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रघुराम राजन पर ज़्यादा 'रोने-पीटने' की ज़रूरत नहीं...

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रघुराम राजन पर ज़्यादा 'रोने-पीटने' की ज़रूरत नहीं...
"हमें 'मेक इन इंडिया' की जगह 'मेक फॉर इंडिया' की ज़रूरत है... दुनिया में एक और चीन की ज़रूरत नहीं..."

'ब्रेक्ज़िट' के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि उनके आस-पास पहले से काफी बारूद फैला है, जिससे उन्हें निपटना है और वह इसमें इजाफा नहीं चाहते...

"भारत की हालत 'अंधों में काने राजा' जैसी है..."

"हिटलर ने भी मजबूत सरकार चलाई थी, जिसने जर्मनी को पूरी तरह बरबाद कर दिया..."

    
भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के मौजूदा गर्वनर दूसरी पारी नहीं खेलेंगे, इस मुद्दे पर ख़ूब सियासत हो रही है, इन बयानों के बाद सवाल यह भी उठ रहा है कि गर्वनर की नियुक्ति में क्या सियासत होनी चाहिए...? वैसे रघुराम राजन के बयानों के संदर्भ में एक सवाल यह भी है कि क्या आरबीआई गर्वनर को सियासी बयान देने चाहिए...?

बहरहाल... मुझे राजन की सियासत से मतलब नहीं... मेरा सवाल समाजवादी देश में पूंजीवादी सोच पर है। राजन मूलत पूंजीवादी हैं, कीन्स की किताब से नहीं, लेकिन नवउदारवदी। उनकी सोच पूंजी और पूंजीपतियों का ही संरक्षण है। राजन के सरकार के खिलाफ कुछ आलोचनात्मक बयानों से वह कथित बुद्धिजीवी और मध्यवर्ग के बीच थोड़े वक्त के लिए लोकप्रिय हो सकते हैं, विरोधी दलों के लिए लंबे समय तक... लेकिन शोषितों और वंचितों के लिए उनकी नीतियां दीर्घकालिक तौर पर सही नहीं कही जा सकतीं।

राजन के सियासी बयानों को छोड़कर मैं सिर्फ उनके आर्थिक बयान की चर्चा करता हूं, जब उन्होंने कहा भारत को 'मेक इन इंडिया' नहीं, 'मेक फॉर इंडिया' पर ज़ोर देना चाहिए। मोटे तौर पर देश में माल बनाने के बजाय देसी बाज़ार के लिए माल बनाने पर ज़ोर देना चाहिए। यानी भारत निर्यात नहीं, आयात का केंद्र बने। वैसे राजन पहले ऐसे गर्वनर नहीं, जो उन्मुक्त पूंजी के समर्थक रहे हों, सुब्बाराव हों या रेड्डी, सबकी पढ़ाई एक ही किताब से हुई थी। वैसे यह भी सच है कि उदारीकरण के दौर में अलहदा सोच रखने वाला शख्स गर्वनर बन भी नहीं सकता।

दुनिया में, ख़ासकर विकसित देशों में फिलहाल जबर्दस्त मंदी है, जापान जैसे एक फीसदी की दर से भी हजारों करोड़ का कर्ज देने के लिए तैयार हैं, यानी उन देशों में मांग में बढ़ोतरी के फिलहाल कोई आसार नहीं। राजन के पक्षधर कहते हैं कि बाज़ार के दबाव के बावजूद महंगाई काबू में रखने के लिए उन्होंने लंबे वक्त तक ब्याज दरों की लगाम को थामे रखा। राजन 'क्रोनी कैपिटलिज़्म' पर भी खासे तेवर दिखाते रहे, लेकिन तेवर और कार्रवाई के अंतर को समझना ज़रूरी है। राजन जहां से आर्थिक नीतियों की 'ए-बी-सी-डी' सीखते रहे हैं, वह शिकागो स्कूल पूरी दुनिया में उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण की नीतियों का सूत्रधार रहा है। वर्ष 2007 से जब पूरी दुनिया आर्थिक मंदी की चपेट में आने लगी, विकसित देशों ने ब्याज दरें घटानी शुरू कर दीं, कई देशों में यह शून्य के आस-पास पहुंच गया। पिछले कई सालों से वहां स्थितियां बदली नहीं हैं। बाज़ार को मनाने के लिए अमेरिका जैसे देशों ने बैंकों और वित्तीय संस्थाओं से परिसम्पत्तियां खरीदीं, उन्हें और पैसा दिया... नतीजा, बाज़ार में पैसा तो आ गया, लेकिन वह उत्पादन में नहीं, शेयर बाज़ार के सट्टे में स्वाहा हो गया।

राजन को इन्हीं कसौटियों पर परखने की ज़रूरत है... पिछले कुछ सालों में सकल घरेलू उत्पादन की वृद्धि क्या रही है...? हां, सेंसेक्स ज़रूर बढ़ता रहा है, लेकिन औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने की तमाम कोशिशें नाकाम रही हैं।

