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डिजिटल इंडिया की चकाचौंध में पिछड़ा भारत...

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डिजिटल इंडिया की चकाचौंध में पिछड़ा भारत...

प्रतीकात्मक फोटो.

डिजिटल भुगतान पर जोर देने के लिए सरकार ने ढेरों रियायतें दी हैं लेकिन क्या इंडिया के साथ-साथ भारत भी इस डिजिटल पुश के लिए तैयार है? कैशलस अर्थव्यवस्था का यह लक्ष्य एक ऐसे देश में साधने की कोशिश हो रही है जहां 40 फीसदी से ज्यादा आबादी के बैंक खाते नहीं हैं. वे कैसे डिजिटल पेमेंट करेंगे? 30 करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं ...बाकियों का क्या. क्या उन्हें साक्षर नहीं होने या पिछड़े....होने की कीमत चुकानी पड़ेगी.

डिजिटल इंडिया एक अच्छा अभियान है, लेकिन देश को कैशलेस अर्थव्यवस्था में झोंकने से पहले क्या जमीन तैयार नहीं होनी चाहिए थी? जितना जोर आज अर्थव्यवस्था को कैशलेस बनाने पर दिया जा रहा है उतना जोर अगर खाने पीने की जुगाड़ पर हो जाए तो गनीमत है. आज वही पिस रहा है जिसकी पहुंच डिजिटल भारत से दूर हैं. डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड और ई-वॉलेट वाले बैंकों की लाइनों में कम हैं. जिनका नकदी के बगैर गुजारा नहीं वही बिचारे कड़कड़ाती ठंड से लेकर तेज धूप में कैश के दर्शन को तरस रहे हैं.

डिजिटल कनेक्टिविटी एक बड़ा मुद्दा है. देश में कॉल ड्राप की समस्या से तो निजात मिली नहीं उस पर पूरा पैसा डिजिटल कनेक्शन के भरोसे छोड़ हम कितने संतुष्ट रह सकते हैं? क्या देश के हर हिस्से में मोबाइल नेटवर्क और डेटा सर्विसेस का ऐसा जाल है जिसके बल पर हम ऑनलाइन पेमेंट की ओर धकेले जा रहे हैं?


जब देश के लगभग 70 सालों में हमारे बैंक ही ग्रामीण जनता के बीच जड़ें नहीं बिठा पाए तो हम किसके भरोसे भारत की जनता से डिजिटल होने की मांग कर रहे हैं, जहां गांवों में 80 फीसदी लोग बैंक खाते नहीं रखते. क्यों उनके पैसे पर बंदिशें लगाई जा रही हैं?

अमेरिका जैसे उन्नत देश भी पूरी तरह से कैशलेस नहीं हैं. ग्रामीण अमेरिका में लेनदेन कैश आधारित ही है. काले पैसे से निपटने के इस तथाकथित महायज्ञ में घुन की तरह पिस रहा है भारत...और यहां भारत से मेरा मतलब उस ग्रामीण जनता से है जो शहरों की चकाचौंध से दूर गांवों में बसती है. नकदी की कमी ने बाजारों की रंगत उड़ा दी है. शिकायत करें तो किससे? सरकार अब 10 हजार की आबादी वाले एक लाख गांवों में 2 PoS यानि पाइंट ऑफ सेल्स मशीन की बात कर रही है. लेकिन इन मशीनों की भारी कमी शहरी दुकानदारों को भी सता रही है. दुनिया के दूसरे सबसे ज्यादा आबादी वाले देश में दुनिया में सबसे कम पाइंट ऑफ सेल्स मशीनें हैं. 10 लाख लोगों पर 693 मशीनें.....तुलना कीजिए चीन से जो कि दुनिया में सबसे बड़ी आबादी वाला राष्ट्र है वहां 4000 मशीनें हर 10 लाख लोगों पर हैं और ब्राज़ील जैसे विकासशील देश में यह संख्या चौंकाने वाली है...दस लाख की आबादी पर 33000 मशीनें!

PoS मशीनें हों, डिजिटल साक्षरता हो या फिर बेहतर प्रबंधन, यह वह तैयारी है जिसकी कमी ने ग्रामीण ही नहीं शहरी भारत में भी लोगों की नाक में दम कर रखा है. क्या यह सिस्टम के भरोसे रहेंगे या हर दिन बदलते सरकारी फरमानों के भरोसे?

(ऋचा जैन कालरा  एनडीटीवी में  एंकर और एसोसिएट एडिटर हैं)

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