा को कौन समझाए कि जिसे वो उजड़ना कह रहे हैं वो असल में उड़ना है... खैर भाड़ में जाएं बाबा, अगर उसकी जरूरत पूरी नहीं कर सकते तो... और इसी वजह से दोनों के बीच बातचीत बंद...

दो दिन पहले
बाबा बेहद प्‍यार से बहला कर करतारा को एक फिल्‍म दिखाने लग गए थे। कहा था-  'इक वारी वेख लै, फैर जो तेरा जी करे करीं'। फिल्‍म का नाम था 'उड़ता पंजाब'... करतारा भी चाहता था कि बाबा उस फिल्‍म को एक बार देखें, ताकि उसके मन की बात समझ सकें और उसके रास्‍ते में आना बंद कर अपने रास्‍ते चलें... और बाबा भी कुछ यही चाहते थे कि करतारा अपने रास्‍ते चले ताकि उन्‍हें रास्‍ता दिखाने की जरूरत न पड़े... फिल्‍म देखकर जब दोनों लौटे, तो आंखों में आंसू थे। बाबा ने घर पहुंच कर करतारा को प्‍यार से अपने पास बुलाया, तो करतारा दौड़कर उसी कमरे में चला गया जहां अक्‍सर नशामुक्ति कैंप वाले उसे बंद कर जाते थे। बाबा भी नम आंखें लिए उठे और उस कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया... पर उन्‍हें नहीं मालूम था कि आज दरवाजा अंदर से भी बंद किया गया है...

आज की सुबह
करतारा-करतारा.. की आवाजें तेज होती जा रही थीं। अब कुछ और आवाजें भी इसमे जुड़ गई। मरसुटेया मैं मना कित्ता सी, कुंडी न ला। हुण जाने की हो गया अंदर... ( ये आवाजें मां की थीं और बाबा भी कुछ रुआंसे लग रहे थे।) इन आवाजों से कोने में दुबके करतारा को झटका सा लगा। उसने आंखों को जोर देकर पूरा खोला, मुंह से कपड़ा निकाला, हाथ-पैर की रस्सियों को खोला और दौड़ पड़ा दरवाजे की ओर... पर वह झटके से रुका। उसने पलट कर देखा उस अखबार की कतरन की ओर... ये क्‍या... ये कोई कतरन नहीं उसके बचपन की तस्‍वीर थी... जो मां ने उसे दी थी ये कहकर- जब भी नशे का मन करे इसे देख लेना। तस्‍वीर में वह अपने बंदूक वाले खिलौने और मां-बाबा के साथ खेल रहा था... करतारा की आंखें नम हो आई। करतारा ने दरवाजा खोला और मां-बाबा से लिपट कर जी भरकर रो लिया...

मेरा नोट...
तीन कहानी, इन कहानियों के तीन अहम किरदार और इन अहम किरदारों के तीन अहम मुद्दे- नशा, प्रशासन व्‍यवस्‍था और राजनीति। फिल्‍म के बारे में ज्‍यादा कहने का फायदा नहीं, क्‍योंकि समीक्षाएं खूब आ चुकी हैं। 'उड़ता पंजाब' को एक सामान्‍य दर्शक की नजर से देखें, तो ऐसा लगता है जैसे एक ही मुद्दे पर बनी तीन अलग-अलग डॉक्‍यूमेंटी फिल्‍मों का अंत एक साथ कर दिया गया हो। मेरे नजरिए से फिल्‍म में ऐसा कुछ भी नहीं, जिसे काटने की जरूरत है। अगर वाकई इसमें ऐसे दृश्‍य हैं, जिन्‍हें काटा जाना चाहिए तो फिर इस एडिटिंग की जरूरत इस फिल्‍म से ज्‍यादा हमारे समाज को है। नशे का जो चेहरा इस फिल्‍म में दिखा, वो जरा मेकअप लिए है। असल चेहरा इससे कहीं बुरा और भद्दा है। जिस दिन हम इस बात को समझ जाएंगे, उस दिन से उड़ता पंजाब जैसी फिल्‍मों में एडिटिंग नहीं, टैक्‍स फ्री करके, गली-गली, चौपालों पर, नुक्‍कड़ नाटक की तरह दिखाई जाएंगी....।

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अनिता शर्मा एनडीटीवी खबर में चीफ सब एडिटर हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।


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