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क्या कालाहांडी और जबलपुर की इन घटनाओं के लिए हम शर्मिंदा हैं?

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क्या कालाहांडी और जबलपुर की इन घटनाओं के लिए हम शर्मिंदा हैं?

दाना माझी का आरोप है कि अस्‍पताल के अधिकारियों ने उसकी मदद नहीं की

क्या आपने मेलाघर गांव का नाम सुना है. ज्यादा से ज्यादा लोगों का जवाब 'न' में मिलेगा, फिर जब नखरूडी ग्राम पंचायत के बारे में पूछा जाएगा तो यहां भी जवाब यही होगा, लेकिन जब कालाहांडी का नाम लिया जाएगा तब एक ऐसी छवि आपके सामने आएगी जो कई सालों से काले भूत की तरह दिमाग में बैठी हुई है. जब भी कालाहांडी का नाम लिया जाता है, तब एक पिछड़े इलाके के रूप में इसकी छवि सबके दिमाग में घूम जाती है. एक समय ऐसा भी था जब कालाहांडी सिर्फ एक ही ख़बर के लिए हमेशा आगे रहता था, वह थी भुखमरी.

कुछ साल पहले कालाहांडी के हालात इतने ख़राब थे कि वहां के लोग अपना पेट भरने के लिए पेड़ के पत्ते खा लिया करते थे. कई बार ऐसा भी हुआ कि महज कुछ पैसे के लिए वहां के लोग अपने बच्चों को बेच दिया करते थे. आपको लगता होगा कि वह ख़ुदग़र्ज़ थे, नहीं, बिलकुल नहीं, बल्कि वे जिस परिस्थिति में थे, उस परिस्थिति में अपने बच्चों को नहीं देखना चाहते थे. आज कालाहांडी में ज़रूर प्रगति हुई है लेकिन गांवों के हालात लगभग वही है. वहं बिजली नहीं है, सड़कें नहीं है. ट्रांसपोर्ट का सुविधा नहीं है.

कालाहांडी तो कई लोगों के लिए एक कमाई का स्रोत भी बन गया है. इस ज़िले की पहचान महज एक पिछड़े इलाके के रूप में है जिसका फ़ायदा उठाते हुए कई एनजीओ यहां अपनी दुकान चल रहे हैं. विकास के लिए कई प्रोग्राम शुरू किए गए लेकिन यह सब गांव तक नहीं पहुंचे. कल दिनभर कालाहांडी राष्ट्रीय मीडिया में छाया रहा. कालाहांडी ज़िले के मेलाघर गांव के रहने वाले दीना माझी सुर्खियों में रहे.  

दाना माझी को न कभी आप जानते पाते, और न मैं. वैसे भी क्यों जानेंगे? दाना माझी कालाहांडी का कोई कलेक्टर तो नहीं है. वह तो बस एक आदिवासी है. एक ऐसा आदिवासी जो इस सिस्टम को नहीं समझता. न ही उसे कोई समझाने की कोशिश करता है. वैसे वह इस सिस्टम पर भरोसा भी नहीं करता. अगर किसी पर उसका भरोसा है तो वह है अपने आप पर. इसलिए तो अपनी पत्नी की मौत के बाद उसकी लाश अकेले अपने कंधे पर समेटकर शहर से 60 किलोमीटर दूर अपने गांव के तरफ निकल पड़ा था. बस यह सोचकर कि उसको पत्नी का अंतिम संस्कार करना है. वह भी पूरी रीति-रिवाज़ के साथ.

अगर कुछ लोग कलेक्टर को फ़ोन नहीं करते, मीडिया को फ़ोन नहीं करते तो दाना माझी को एम्बुलेंस नहीं मिलती. वह ऐसे ही चलकर 60 किलोमीटर तय करते हुए अपने गांव पहुंचता, चाहे जितने दिन भी लग जाते. दाना के साथ उसकी 12 साल की बेटी भी थी जो रोती हुई नज़र आ रही थी. ऐसे में दाना क्या करता? एक तरफ अपनी बेटी को समझाता तो दूसरी तरफ लाश को कंधे में समेटकर आगे बढ़ते जाता. जरा सोचिये! हमारा समाज और सिस्टम कितना खोखला हो गया है. एक तो अस्पताल से उसको मदद नहीं मिली, दूसरी तरफ उसने लाश को कंधे में समेटकर अपने गांव के लिए निकलना पड़ा. वह 10 किलोमीटर तक निकल भी चुका था लेकिन उसे किसी ने नहीं रोका, न ही उसकी समस्या का हल करने की कोशिश की.

