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केजरीवाल की माफी - पीएम पद की लॉन्चिंग तो नहीं  

संसद में पेश उपभोक्ता संरक्षण के प्रस्तावित कानून के अनुसार भ्रामक विज्ञापनों पर कंपनियों तथा ब्रान्ड एम्बैसेडरों पर जुर्माना तथा जेल भेजने का दण्ड निर्धारित किया गया है.

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केजरीवाल की माफी - पीएम पद की लॉन्चिंग तो नहीं  

अरविंद केजरीवाल की फाइल फोटो

दिल्ली के मुख्यमंत्री तथा आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने अकाली नेता विक्रम मजीठिया के बाद BJP नेता नितिन गडकरी और कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल से माफी मांगकर बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया है. केजरीवाल के खिलाफ कुल 33 मामलों में से 14 मुकदमे मानहानि के हैं. केजरीवाल के अभिन्न मित्र तथा दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा है - जिन्हें दुख पहुंचाया, उन सबसे माफी मांगेगे. अब जो सवाल उभरता है, वह है - इन माफियों के पीछे क्या वास्तविक हृदय परिवर्तन है या यह केजरीवाल का नया सियासी ड्रामा है...?
 
आरोपों पर पलटी के बाद केजरीवाल इस्तीफा देकर नए मापदंड बनाएं : संसद में पेश उपभोक्ता संरक्षण के प्रस्तावित कानून के अनुसार भ्रामक विज्ञापनों पर कंपनियों तथा ब्रान्ड एम्बैसेडरों पर जुर्माना तथा जेल भेजने का दण्ड निर्धारित किया गया है. केजरीवाल ने आरोपों की राजनीति के आधार पर ऐतिहासिक बहुमत हासिल कर सरकार बनाई. झूठे आरोपों के आधार पर हासिल की गई सत्ता यदि गैरकानूनी लाभ है, तो उससे केजरीवाल को वंचित क्यों नहीं करना चाहिए...? सत्ता हासिल करने के लिए लगाए गए आरोपों पर माफी मांगने और पलटने के बाद जनता से धोखाधड़ी के जुर्म में क्या केजरीवाल की सरकार को इस्तीफा देना चाहिए...?
 
माफी मांगने के सारे तर्क बेमानी हैं : गडकरी मुकदमे के दौरान बेलबॉण्ड देने की बजाय जेल जाने वाले केजरीवाल को अचानक अदालतों से डर क्यों लगने लगा...? मानहानि के अधिकतर मुकदमों में केजरीवाल को अदालत में व्यक्तिगत तौर पर पेश होने से छूट मिली है, तो फिर उनका समय कैसे बर्बाद हो रहा है. अरुण जेटली द्वारा दायर अवमानना मामले में, राम जेठमलानी की फीस का भुगतान सरकारी खजाने से करने की कोशिश से केजरीवाल की फजीहत हो चुकी है. जब केजरीवाल का वक्त और पैसा दोनों ही नहीं लग रहा, तो फिर मुकदमों से अचानक उन्हें क्यों बेचैनी होने लगी...?
 
दिल्ली के चीफ सेकेट्ररी से केजरीवाल ने माफी क्यों नहीं मांगी : दिल्ली के चीफ सेकेट्ररी अंशु प्रकाश को 'आप' के विधायकों ने आधी रात को केजरीवाल के घर में पीटा. माफी मांगने की बजाय केजरीवाल ने इसे राजनैतिक मोड़ देते हुए ट्वीट किया कि दो थप्पड़ मारने पर पुलिस उनके घर आ गई, परंतु जज लोया मामले पर अमित शाह के खिलाफ जांच नहीं हो रही. लोया मामले पर किसी और के अपराध से केजरीवाल या उनके विधायकों को चीफ सेकेट्ररी के खिलाफ हिंसा करने का अधिकार कैसे मिल जाता है. केजरीवाल द्वारा माफी मांगने की बजाय अहंकारपूर्ण रवैया अपनाने से दिल्ली का प्रशासन पिछले कई महीनों से ठप पड़ा है, फिर राजनैतिक माफीनामों पर जनता की सेवा की दुहाई क्यों...?
 
जिन्होनें मानहानि का मुकदमा नहीं किया, क्या उनसे भी माफी मांगेंगे : केजरीवाल द्वारा पिछले कई वर्षों में शीला दीक्षित समेत अनेक लोगों पर संगीन आरोप लगाए गए. इन मामलों में 'आप' सरकार द्वारा कथित भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ कानून के माध्यम से अभी तक सजा भी नहीं दिलाई गई. जिन नेताओं ने केजरीवाल पर मानहानि का मुकदमा नहीं किया, उनसे केजरीवाल कब माफी मांगेगे...?
 
अनर्गल आरोपों से देश और अर्थव्यवस्था को नुकसान : अवमानना कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर केजरीवाल ने अदालतों का काफी वक्त बर्बाद किया है, जिसकी भरपाई इन माफीनामों से कैसे होगी...? महिलाओं के विरुद्ध अपराध या भ्रष्टाचार के मामलों में नेताओं द्वारा मीडिया हाइप बनाने से देश की अर्थव्यवस्था और छवि को भारी नुकसान पहुंचता है. केजरीवाल द्वारा भ्रष्ट मंत्रियों और नेताओं की रैंकिंग से, पर्यटन और विदेशी निवेश को हुए नुकसान की भरपाई कौन करेगा...?
 
माफी के पीछे PM पद का ख्वाब : आम आदमी की तरह रहने वाले केजरीवाल सत्ता की राजनीति के चतुर खिलाड़ी हैं. दिल्ली में ऐतिहासिक बहुमत हासिल करने के बाद केजरीवाल ने सत्ता को सिसोदिया के हवाले कर अखिल भारतीय राजनेता बनने का एक्शन प्लान बहुत पहले शुरू कर दिया था. देश में मोदी विरोध का वातावरण होने के बावजूद विपक्ष में सर्वमान्य नेता का अभाव है. केजरीवाल ने पूर्व में ममता बनर्जी और दक्षिण में कमल हासन के साथ राजनीतिक पींगें बढ़ाई हैं. गडकरी, सिब्बल, मजीठिया और अन्य नेताओं से माफी मांगकर केजरीवाल अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता को बढ़ाकर कहीं PM पद की लॉन्चिंग तो नहीं कर रहे हैं...? केजरीवाल की राजनीति के बाद जनता का सिविल सोसाइटी से भरोसा टूटने पर देश में लोकतंत्र कमजोर हुआ. माफी असल में नेताओं के बीच समझौते के साथ-साथ जनता के भरोसे का मामला भी है. माफियों के दौर में जनता का अविश्वास, कहीं केजरीवाल की राजनीति को ही खत्म न कर दे...?
 
विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं...
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.
 

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