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अटल की शक्ति अटल की सीमा...

जज़्बात के रेशों से बनी ऐसी शख़्सियतें एक हद के बाद निर्मम फ़ैसले नहीं ले पातीं. उदार लोकतंत्र की राजनीति में ऐसे निर्मम फ़ैसले बहुत स्वीकार्य भी नहीं होते.

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अटल की शक्ति अटल की सीमा...

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (फाइल फोटो)

कुछ लोगों के व्यक्तित्व में अपनी तरह की एक ऊष्मा होती है. अटल बिहारी वाजपेयी का व्यक्तित्व कुछ ऐसा ही था. एक बड़प्पन उनकी शख्सियत में था. वे जवाहरलल नेहरू की तारीफ़ कर सकते थे, इंदिरा गांधी को बांग्लादेश युद्ध के बाद दुर्गा बता सकते थे और विपक्ष के बहुत सारे नेताओं से ऐसे दोस्ताना संबंध रख सकते थे जो दलगत राजनीति से ऊपर हों. लेकिन मूलतः जज़्बात के रेशों से बनी ऐसी शख़्सियतें एक हद के बाद निर्मम फ़ैसले नहीं ले पातीं. उदार लोकतंत्र की राजनीति में ऐसे निर्मम फ़ैसले बहुत स्वीकार्य भी नहीं होते. दरअसल यही शख़्सियत वाजपेयी की शक्ति भी थी और सीमा भी. इस शख़्सियत ने वाजपेयी को कुछ ऐसे दोस्त दिए जो जीवन भर उनके साथ रहे. लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसी आत्मीय जोड़ी भारतीय ही नहीं, विश्व राजनीति में भी शायद दुर्लभ है. अगर यह जोड़ी नहीं होती तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छाया में बनी भारतीय जनसंघ जैसी पार्टी बहुत सीमित वैचारिक तबके तक सिमट कर रह जाती. आडवाणी की सख़्ती और वाजपेयी की नरमी ने बीजेपी को भारत की ऐसी पार्टी बनाया जो कांग्रेस का विकल्प हो पाई. यह इतिहास भले पुराना हो चुका हो कि किस तरह आडवाणी ने वाजपेयी पर छींटाकशी की वजह से बलराज मधोक पर कार्रवाई की, लेकिन उसने पार्टी के लिए नई खिड़कियां खोलीं. जनता पार्टी में भारतीय जनसंघ के विलय का फ़ैसला भी इन्हीं दोनों का था और अलग होकर भारतीय जनता पार्टी बनाने का फ़ैसला भी.

लेकिन अटल-आडवाणी जितने साथ थे उतने ही अलग भी. वाजपेयी राजनीतिक रणनीतिकार के तौर पर कभी नहीं जाने गए. 1980 में बीजेपी का गठन करते हुए उन्होंने गांधीवादी समाजवाद का जो रास्ता चुना था वह वैचारिक-राजनैतिक दोनों स्तरों पर विफल रहा. 1984 में बीजेपी को लोकसभा में बस दो सीटें मिलीं. 1987 में राजीव गांधी की सरकार ने राम मंदिर का ताला खोलने की जो ऐतिहासिक भूल की, उसे बीजेपी और आडवाणी ने किसी सुनहरे मौके की तरह लपक लिया. इसके बाद का दशक आडवाणी केंद्रित राजनीति का दशक है. लेकिन सिर्फ आडवाणी होते और राम मंदिर आंदोलन चला रहे होते तो बीजेपी का रास्ता आसान नहीं होता. वहां वाजपेयी भी थे जिनकी वजह से बीजेपी न सिर्फ उदारवादी पार्टी बनी हुई थी, बल्कि तब तक गैरकांग्रेसवाद के अभियान का एक प्रमुख स्तंभ भी थी. यह अनायास नहीं था कि 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार को एक छोर पर वाम मोर्चा समर्थन दे रहा था और दूसरे छोर पर भारतीय जनता पार्टी समर्थन दे रही थी.