अगर उसको इस सिस्टम पर भरोसा होता, समाज पर भरोसा होता तो शायद वह इंतज़ार करता, लेकिन वह जनता था कि यह समाज, यह सिस्टम उसके लिए नहीं है. राष्ट्रीय मीडिया में इस ख़बर को तूल पकड़ने में पूरा एक दिन लग गया. यह ख़बर अगर किसी बड़े शहर से 60 किलोमीटर दूर होती तो राष्ट्रीय चैनलों की भीड़ लग गई होती. मीडिया की भीड़ बढ़ते देख नेताओं की भीड़ भी लग जाती!
 


दुःख की बात यह है कि दाना माझी के गांव में अभी तक कोई मीडिया नहीं पहुंचा है. दो दिनों से पुरानी बाइट और पुराना शॉट्स चल रहे हैं. हो सकता है कि कुछ मीडिया वाले आज वहां पहुंच जाएं. दाना माझी को खुद पता नहीं कि उसके बारे में क्या लिखा जा रहा है. क्या दिखाया जा रहा है, क्योंकि वह एक ऐसे गांव से आता है, जहां न अखबार पहुंचता है और न टेलीविज़न है. टेलीविजन कैसे होगा? दाना के गांव में तो बिजली भी नहीं है. फ़ोन भी नहीं है. उसको अपना परिवार पालने के लिए मजदूरी करनी पड़ती है. सिर्फ दाना ही नहीं, उसकी दो बेटियां भी यही काम करती हैं. उसके गांव तक पहुंचने के लिए पक्का रास्ता भी नहीं है.

हमारी देश में रोज इस तरह की घटनाएं होती हैं लेकिन जो घटना मीडिया में तूल पकड़ लेती है तो वह सबसे बड़ी ख़बर बन जाती है, और जो तूल नहीं पकड़ पातीं वे बिना रिपोर्ट हुए रह जाती हैं. कितनी बार हम सभी ने कालाहांडी से ग्राउंड रिपोर्ट देखी है. शायद नहीं या बहुत कम. कालाहांडी में जितनी समस्याएं हैं, शायद देश के किसी दूसरे ज़िले में हों. लेकिन आजकल मीडिया में ग्राउंड रिपोर्ट कहां दिखाई जाती है? मीडिया तो एक युद्ध का मैदान बन गया है जहां बस कुछ नेताओं को एक दूसरे से भिड़ाकर टीआरपी बटोरने की कोशिश की जाती है.

सिर्फ कालाहांडी नहीं, जबलपुर से भी एक ख़बर आई है. पनागर तहसील के बहनौदा गांव में दबंगों ने एक शव यात्रा को भी निकलने का रास्ता नहीं दिया जिसके चलते गमगीन परिजनों को तालाब पारकर शव यात्रा निकालनी पड़ी. जब कोई गरीब ज़िंदा होता है, तब उसे अपना पेट पालने के लिए संघर्ष करना पड़ता है लेकिन जब मर जाता है तब भी उसके अंतिम संस्कार के लिए कई कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है.

हम सब जब ऐसी खबर सुनते हैं तो दुखी हो जाते है. अपने आपको ऐसे पेश करते हैं, जैसे अगर यह हमारे सामने होता तो हम मदद करने के लिए सबसे पहले दौड़ पड़ते लेकिन सच्चाई यह है कि रोज ऐसी खबर आती हैं. कई बार हमारे सामने भी यह सब घटित होता है लेकिन हम सब नज़रअंदाज़ करते हुए आगे निकल जाते हैं.

सुशील कुमार महापात्र NDTV इंडिया के चीफ गेस्ट कॉर्डिनेटर हैं...

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