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कोई है, भूख के ख़िलाफ.. या ये सिर्फ भाषण का हिस्सा रहेगा?

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कोई है, भूख के ख़िलाफ.. या ये सिर्फ भाषण का हिस्सा रहेगा?

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर...

जो भूखे थे
वे सोच रहे थे रोटी के बारे में
जिनके पेट भरे थे
वे भूख पर कर रहे थे बातचीत
गढ़ रहे थे सिद्धांत
ख़ोज रहे थे सूत्र...
कुछ और लोग भी थे सभा में
जिन्‍होंने ने खा लिया था आवश्यकता से अधिक खाना
और एक दूसरे से दबी जबान में
पूछ रहे थे
दवाइयों के नाम...

- कुमार विश्वबंधु

 
वो चुपचाप ऊंचे खंभे पर चढ़ गया, क्योंकि कुछ लड़कों ने उसे कहा थाली में भरपेट खाना मिलेगा, खंभे पर चढ़ जाओ... फिर वो चुपचाप खंभे से उतर गया, क्योंकि पुलिस वालों ने कहा थाली में भरपेट खाना मिलेगा खंभे से उतर जाओ. अधनंगा था वो, भूखा-प्यासा... लोग कह रह थे पागल है...

कुछ महीने पहले वाकया मुंबई के परेल इलाके में हुआ... वो परेल जहां कभी दर्जनों मिलें थीं, मज़दूर रहते थे. आज वहां एमएनसी दफ्तर, मॉल, पांच सितारा होटल हैं... लोगों को रफ्तार देने मोनोरेल बन रही है, वो पागल उसी खंभे पर चढ़ा था... रोटी खाने.

टीवी पर बहस हो रही है, तमाम स्वनामधन्य संपादक बहस कर रहे हैं.. और भी विषय ही विषय हैं सिवाय भूख के...
कोई है, भूख के ख़िलाफ?? या ये सिर्फ भाषण का हिस्सा रहेगा??

हम अपने बच्चों को पोषण से भूख से आज़ादी नहीं दिला पा रहे...
वैश्विक भूख सूचकांक में 118 देशों में भारत 97 वां स्थान पर है...

60 साल की दलील कुछ शर्तों के साथ जायज़ है, लेकिन मौजूदा सरकारें अपनी ज़िम्मेदारियों से भाग नहीं सकतीं!! इस देश में एक ही जात है, एक ही धर्म है, जिसमें पैदा होने वाला शख्स हर वक्त शोषित होता है वो है ग़रीबी!! वो ग़रीबी, जिसकी वजह से वो पागल खंभे पर चढ़ गया!!

लेकिन, भूख़ ख़बर नहीं है. भूख़ पर सवाल उठते हैं तो मजमा नहीं लगता, मंडलियां नहीं जमतीं. संपादकों को स्वाभाविक सवाल नहीं दिखता. मन परेशान है, अपनी थाली से नाराज़गी है. भूख पर सवाल होते तो मंदिर-मस्जिद नहीं होता, मंडल-कमंडल नहीं होता, सर्वण-दलितों की एक जात होती, हिन्दू-मुस्लमानों में भेद नहीं होता, पाकिस्तान में बम विस्फोट में किसी के मरने से भी हम ख़ुश नहीं होते, कोई कसाब 25,000 रुपये के लिए पाकिस्तान से आकर हिन्दुस्तान में गोलियां नहीं चलाता, सीरिया की भूख से आंसू ज़ारो-क़तरा बहते.

कोई अंबेडकर, कोई आरएसएस, कोई कांग्रेस सर्कल इस भूख की बात क्यों नहीं करती. स्मृतियों वो पगला अधनंगा भी नहीं जाएगा. बहुत आसान है कहना.. पागल वो हैं, जिन्होंने उसे खंभे पर चढ़ाया या वो जो भरी थाली के नाम पर खंभे पर चढ़ गया.

पर आप कीजिए मालिक ख़ूब बहस कीजिए. देश-दुनिया की तमाम मुसीबतों पर सबको सुलझा दीजिए!! वो पगला कहीं दिखे तो उसे पकड़ लीजिए. ख़ूब मारिये. उसने मेरी नींद ख़राब कर दी. आप सब चद्दर तानिये. आराम से सो जाइये. सपने में अंबेडकर आएं, गोलवलकर आएं या गांधी.. एक सवाल कीजिएगा ज़रूर.. धूमिल के ज़रिये पूछ रहा हूं ‘क्या आज़ादी तीन थके रंगों का नाम होता है, या उसका कोई ख़ास मतलब भी होता है’.
 
बाक़ी की ख़बरों के लिए लुटियन ज़ोन है!!

आखिर में दुष्यंत को याद करते हुए बस इतना ही...

'भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ
आजकल दिल्ली में है, जेरे बहस ये मुद्दा'



(अनुराग द्वारा एनडीटीवी में एसोसिएट एडिटर हैं)

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