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राहुल गांधी का विश्लेषण करके रखने का वक्त आ गया है

स्वॉट शब्द अग्रंजी के चार अक्षरों एस डब्ल्यू ओ टी को मिलाकर बना है. इसमें हम किसी संस्था या व्यक्ति की स्ट्रैंथ यानी ताकत, वीकनॅस यानी कमजोरी, ऑपर्चुनिटी यानी मौके और आखिर में थ्रेट यानी जोखिम का विश्लेषण किया जाता है.

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राहुल गांधी का विश्लेषण करके रखने का वक्त आ गया है

राहुल गांधी अपनी मां और कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ (फाइल फोटो)

राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने का यह दूसरा दिन है. वैसे उनके पास तेरह साल का राजनीतिक अनुभव है. बहुत कुछ उनके बारे में हम जान समझ चुके हैं लेकिन सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले राजनीतिक दल के अघ्यक्ष बनने के बाद उनकी जिम्मेदारी और उनके सामने आने वाली चुनौतियां और जोखिम नए नए होंगे. राजनीतिक दल के रूप में चाहे कांग्रेस सत्ता में रहे या विपक्ष में, यह तय है कि देश के नियंता के रूप में कांग्रेस की बड़ी भूमिका को कोई नहीं नकार सकता. सो क्यों न ऐसे दल के अध्यक्ष रूप में राहुल गांधी का एक व्यवस्थित विश्लेषण करके रख लिया जाए. किसी भी दीर्घकालिक परियोजना या अभियान शुरू करने के पहले पेशेवर जगत में ऐसा विश्लेषण सबसे पहले करके रखा जाता है. इसे प्रबंधन प्रौद्योगिकी की भाषा में स्वॉट एनालिसिस कहते हैं. स्वॉट शब्द अग्रंजी के चार अक्षरों एस डब्ल्यू ओ टी को मिलाकर बना है. इसमें हम किसी संस्था या व्यक्ति की स्ट्रैंथ यानी ताकत, वीकनॅस यानी कमजोरी, ऑपर्चुनिटी यानी मौके और आखिर में थ्रेट यानी जोखिम का विश्लेषण किया जाता है.

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स्ट्रेन्थ यानी राहुल गांधी की ताकत
इसमें तो किसी को कोई शक नहीं हो सकता कि कांग्रेस की विरासत ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है. इसी आधार पर उसे समयसिद्ध साबित किया जाता है. ऐसी पार्टी ने लंबे सोचविचार के बाद उन्हें अपना अध्यक्ष चुना है तो उनकी ताकत का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है. गांधी नेहरू परिवार का सदस्य होने के नाते बचपन से अपने परिवार के विरुद्ध हिंसा के वे निकटतम चश्मदीद रहे हैं. कहा जा सकता है कि परिस्थितिवश वे माहौल से तप कर निकले व्यक्ति हैं. यह कोई कम बड़ी ताकत नहीं है. वैसे उनकी उससे भी बड़ी ताकत 13 साल का उनका राजनीतिक अनुभव है. इस दौरान उन्होंने अपनी पार्टी के सांसद और पार्टी के उपाध्यक्ष की हैसियत से राजनीति का भरपूर अनुभव हासिल कर लिया है. इस दौरान अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के सबसे ज़्यादा हमले उन्होंने ही झेले हैं. इन अनुभवों ने उन्हें भविष्य की मजबूती के लिए तैयार किया होगा. इधर नवीनतम अनुभव के रूप में गुजरात चुनाव में उन्होंने अपनी पार्टी को जिस तरह से शून्य से उठाकर लड़ने लायक बनाया है वह उनकी ताकत को साबित कर गया है. एक और ताकत. भारतीय राजनीति की मौजूदा शक्ल में एक लक्षण व्यंग और हास्यपूर्ण हमलों से निपटना है. ऐसे हमले कर पाने को भी ताकत समझा जाने लगा है और ऐसे हमलों से अप्रभावित रह पाना उससे भी बड़ी ताकत माना जाता है. राहुल गांधी ने अपने उपहास के जितने हमलों को झेलते हुए जिस तरह से संयत रहने का अभ्यास किया है वह विलक्षण सहनशीलता का उदाहरण माना जा सकता है. उन्होंने अच्छे श्रोता गुण हासिल कर लिया है. पेशेवर ज्ञान और अनुभव को देखें तो स्टीफंस, हावर्ड कैंब्रिज और टिनिटी में पढ़ाई के अलावा प्रबंधन परामर्शदात्री प्रतिष्ठान में काम के दौरान फैसले लेने की प्रक्रिया का अनुभव उनकी नई जिम्मेदारी में बहुत काम आएगा.