राजन सरकारी ख़र्च में कटौती, माल बनाने के लिए भूमि अधिग्रहण के मामलों, सरकारी दखल, बिजली-पानी पर भी बोलते नज़र आए। राजन ने कभी मज़दूरों के अधिकार, उनके संरक्षण की बात की हो, मुझे ऐसा कोई बयान याद नहीं आता। राजन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुख्य अर्थशास्त्री रह चुके हैं, यानी वैश्विक पूंजीवाद के सेवक। अब अगर राजन जल्द ब्याज दरें घटा देते तो निवेश के लिए दीर्घकालिक माहौल नहीं बनता। मौद्रिक तरलता तो बढ़ जाती, लेकिन साथ ही महंगाई भी, और देर-सवेर विकास का बुलबुला फूटने पर नुकसान कारोबारियों का ही होता।

बैंक जिस घाटे से गुज़र रहे हैं, उसकी पटकथा 2007 से शुरू हो गई थी, खूब लोन बांटे गए। ऐसे में राजन जैसे पूंजीवाद के पोषक जानते थे कि यह असमानता गुस्से में तब्दील होगी और जनता इस गुस्से का इज़हार करेगी। उसे निशाना चाहिए... सो निशाने कुछ पूंजीपतियों के तौर पर दे दिए गए, मसलन माल्या। लेकिन हज़ारों करोड़ दबाए बैठे कई और कारोबारियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, उनके ख़िलाफ कोई बयान नहीं आया।

शिकागो यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएट स्कूल ऑफ बिजनेस में प्रोफेसर रहे डॉ रघुराम राजन पूंजीवाद और मुक्त बाज़ार के समर्थक हैं, लेकिन यहां वह सरकारी दखल नहीं चाहते। अपनी किताब 'सेविंग कैपिटलिज़्म फ्रॉम कैपिटलिस्ट्स' में वह लिखते हैं कि मुक्त बाजार व्यवस्था अगर नियम-कानूनों से बंधी रहेगी तो दम तोड़ देगी। यानी रिजर्व बैंक सरकार से स्वायत्त होकर खुले बाज़ार की खिदमत करे। बाज़ार की ज़रूरत के हिसाब से मुद्रा और ब्याज की नीतियां बनीं। गाहेबगाहे राजन कहते भी रहे, उनके पास एक ही चिंता है - मुद्रास्फीति। सरकार राजन की राह में रोड़ा बन सकती है, क्योंकि उस पर 70 फीसदी गरीबों का दबाव रहता है, हर पांच साल बाद... गर्वनर इन सबसे परे है।

विदेश में पढ़े अर्थशास्त्रियों की एक फौज है, जो पिछले कुछ दशकों से भारतीय अर्थनीति पर काबिज है, लेकिन इस दौर में नौकरियां सिमटी हैं, बेरोज़गारी बढ़ी है। इस टीम में रघुराम राजन के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह, मोंटेक सिंह आहलूवालिया, सी रंगराजन जैसे कई नाम हैं। इस टीम के फैसलों ने देश के सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक तानेबाने को प्रभावित किया है। गौरतलब है कि यह अभिजात्य टीम गरीबी से रूबरू नहीं हुई है, और शायद इसीलिए मोंटेक ग्रामीण क्षेत्र में गरीबी रेखा को 26 रुपये और शहरी क्षेत्र में 35 रुपये बनाने पर आमादा थे, लेकिन अपने दफ्तर में 35 लाख रुपये के शौचालय बनवाने से उन्हें गुरेज नहीं था।

चाहे कांग्रेस हो या बीजेपी, सब रोज़गार के बड़े-बड़े वादे करती हैं, राजन जैसे अर्थशास्त्री लंबी किताबी बातें बाते हैं, लेकिन तीन दशकों के आंकड़े देखिए, देसी-विदेशी कंपनियां रोजगार मशीनों को दे रही हैं, ऐसे में मांग-आपूर्ति का सिद्धांत छलावा नहीं तो और क्या है...? ऊपर से सरकारें श्रम कानूनों को बदल कर उसे पूंजीपतियों की चौखट पर बिठाने को आमादा हैं। मांग बढ़ाने के लिए कर्ज धड़ल्ले से बांटा जा रहा है, खुदकुशी करने के लिए मजबूर किसान फसल के लिए कम, घर में मोटरसाइकिल-टीवी के लिए कर्ज ज़्यादा लिए जा रहे है। राजन चुनिंदा कारोबारियों के लिए बयान तो देते हैं, लेकिन ऐसी विसंगतियों पर कुछ नहीं कहते।

वैसे, ग़ौर से सोचें, यह चुप्पी बहुत कुछ कह जाती है...

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अनुराग द्वारी NDTV में एसोसिएट एडिटर हैं...

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