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प्राइम टाइम इंट्रो : स्कूलों में फीस वृद्धि की फांस, कौन सुनेगा अभिभावकों की व्यथा...

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प्राइम टाइम इंट्रो : स्कूलों में फीस वृद्धि की फांस, कौन सुनेगा अभिभावकों की व्यथा...

प्रतीकात्मक चित्र

मंगलवार को जब से कहा है कि 'प्राइम टाइम' में फीस वृद्धि को लेकर जनसुनवाई करेंगे तो कई माता-पिता ने ऐसे-ऐसे ई-मेल लिखे हैं, जिन्हें पढ़कर लगता है कि स्कूलों के ख़िलाफ़ बोलना कितना मुश्किल है. तो हमने एक तरीका निकाला. स्कूल का नाम मत लीजिए और जो समस्या है वो बोलिये. अभी हम अपनी जनसुनवाई में स्कूल को शामिल नहीं करेंगे. हालांकि उनकी भी बारी आएगी, मगर शुरुआती दौर की जनसुनवाई में माता-पिता आकर बोलें या अपने अनुभव भेजें कि उन्हें क्यों लगता है कि स्कूल ने उनसे ज़रूरत से ज़्यादा या ज़बरदस्ती फीस लिए. उनकी आर्थिक स्थिति पर क्या असर पड़ा और वे इस सवाल का जवाब कैसे देते हैं कि जब फीस नहीं दे सकते तो बच्चे को सरकारी स्कूल में पढ़ाइये. उनके पास इस सवाल का क्या जवाब है कि पब्लिक स्कूल अच्छी पढ़ाई देते हैं तो फीस ज़्यादा लेंगे ही. फीस की मार पड़ी तो आप पर क्या बीती इतना ही मकसद है जनसुनवाई का, ताकि कोई सरकार चाहे तो इन माता-पिता के अनुभवों के आधार पर अपनी नीति बना सके. अब आइये शब्दों की हेराफेरी का एक गेम समझाता हूं.

स्कूलों के मामले में पब्लिक और प्राइवेट का कितना घपला है. जब कोई आपसे कहता है कि पब्लिक अस्पताल, तो मतलब होता है सरकारी अस्पताल. अस्पतालों के मामले में जो सरकारी नहीं होते वे प्राइवेट कहे जाते हैं. फिर स्कूलों के मामले में जो प्राइवेट होता है, उसे पब्लिक क्यों कहा जाता है. क्या आप समझ सके. प्राइवेट अस्पताल तो ठीक है, मगर जो स्कूल प्राइवेट है वो पब्लिक स्कूल क्यों कहलाता है. तो क्या आप सरकारी स्कूल को प्राइवेट स्कूल कहेंगे? नहीं न. भारत में प्राइवेट स्कूल को पब्लिक स्कूल कहा जाता है.

आसान नहीं है प्राइवेट स्कूलों के ख़िलाफ़ बोलना. शुरू में तो लोगों ने अकेले आवाज़ उठाई, मगर अब तो कई संगठन बन गए हैं. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार स्कूलों के खिलाफ ज़्यादा प्रदर्शन रविवार को होते हैं, जब माता-पिता घर पर होते हैं. बिल्डरों के खिलाफ भी ज़्यादातर प्रदर्शन रविवार को ही होते हैं. यही हाल रहा कि रविवार का नाम प्रदर्शनवार हो जाएगा. बहुत से माता-पिता को फीस बढ़ने से फर्क नहीं पड़ता. दो तरह से फर्क नहीं पड़ता. एक कि विरोध करेंगे तो बाकी लोग क्या कहेंगे दूसरा कि पैसा है. मगर बहुत से माता पिता की कमर टूट जाती है. इनकी परेशानी को सुना जाना चाहिए. बहुत से लोग डर के कारण सामने नहीं आते, हमने डरों की एक सूची बनाई है. अगर इसका जवाब हां में होगा तो आप प्रदर्शन नहीं कर पायेंगे. अगर ना में होगा तभी सड़क पर उतर पायेंगे.

क्या आपको लगता है कि प्रदर्शन करने पर बच्चे का नाम काट दिया जाएगा?
क्या आपको लगता है कि नाम कटा तो दूसरे स्कूल में एडमिशन नहीं होगा?
क्या आपको पता है कि पब्लिक या प्राइवेट स्कूल किस नेता का है?
क्या आपको पता है कि जिस नेता का है उसकी पार्टी की सरकार तो नहीं है?
क्या आपको पता है कि नेताओं ने इतने स्कूल क्यों खोल रखे हैं?


