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बनारस हादसा- 'क्योटो' के नकारा तंत्र में भीड़ फिर हलाल

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बनारस हादसा- 'क्योटो' के नकारा तंत्र में भीड़ फिर हलाल

प्रतीकात्मक फोटो

जद (एकी) के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव ने बनारस भगदड़ में हुई मौतों पर अफसोस जाहिर करते हुए ऐसे धार्मिक आयोजनों के लिए दिशा-निर्देश बनाने की मांग की है. ऐसे आयोजनों के लिए नियम तथा कानूनों का पर्याप्त प्रावधान है, जिनके बारे में जब राजनेता अंजान हैं तो प्रशासन उन्हें लागू करने में तो विफल रहेगा ही!  

सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार ने तीन साल से नहीं दिया जवाब
धार्मिक स्थलों पर जुटने वाली श्रद्धालुओं की भारी भीड़ की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पी सतशिवम ने नवंबर 2013 में सभी राज्यों को नोटिस जारी किया था.  इस याचिका में भीड़ को नियंत्रित करने और आपदा प्रबंधन के बारे में नियम कानून बनाने के साथ दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई. मामले की पिछली सुनवाई जून 2016 को हुई जिसके अनुसार पिछले तीन वर्षों में उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब भी नहीं दाखिल किया है.

आयोजकों पर तय हो जवाबदेही
बाबा जय गुरुदेव के 10,000 करोड़ के अधिक के साम्राज्य पर अधिपत्य जमाने के लिए उत्तर प्रदेश में शक्ति प्रदर्शन हो रहे हैं, जिनको राजनेताओं की शह और संरक्षण है. बनारस में 24 लोगों की मृत्यु के कुछ महीने पहले मथुरा में भी बाबा जय गुरुदेव के अनेक समर्थक मारे गए थे. बनारस में आयोजकों ने प्रशासन को सिर्फ तीन हजार लोगों के आने की सूचना दी, जबकि सत्संग के लिए 1.8 लाख स्क्वायर फीट का पंडाल बनाया. तीन लाख लोगों की भारी भीड़ और खुफिया विभाग के चार एलर्ट के बावजूद प्रशासन और यातायात विभाग सतर्क नहीं हुआ. इस लापरवाही के लिए आयोजकों तथा अधिकारियों के विरूद्ध सख्त आपराधिक कार्रवाई होने से ही भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रुक सकती है.


अधिकारियों के निलंबन की बजाय उनके वेतन से दिया जाए मुआवजा
धार्मिक आयोजनों की सफलता का श्रेय राजनेताओं द्वारा लिया जाता है पर हादसा होने पर अफसरों के निलंबन और ट्रांसफर से खानापूर्ति हो जाती है. इससे राहत और बचाव कार्यों में गतिरोध पैदा होता है और असली गुनाहगार बच जाते हैं. प्रधानमंत्री ने दो लाख तथा राज्य सरकार ने मृत व्यक्तियों के लिए पांच लाख के मुआवजे की घोषणा की है. सरकारी पैसे की बजाय अधिकारियों के वेतन से पीड़ित लोगों को मुआवजा देने से प्रशासन की कार्यकुशलता तथा जवाबदेही बढ़ेगी.   

धर्म और राजनीति के दुष्चक्र में आम जनता हलाल
सुप्रीम कोर्ट ने कई आदेशों से अवैध धार्मिक स्थानों को हटाने का आदेश दिया, जो राजनेताओं के हस्तक्षेप से अभी तक लागू नहीं हो पाया. पार्टियों से जनता का मोह भंग हो गया है, जिसके लिए चुनावों के पहले राजनेता धर्मगुरुओं की शरण में हैं. धर्म स्थानों की बेहिसाब संपत्ति की ताकत को आस्था से जोड़ कर धार्मिक-गुरु भीड़ को राजनीतिक वोट बैंक में तब्दील करते रहे हैं. बनारस में कार्यक्रम के आयोजक पंकज बाबा के मथुरा स्थित वैभवपूर्ण आश्रम में सुरक्षा के लिए बंदूकधारियों का जमावड़ा है. अधिकांश धार्मिक स्थल अपराधियों की शरणगाह बन गए हैं, जहां निर्दोष श्रद्धालु प्रशासन की उदासीनता से हादसों का शिकार होने के लिए अभिशप्त हैं.

बनारस कैसे बनेगा क्योटो
लोमहर्षक हादसे के बाद प्रशासन को पीड़ित लोगों तक पहुंचने में चार घंटे लग गए, फिर बनारस स्मार्ट सिटी और क्योटो कैसे बनेगा? विस्तृत कानून के बावजूद नेताओं द्वारा दिशा-निर्देशों की मांग से राजनीतिक तंत्र का खोखलापन भी उजागर होता है. उत्तराखंड में 2013 की त्रासदी में गायब लोगों के 50 नरकंकाल मिले हैं पर नेता चुनावी राजनीति में व्यस्त हैं. कानून को अमल में लाने के लिए देश-व्यापी दिशा-निर्देशों की आवश्यकता है, जिसका परिपालन सुनिश्चित होने तक ऐसे हादसे होते ही रहेंगे.

विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं...

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