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'आप' के 20 विधायक अयोग्य घोषित : कुछ सवाल हैं जो अपने आप में कई सवाल खड़े कर रहे हैं

राजीव गांधी  ने 1984-85 में ऑस्कर फनार्डिस और 1985-86 में अहमद पटेल को संसदीय सचिव बनाया था. जबकि दिल्ली में ही 1996 में साहिब सिंह वर्मा ने नंद किशोर गर्ग को संसदीय सचिव नियुक्त किया था और सबसे मजेदार बात ये है कि अजय माकन जो इस मामले पर विरोध प्रर्दशन कर रहे हैं को 1998 में शीला दीक्षित ने संसदीय सचिव बनाया था

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'आप' के 20 विधायक अयोग्य घोषित :  कुछ सवाल हैं जो अपने आप में कई सवाल खड़े कर रहे हैं

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ( फाइल फोटो )

नई दिल्ली:

दिल्ली में आम आदमी पार्टी  द्वारा नियुक्त 20 संसदीय सचिवों की नियुक्तियों के रद्द होने पर कई सवाल खड़े हो गए हैं. कई जानकारों का मानना है कि इस निर्णय से बचा जा सकता था. संसदीय सचिवों की नियुक्ति का मामला कोई नया नहीं है राजीव गांधी  ने 1984-85 में ऑस्कर फनार्डिस और 1985-86 में अहमद पटेल को संसदीय सचिव बनाया था.. जबकि दिल्ली में ही 1996 में साहिब सिंह वर्मा ने नंद किशोर गर्ग को संसदीय सचिव नियुक्त किया था और सबसे मजेदार बात ये है कि अजय माकन जो इस मामले पर विरोध प्रर्दशन कर रहे हैं को 1998 में शीला दीक्षित ने संसदीय सचिव बनाया था. ऐसा नहीं है कि केवल दिल्ली सरकार ने ही संसदीय सचिवों को नियुक्त किया है बाकी राज्य भी इसमें पीछे नहीं हैं.

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कनार्टक में 10 संसदीय सचिव हैं जिनको राज्य मंत्री का दर्जा मिला हुआ है यानी राज्य मंत्री की तरह ही इन्हें वेतन और भत्ता मिलता है. राजस्थान में भी 10 संसदीय सचिव हैं उन्हें भी वेतन और भत्ता मिलता है.अरूणाचल प्रदेश में तो 23 संसदीय सचिव हैं उन्हें भी सारी सुविधांए मिलती हैं. पश्चिम बंगाल में भी 24 संसदीय सचिवों की नियुक्ति की गई थी मगर हाईकोर्ट ने इसे गलत करार देते हुए इनकी नियुक्तियों को रद्द कर दिया. तेलंगाना में भी 6 संसदीय सचिव बनाए गए थे मगर अदालत ने  उनकी नियुक्ति रद्द कर दीं.ओडीसा में 20 विधायकों को जिला योजना समिति का अध्यक्ष बनाया गया है और उन्हें राज्य मंत्री का दर्जा हासिल है. अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि जब कुछ जगहों पर संसदीय सचिवों की नियुक्तियों को अदालत रद्द कर रही है तो दिल्ली के विधायकों की सदस्यता को चुनाव आयोग क्यों गलत ठहरा रहा है. तीसरे चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने खुद को इस मामले की सुनवाई से अलग कर लिया था. जैदी के रिटायर होने के बाद नियुक्त नये आयुक्त सुनील अरोड़ा ने इस बारे में कोई सुनवाई नहीं की तो क्या यह माना जाए कि यह केवल मुख्य चुनाव आयुक्त जोति का ही फैसला है और वो भी रिटायरमेंट के दिन.

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ये कुछ सवाल हैं जो अपने आप में कई सवाल खड़े कर रहे हैं. अब मामला अदालत में कानूनी और जनता दोनों की अदालत में है. आम आदमी पार्टी को लगता है कि उसे दोनों जगह सफलता मिलेगी.अदालत में तो उनका केस मजबूत है मगर जनता की अदालत यह तय करेगी कि केजरीवाल का जादू अभी बरकरार है या नहीं क्योंकि 20 सीटों पर चुनाव कोई कम नहीं होता यह एक मिनी मध्याविधि चुनाव होगा.

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सब दलों की नजर इस बेमौके आए मौके पर टिकी हुई है कांग्रेस और बीजेपी को लगता है कि यही मौका है कुछ कर जाने का. सीटें जिसको जितनी मिले मगर चुनाव आयोग के इस फैसले की मिसाल सालों तक दिया जाएगा.

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(मनोरंजन भारती एनडीटीवी इंडिया में सीनियर एक्जीक्यूटिव एडिटर - पॉलिटिकल, न्यूज हैं)

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