नेता बिल्कुल स्कूल खोल सकते हैं, मगर आप बताइये वही नेता जब अपने राजनीतिक दल की तरफ से आपके मोहल्ले में आता है तो कहता है कि जल्दी ग़रीबी दूर कर देगा. वही नेता जब अपने स्कूल में जाता है तो उसके ज़रिये आपको ग़रीब बनाने का खेल शुरू कर देता है. आप सोचेंगे कि चलो मीडिया को बुलाते हैं. पता चला कि मीडिया वालों के भी अपने स्कूल हैं. फिर समझ नहीं आता कि ये कब हो गया. गूगल पर सर्च कर रहा था तो कई शहरों और संगठनों के नाम निकल आए. देश के कई शहरों में फरवरी से लेकर अप्रैल के महीने में फीस वृद्धि के खिलाफ प्रदर्शन के उल्लेख मिलते हैं. इन खबरों को पढ़ते हुए तरह तरह के संगठनों का नाम भी पता चला है.

3 अप्रैल को पानीपत में पानीपत पेरेंट्स एसोसिएशन ने डेवलपमेंट फंड के नाम पर फीस वृद्धि का विरोध किया. 6 अप्रैल को जालंधर में पंजाब पेरेंट्स एसोसिएशन के तत्वाधान में कुछ स्कूलों के खिलाफ प्रदर्शन हुआ. 3 अप्रैल को गुड़गांव में 40 प्राइवेट स्कूलों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुआ. कार रैली कर प्रदर्शन किया, ताकि संडे पूरी तरह खराब न हो जाए. 17 मार्च को चंडीगढ़ में एक स्कूल के बाहर 100 अभिभावक जमा हो गए, चंडीगढ़ पेरेंट्स एसोसिएशन के तत्वाधान में. 9 अप्रैल को नोएडा स्टेडियम में ऑल नोएडा स्कूल पेरेंट्स एसोसिएशन के तहत 400 माता-पिता जमा हो गए और फीस वृद्धि के खिलाफ प्रदर्शन किया. 7 अप्रैल को गाज़ियाबाद में भी प्रदर्शन हुआ है. 26 मार्च को गुजरात के वडोदरा में 150 माता पिता ने एक स्कूल के खिलाफ प्रदर्शन किया और नारा लगाया कि माता पिता को एटीम मत समझो. गुजरात में अहमदाबाद और गांधीनगर के स्कूल के खिलाफ भी प्रदर्शन का उल्लेख मिलता है. अप्रैल महीने में इलाहाबाद में अभिभावक एकता समिति के तहत फीस वृद्धि के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुआ है. 11 अप्रैल को बेंगलुरु में भी एक प्रदर्शन हुआ, मगर स्कूल वालों की मीटिंग के बाद नतीजा अच्छा रहा. 'Voice Against Private School Fee Hike in Bengaluru' ने 10 फीसदी से अधिक फीस वृद्धि न करने की बात मनवा ली है. 11 अप्रैल को मुंबई में भी री एडमिशन फीस के नाम पर वसूली का विरोध हुआ है. शिक्षा मंत्री से मुलाकात की गई. यहां फोरम फॉर फेयरनेस इन एजुकेशन नाम का एनजीओ नेतृत्व कर रहा है. 8 अप्रैल रायपुर में छत्तीसगढ़ छात्र पालक संघ ने डोर टू डोर अभियान शुरू कर दिया है. यह संगठन अभी तक 350 ज्ञापन दे चुका है, मगर कुछ नहीं हुआ तो घर-घर जाकर लोगों को जगा रहा है. 4 अप्रैल को जयपुर मे भी फीस वृद्धि के खिलाफ प्रदर्शन हुआ है.