लेकिन इसी के बाद बीजेपी का आडवाणी युग शुरू होता है. वे सोमनाथ से अयोध्या की रथयात्रा पर निकलते हैं और कई शहर जलने लगते हैं. समस्तीपुर में लालू यादव आडवाणी को गिरफ़्तार करते हैं और केंद्र में बीजेपी वीपी सिंह की सरकार से समर्थन वापस लेती है. नब्बे के दशक की राजनीति अचानक एक बड़ा बदलाव देखती है. गैरकांग्रेसवाद धीरे-धीरे गैरबीजेपीवाद की तरफ मुड़ रहा है. 1992 में बाबरी मस्जिद गिरती है और नरसिम्‍हा राव चुपचाप देखते रहते हैं. इस पूरे दौर में अटल बिहारी वाजपेयी राम मंदिर आंदोलन के साथ भी हैं और उससे एक सुरक्षित दूरी पर भी. पार्टी का अतिरेक उन्हें दुखी करता है, वे अपने अकेलेपन की शिकायत करते पाए जाते हैं, लेकिन मौका मिलते ही राम मंदिर आंदोलन का अपना समर्थन देने में नहीं हिचकते. 5 दिसंबर 1992 का उनका भाषण अब यूट्यूब के सौजन्य से मशहूर हो चुका है जिसमें वे सुप्रीम कोर्ट के आदेश की व्याख्या करते हुए बता रहे होते हैं कि कैसे कारसेवा के लिए ज़मीन 'समतल' की जानी है.

आडवाणी की मेहनत से 1996 में जब बीजेपी पहली बार सरकार बनाने की हैसियत में आती है तो पाती है कि उसके पास बहुमत जुटाने लायक समर्थन नहीं है. यह भूलना नहीं चाहिए कि विश्वास मत के दौरान समझौतों से बनी सरकार को चिमटे से भी न छूने की बात करने वाले वाजपेयी के सबसे करीबी सलाहकार प्रमोद महाजन दो दिन पहले तक गर्व से कहते दिखे थे कि प्रमोद और पेप्सी अपने राज नहीं बताते.

इसी मोड़ पर अटल बिहारी वाजपेयी की उदार हिंदू छवि पार्टी के काम आती है. निश्चय ही यहां से गठबंधन राजनीति की ओर मुड़ते हुए बस वाजपेयी की मार्फ़त बीजेपी वे दोस्तियां कर पाती है जो पहले नामुमकिन मानी जाती थीं- पंजाब में अकाली दल के साथ बीजेपी का समझौता होता है और दक्षिण भारत में पहले एआईडीएमके और बाद में डीएमके को साथ लेकर बीजेपी आर्य-द्रविड़ का पहले असंभव माना जाने वाला समझौता करके गठबंधन की राष्ट्रीय राजनीति को एक नया आयाम देती है. अटल बिहारी वाजपेयी अंततः पहले ऐसे गैरकांग्रेसी प्रधानमंत्री सबित होते हैं जो अपना कार्यकाल पूरा कर पाए.
लेकिन यह कार्यकाल कैसा रहा? इस कार्यकाल पर भी वाजपेयी के विराट व्यक्तित्व की छाया रही- वही छाया जो आज डेढ़-दो दशक बाद इस देश में उनके निधन से उपजे विराट शोक में दिख रही है. वाजपेयी ने अपने बड़प्पन से सबको जोड़े रखा- जॉर्ज से लेकर ममता और जयललिता तक- लगभग असंभव समझे जाने वाले सहयोगियों के साथ मिलकर वे सरकार चलाते रहे तो बस इसलिए नहीं कि उन्होंने गर्हित समझौते किए, बल्कि इसलिए भी कि उनके व्यक्तित्व के आगे उनके विरोधी ख़ुद को नतमस्तक पाते रहे.

लेकिन यह कार्यकाल वैचारिक तौर पर बीजेपी की मूल नीतियों से भटकने का कार्यकाल है. बीजेपी की आचार संहिता में जो तीन मुद्दे सबसे अहम थे- राम मंदिर, धारा 370 और समान नागरिक संहिता के- उन सबको जैसे बीजेपी भूल गई. स्वदेशी को अपना आर्थिक दर्शन मानने वाली बीजेपी अब उदारीकरण के रास्ते पर थी, पहली बार किसी सरकार में विनिवेश का अलग मंत्रालय था और मज़दूर संगठनों के विरोध के बावजूद जनता की कंपनी धड़ाधड़ बेची जा रही थीं. इसी दौर में सरकारी कर्मचारियों की पेंशन ख़त्म करने का भी फ़ैसला हुआ. बेशक, इसी दौर में सड़क और टेलीकॉम के क्षेत्र में बड़ी पहल भी हुई- लेकिन यह बीजेपी के मूल सिद्धांतों से अलग चल रही सरकार थी. संघ इस दौर में असहाय था, बीजेपी के अध्यक्ष अदले-बदले जा रहे थे, बस अटल ही अटल थे.