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वीकनेस यानी राहुल गांधी की कमज़ोरी
सन 2014 में सत्ता से बेदखल होने के कुछ पहले से संगठन के तौर पर कांग्रेस की कमज़ोरी पार्टी अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी की कमज़ोरियों में गिनाई जा सकती हैं. वैसे यह कमज़ोरी उन्हें अपने प्रदर्शन के लिए एक मौका भी मुहैया कराती है. दूसरी कमज़ोरी उनमें यह ढूंढी जा सकती है कि वह इस दौर के सबसे सनसनीखेज लक्षण घृणा और सामाजिक विघटन की बुराई का मुकाबला सांप्रदायिक प्रतिघृणा या प्रतिहिंसक तरीके से नहीं करना चाहते. इधर जनता की दिलचस्पीं ईंट का जवाब पत्थर से देते हुए देखने में बढ़ गई है. सो राहुल गांधी जनता में प्रेम, अंहिसा या सदभाव के प्रति कितना आकर्षण बढ़ा पाएंगे यह भविष्य के गर्भ में है.  सो यह सवाल सामने है कि इस दौर में आदर्शवादी तरीके से खड़ा रह पाना किस तरीके से संभव होगा? यानी राजनीति में प्रेम को कमज़ोरी की श्रेणी से निकालकर ताकत की श्रेणी में लाने की चुनौती उनके सामने है. एक और बहुत बारीक और कथित कमज़ोरी का जिक्र हो सकता है. वह है उन्हें अंतर्मुखी समझा जाना. राजनीति में इसे कमज़ोरी माना जाता है लेकिन उनमें संवेदनशीलता और आदर्शवादी के जो गुण हैं वे इस कमज़ोरी की कितनी भरपाई कर पाएंगे यह उनके आगे के विकास पर निर्भर करेगा. वैसे परिस्थितियां किसी व्यक्ति के व्यवहार और व्यक्तित्व में नया विकास भी करती हैं.

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ऑपोर्चुनिटी यानी राहुल गांधी के पास मौजूद मौके
उनके पास संगठन को नया रूप देने का सबसे बड़ा मौका है. यह मौका इस कारण से भी है क्योंकि 13 साल की सक्रिय राजनीति के बावजूद उनकी छवि अब तक पूर्वाग्रही की नहीं बनी. पार्टी में उन्होंने अपना कोई गुट नहीं बनने दिया. यह उनके पदारोहण समारोह में भी दिखा. वहां सोनिया गांधी के अलावा सिर्फ मनमोहन सिंह, मोती लाल वोरा, जनार्दन द्विवेदी और मधुसूदन मिस्त्री ही प्रमुखता से दिखे. दूसरा गौरतलब मौका  देखना चाहें तो कह सकते हैं कि किसी राजनीतिक दल को मुश्किल दौर से उबारना उसके अगुआ के लिए सबसे बड़ा मौका होता है. इस समय कांग्रेस जिस तरह से अपने इतिहास के सबसे मुश्किल दौर में दिख रही है. ऐसे समय में कांग्रेस के अध्यक्ष के तौर कुछ कर गुजरने का बड़ा मौका राहुल गांधी के पास है. कुछ विशेषज्ञ राहुल गांधी के लिए वर्तमान समय को  जोखिम का समय कह सकते हैं लेकिन उन्हें यह भी जानना चाहिए कि ये जोखिम ही मौका पैदा करते हैं. गौरतलब है कि उनके पदारोहण के दो रोज़ बाद ही गुजरात के नतीजे आने वाले हैं. सब जानते हैं कि कांग्रेस मुक्त नारे से जूझ रही कांग्रेस ने अगर गुजरात में पिछले चुनाव जैसी अपनी स्थिति को कायम रख पाया यानी 60 पैंसठ सीटें फिर ले आई तो इसका श्रेय राहुल को मिलेगा. और अगर गुजरात में पिछली बार से दस बारह सीटें ज्यादा आ गईं तो कांग्रेस कार्यकर्ताओं का हौसला दुगना बढ़ जाएगा. उससे भी अच्छा प्रदर्शन हो गया तो राहुल गांधी की अगुआई में 2019 के लिए कांग्रेस का माहौल खुद ब खुद बन जाएगा. गुजरात में कांग्रेस को अस्सी या उससे ज्यादा सीटें मिलने का मतलब होगा कि राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष की हैसियत से अपना काम बैक डेट से ही शुरू कर दिया.

VIDEO- वो तोड़ते हैं, हम जोड़ते हैं: राहुल गांधी
थ्रैट यानी जोखिम या चुनौती
वैसे तो इक्कीसवीं सदी आते आते पूरी की पूरी राजनीति ही जोखिम भरा काम हो गया है लेकिन राहुल के मामले में सिर्फ आसानी या नाकामी का ही जोखिम नहीं है. देश में जिस तरह से आक्रामक राजनीति का दौर चल रहा है उसमें अपने संगठन को नए सिरे से पुनर्जीवित करना कठिन काम लगता है. जिन परिस्थितियों में राहुल को अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी गई है वह कुछ इस किस्म की है कि प्रतिद्वंद्वी दल पूरी ताकत से कांग्रेस मुक्त देश का नारा लगाए हुए हैं. ऐसी हालत में सिर्फ खड़े रहना ही बड़ी उपलब्धि समझी जा सकती है लेकिन जोखिम यह है कि अगर  कांग्रेस की सत्ता में वापसी का माहौल बनाने में थोड़ी भी देर लगती दिखेगी तो उनके प्रतिद्वंद्वी उसका जिम्मा राहुल गांधी पर डालने से चूकेंगे नहीं. बहुत दूर की बात नहीं दो रोज़ बाद गुजरात के नतीजे अगर सर्वेक्षण एजंसियों के मुताबिक ही आ गए और कांग्रेस वहां 50 साठ सीटें ही ला पाई तो कांग्रेस के खिलाफ मुहिम चलाने वाले लोग राहुल गांधी पर  छविनाशक हमला शुरू कर देंगे. उस स्थिति में यह याद दिलाने वाला कोई नहीं आएगा कि जिस समय गुजरात चुनाव की प्रकिया शुरू हुई थी और राहुल गांधी ने प्रचार शुरू किया था तब कांग्रेस की स्थिति वहां शून्य थी.

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सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्‍त्री हैं...

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