हर प्रदर्शन की एक खास बात है. सारे प्रदर्शन ज्ञापन देने के साथ खत्म होते हैं और ज्यादातर मामलों में ज्ञापन देने के कुछ नहीं होता. यह भी सच्चाई है कि ज़्यादातर स्कूलों में फीस वृद्धि के ख़िलाफ़ माता पिता विरोध नहीं कर रहे हैं. मान कर चलना चाहिए कि उन्हें फीस वृद्धि से कोई दिक्कत नहीं है. पंजाब के जालंधर में 14 साल की नोवल नाम की एक लड़की फीस वृद्धि के खिलाफ कई महीनों से आंदोलन कर रही है. दसवीं में पढ़ने वाली नोवल का कहना है कि उसकी छोटी बहन एनसीईआरटी से 240 रुपये की किताब खरीदती है जबकि शहर के बाकी स्कूल इसी कक्षा की किताबें 3500 रुपये में दे रहे हैं. नोवल ने 8 अप्रैल, 2016 से स्कूलों की मनमानी के ख़िलाफ़ धरना देना शुरू किया था. 4 जुलाई से 21 सितंबर तक लगातार 80 दिनों तक धरने पर बैठी रही. इस दौरान स्कूल, डीसी के दफ्तर, जालंधर के चारों विधायकों के घर के बाहर नेवल ने धरना दिया था. नोवल के पिताजी ने बताया कि उसके किसी भी धरने का कोई नतीजा नहीं निकला है. इतना ही निकला है कि 21 दिसंबर को अकाली सरकार ने फीस वृद्धि की जांच के लिए एक कमेटी बनाने का एलान किया था. मौजूदा कैप्टन सरकार ने भी इस कमेटी को मान्यता दी है.

इसी तरह से इलाहाबाद के विजय गुप्ता दस सालों से स्कूलों की फीस वृद्धि के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं. 2010 में विजय गुप्ता ने इलाहाबाद से लखनऊ तक पैदल यात्रा की थी. 2012 में चार दिनों के लिए और 2015 में आठ दिनों के लिए आमरण अनशन पर बैठे. विजय गुप्ता के तमाम आंदलनों की प्रेस क्लिपिंग जितनी मोटी हो गई है उतनी ही स्कूलों की फीस भी मोटी हो गई है. वो जितना आंदोलन करते हैं, फीस उससे ज़्यादा बढ़ जाती है. विजय गुप्ता का कहना है कि 2013 में 35 प्रतिशत फीस बढ़ गई. 2014 में 20 से 22 प्रतिशत फीस बढ़ी. 2015 में 30 प्रतिशत फीस बढ़ी है. 2017 में 35 से 40 प्रतिशत फीस वृद्धि हुई है.

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तो स्कूलों की फीस वृद्धि को लेकर तरह तरह के असफल नेतृत्व भी पैदा हो रहे हैं. असफल इसलिए कहा क्योंकि इन्हें न तो जनता का समर्थन मिलता है न राजनीतिक दल का. यूपी की योगी सरकार फीस वृद्धि के ख़िलाफ़ कुछ सक्रिय दिखती है. यूपी सरकार ने फीस स्ट्रक्चर की समीक्षा के आदेश दिये हैं. 31 मार्च को गुजरात में एक कानून बना है, जिसकी खबर कम लोगों को है, इसके अनुसार राज्य में प्राइवेट स्कूलों की फीस सालाना 15 से 27 हज़ार के बीच ही रहेगी. प्राइमरी स्कूल के लिए 15,000, सेकेंडरी के लिए 25,000 और सीनियर सेकेंडरी के लिए 27,000 फीस रखी जा सकती है. इस बिल का नाम है, The Gujarat Self Financed Schools (Regularisation of Fees) Bill, 2017. इस कानून के तहत राज्य के सभी बोर्ड के स्कूल आएंगे.

2015 में दिल्ली सरकार भी प्राइवेट स्कूलों की फीस वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए एक बिल लाई थी. इसके तहत प्राइवेट स्कूलों के लिए रेगुलेटरी संस्था बननी थी. यह बिल विधानसभा से पास तो है मगर सेंटर से मंज़ूरी नहीं मिली है. 24 जनवरी, 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि डीडीए की ज़मीन पर बने प्राइवेट स्कूल बिना सरकारी अनुमति के फीस नहीं बढ़ा सकते हैं. 30 मार्च 2017 को दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि यह मान लेना कि सभी स्कूल मुनाफा कमाते हैं, सही नहीं है. इस जनसुनवाई में हम सुनेंगे कि स्कूल वाले फीस के नाम पर क्या-क्या और कैसे-कैसे वसूलते हैं.


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