अटल बिहारी वाजपेयी का यह दौर कई और मायनों में नाकाम था. इसी दौर में देश ने संसद पर हमला देखा, अक्षरधाम पर हमला देखा, कई और आतंकी हमले देखे और कंधार के समय आतंकियों की मांग के आगे सरकार का शर्मनाक समर्पण देखा. इन सबके बावजूद अगर सरकार का इकबाल बना रहा तो इसकी वजह वाजपेयी के व्यक्तित्व में भी थी और उनकी राष्ट्रवादी नीति में भी. वाजपेयी यह भरोसा दिलाते थे कि वे ही देश के सच्चे नेतृत्वकर्ता हैं. उन्होंने ऐटमी परीक्षण का फ़ैसला कर अचानक देश में राष्ट्रवाद का एक नया ज्वार पैदा किया. लगभग पूरे देश ने इसे राष्ट्र के शौर्य की तरह देखा. किसी ने नहीं पूछा कि इसका हासिल क्या है. जब दुनिया भर में 'लोअर ट्रेजेक्ट्री' के युद्ध प्रचलित हैं तब ऐटमी हथियार बनाकर भारत क्या करेगा? 1999 में करगिल के युद्ध जैसे हालात ने बताया कि पाकिस्तान की चुनौती से निबटने में हमारे ऐटमी हथियार कारगर नहीं हैं. बल्कि उसके पहले ही पाकिस्तान ऐटमी विस्फोट कर भारत की बराबरी पर आ चुका था. करगिल में अपनी ज़मीन हासिल करने में ही भारत को भारी कीमत चुकानी पड़ी.

कुल मिलाकर यह दिखता है कि प्रधानमंत्री के तौर पर वाजपेयी का कार्यकाल बहुत कामयाब नहीं रहा. यह उनका अपना करिश्माई व्यक्तित्व था जिससे मध्यवर्गीय समाज के भीतर एक 'फील गुड' आता था, लेकिन अंततः जनता ने उन्हें नकार दिया- वह भी उस दौर में जब उनके कद्दावर व्यक्तित्व के सामने सोनिया गांधी या कोई दूसरा विपक्षी नेता आसपास नहीं दिखता था.

लेकिन असली बात यही थी कि वाजपेयी के पास दिल का बड़प्पन था जिसने उन्हें श्रद्धेय नेता बनाया, वह 'विज़न' नहीं जिससे वे देश को नए रास्तों पर ले जाते. कश्मीर के लिए निकला उनका सुझाव इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत इसी बड़प्पन की कोख से निकला था, लेकिन वे इस पर अमल की कोई ठोस योजना पेश नहीं कर सके.

दरअसल वाजपेयी मूलतः संघ से दीक्षित थे- यह बात वे बार-बार मानते रहे. वह उनके पूरे व्यक्तित्व की बुनावट की सीमा थी. उनकी विचार-यात्रा में भी संघ का प्रभाव उनके राष्ट्रवादी तेवरों में मिलता है. उनकी बहुत सारी कविताएं राष्ट्रवाद के इसी संस्करण से निकली हैं, जिनमें पाकिस्तान को चेतावनी देने से लेकर देश के लिए जान देने का जज्बा तक मिलता है. बेशक, इनमें एक मानवतावादी स्वर भी है जो अंततः उनके दिल से निकलता है, उनकी वैचारिक नीतियों से मेल नहीं खाता.

दरअसल वाजपेयी जितने दूर होते गए, उतने ही बड़े होते गए. उनके प्रति उमड़ा अगाध प्रेम इस बात की भी तस्दीक है कि जनता अपने नेताओं में वह मनुष्यता, वह ऊष्मा नहीं देख रही जो वह वाजपेयी में पाया करती थी. निस्संदेह आज प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी को लगभग टक्कर देती है या शायद उनसे आगे निकलती है. लेकिन क्या वाजपेयी अगर पिछले वर्षों से सचेत होते तो मौजूदा सरकार के कामकाज के प्रति उदार होते? संभव है- होते. गुजरात में मोदी को राजधर्म निभाने की जो शाकाहारी सलाह उन्होंने 2002 में दी थी, उसे ही बस भिन्न रूपों में देते हुए संतुष्ट रहते और खुश होते कि जिस हिंदू मन और जीवन की वे कल्पना करते रहे, राष्ट्र उसकी ओर बढ़ रहा है. दरअसल वाजपेयी के बड़प्पन की वजह से यह उम्मीद बनती थी कि संघ की राष्ट्रीय अवधारणा कुछ मानवीय हो पाएगी. उसके अभाव में वह कितनी इकहरी हो सकती है- इसके प्रमाण अब देखने को मिल रहे हैं.

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प्रियदर्शन NDTV इंडिया में सीनियर एडिटर हैं...

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