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जीवन की अनिच्छा और मृत्यु की इच्छा के बीच

हमारी मृत्यु जन्म के साथ ही पैदा होती है, उसके पहले कोई मृत्यु नहीं होती, जीवन इस मृत्यु को पीछे धकेलता जाता है, जन्मदिन की बधाई इस बात की बधाई है.

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जीवन की अनिच्छा और मृत्यु की इच्छा के बीच
महाभारत की कथा में एक जादुई तालाब के किनारे अपने अचेत पड़े चार भाइयों को देख रहे युधिष्ठिर से यक्ष ने पूछा था, सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है. युधिष्ठिर ने कहा, सबको मालूम है कि मृत्यु अवश्यंभावी है, लेकिन सब ऐसे जीते हैं जैसे मृत्यु आनी ही नहीं है.

हमारी मृत्यु जन्म के साथ ही पैदा होती है, उसके पहले कोई मृत्यु नहीं होती, जीवन इस मृत्यु को पीछे धकेलता जाता है, जन्मदिन की बधाई इस बात की बधाई है, यह बात गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने तब कही थी जब उनसे किसी ने पूछा कि जन्मदिन की बधाई क्यों, उम्र तो एक साल घट गई.

एक इराकी कहानी और है. बगदाद में एक शख़्स अपने घर से निकला, उसने चौराहे पर अपनी मौत खड़ी देखी, वह भागता हुआ घर लौटा, उसने अपने मालिक से कहा कि उसकी मौत सामने ख़ड़ी है, वह उसे अपना घोड़ा दे दें तो वह भागकर समारा चला जाए. मालिक ने उसे घोड़ा दे दिया. कुछ देर बाद मालिक निकला तो उसे भी वही मौत ख़ड़ी दिखी. उसने पूछा, तुमने मेरे दोस्त को डरा क्यों दिया? उसे घूर क्यों रही थी? मौत ने कहा, 'मैं तो ख़ुद हैरान थी, वह यहां क्या कर रहा है. उससे तो चार घंटे बाद मेरी मुलाकात समारा में होनी थी.'

मौत से आप बच नहीं सकते. बुद्ध ने अपने बचपन में ही समझ लिया था कि बीमारी आती है, बुढ़ापा आता है और मृत्यु आती है.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों के संविधान पीठ ने जब इच्छा मृत्यु पर कुछ शर्तों के साथ मुहर लगाई तो दरअसल वे जीवन और मृत्यु के दार्शनिक संबंध या मृत्यु की अपरिहार्यता पर ही नहीं, उस सामाजिक संकट पर भी ध्यान दे रहे थे जो हमारे समाज में वृद्धों के अकेलेपन और बीमारी से पैदा हुआ है.

बूढ़ा या बीमार होना अभिशाप नहीं है, अकेला होना कहीं ज़्यादा बड़ा अभिशाप है. आप अकेले होते हैं तो बुढ़ापा कहीं ज़्यादा तेज़ी से आपका पीछा करता है. बीमारी कहीं ज़्यादा जल्दी आपको घेरती है. यह सच है कि हमारे पुराने समयों में भी ऐसे बुज़ुर्ग रहे जो घरों की उपेक्षा झेलते रहे- अकेले कोनों में बीमार पड़े रहे, लेकिन इच्छामृत्यु जैसे खयाल ने उनको नहीं घेरा.

भारतीय समाज में यह एक नई परिघटना है- ऐसे बुजुर्ग बढ़ रहे हैं जिनको अपने लिए यह इच्छामृत्यु चाहिए. निस्संदेह एक गरिमापूर्ण जीवन के गरिमापूर्ण अंत की कामना से ही यह ज़रूरत उपजी है.

लेकिन अरुणा शानबाग के जिस मामले से यह सारा प्रसंग इतना बड़ा हुआ, उसका एक और सबक है. 42 साल तक कोमा में रही अरुणा शानबाग के लिए इच्छामृत्यु की मांग वे लोग करते रहे जो उन्हें बाहर से देखते रहे. इसका विरोध उन लोगों ने किया जो उनकी देखभाल करती थीं. किंग एडवर्ड कॉलेज मुंबई की वे नर्सें अपनी एक सोई-खोई सहेली को रोज बहुत एहतियात से संभाल न रही होतीं तो वह 42 साल इस हाल में नहीं बचती. इन नर्सों ने कहा कि वे जब तक संभव होगा, अरुणा शानबाग को ज़िंदा रखेंगी. एक अपराध ने अगर अरुणा शानबाग को हमेशा-हमेशा के लिए कोमा में भेज दिया तो कुछ लोगों के सरोकार ने उनके लिए जीवन की लड़ाई लड़ी. उनके जीवन को गरिमापूर्ण बनाया. अदालत ने भी इस सरोकार का सम्मान किया था, तब परोक्ष इच्छामृत्यु के अपने फ़ैसले की छाया 40 बरस से सोई एक बेख़बर काया पर नहीं पड़ने दी थी.

दरअसल जीवन का मूल्य इसी में है. हम जितना अपने लिए जीते हैं, उतना ही दूसरों के लिए भी. दूसरों से हमारा जीवन है, हम दूसरों के जीवन से हैं. लेकिन नए समय के दबाव सबको अकेला कर रहे हैं. परिवार टूटे हुए हैं, बच्चे परिवारों से दूर हैं, मां-पिता अकेले हैं, टोले-मोहल्ले ख़त्म हो गए हैं, फ्लैटों में कटते जीवन के बीच बढ़ता बुढ़ापा एक लाइलाज बीमारी में बदलता जाता है. एक बहुत बारीक मगर क्रूर प्रक्रिया में हम सब जैसे भागीदार होते चलते हैं.

इच्छा मृत्यु इसी क्रूर प्रक्रिया से निकलने की एक लंबी आख़िरी सांस जैसी गली है. सुप्रीम कोर्ट अगर यह गली न खोलता तो वे हताशाएं और बड़ी होती जातीं जो हमारे समय में ऐसे विकल्पों को भी आजमाए जाने लायक बनाती हैं.

शायद यह फ़ैसला कुछ लोगों को याद दिलाए कि उनके अपने इतने अकेले और हताश न छूट जाएं कि अपनी मृत्यु के लिए अपना मेडिकल बोर्ड बनवाने लगें. यह बहुत सदाशय कामना है, लेकिन ऐसी ही कामनाओं के बीच जीवन की सुंदरता और सहजता बचती भी है.

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(प्रियदर्शन NDTV इंडिया में सीनियर एडिटर हैं...)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.


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