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बजट और दृष्टिपत्र का फर्क...?

बजट जैसा दस्तावेज एक साल की निकटगामी आर्थिक योजना का दस्तावेज ही होता है. लेकिन इस साल यह दूरगामी दृष्टि वाला, यानी एक विज़न डाक्यूमेंट जैसा ही नज़र आया. बौद्धिक जगत में इस नई राजनीतिक प्रवृत्ति पर भी गौर होना चाहिए.

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बजट और दृष्टिपत्र का फर्क...?

इस बजट ने वाकई चक्कर में डाल दिया. विश्लेषक तैयार थे कि इस दस्तावेज की बारीकियां समझकर सरल भाषा में सबको बताएंगे, लेकिन बजट का रूप आमदनी खर्चे के लेखे-जोखे की बजाय दृष्टिपत्र जैसा दिखाई दिया. यह दस्तावेज इच्छापूर्ण सोच का लंबा-चौड़ा विवरण बनकर रह गया. बेशक बड़े सपनों  का भी अपना महत्व है. आर्थिक मुश्किल के दौर में 'फील गुड' की भी अहमियत होती है, लेकिन बजट में सपनों या बहुत दूर की दृष्टि का तुक बैठता नहीं है. पारंपरिक अर्थों में यह दस्तावेज देश के लिए एक साल की अवधि में आमदनी और खर्चों का लेखा-जोखा भर होता है. हां, इतनी गुंजाइश हमेशा रही है कि इस दस्तावेज में कोई यह भी बताता चले कि अगले साल फलां काम पर इसलिए ज्यादा खर्च किया जा रहा है, क्योंकि ऐसा करना आने वाले सालों में देश के लिए हितकर होगा. फिर भी बजट जैसा दस्तावेज एक साल की निकटगामी आर्थिक योजना का दस्तावेज ही होता है. लेकिन इस साल यह दूरगामी दृष्टि वाला, यानी एक विज़न डाक्यूमेंट जैसा ही नज़र आया. बौद्धिक जगत में इस नई राजनीतिक प्रवृत्ति पर भी गौर होना चाहिए.

बजट का नया रूप-रंग...
रूप-रंग और उपयोगिता पर एक साथ नज़र रखना वास्तुशास्त्र का विषय है. वास्तुकला के विद्यार्थी फॉर्म और फंक्शन के बीच के संबंधों को बारीकी से जानते हैं. वे अच्छी तरह समझते हैं कि पहले उपयोगिता है और उसी हिसाब से सुंदर रूप बनाया जाएगा. यहां इस साल के बजट में बजट का रूप-रंग बदलने की कवायद दिखी. उसे पुराने ज़माने के बहीखाते की शक्ल और रंग में बदला गया. बेशक शृंगार का भी अपना महत्व है. और बेशक मौजूदा सरकार राजनीतिक रूप से प्राचीनता के प्रति आस्थावान है, लेकिन पिछले 70 साल में भी एक परंपरा बन गई थी. बहरहाल, रूप-रंग बदलने से कम से कम बजट का वास्वविक लक्ष्य नहीं बदलना चाहिए था.


फंक्शन यानी उपयोगिता...
लोकतांत्रिक देश के बजट का बड़ा सीधा-सा फंक्शन है. यह ध्यान रखना कि देश में आर्थिक समानता का लक्ष्य जरूर सधे. इसीलिए बजट का अच्छा या बुरापन जांचने का पैमाना बनता है कि अमीरों से कितना लिया गया और उसमें से गरीबों को कितना दिया गया. कई बार यह तर्क दिया जाने लगता है कि अमीरी बढ़ेगी तो अमीरी का घड़ा पूरा भरने के बाद उसमें से अमीरी छलककर नीचे गरीबों तक पहुंचेगी. इस टिकिल डाउन थ्योरी के पक्षधर अर्थशास्त्री इस समय पूरी दुनिया में छाए हुए हैं. वे सिर्फ किसी देश की खुशहाली को GDP, यानी अर्थव्यवस्था के आकार से यानी देश की कुल अमीरी से नापते हैं. उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसी अमीर देश में सिर्फ एक फीसदी अमीर ही हैं या सभी नागरिकों के बीच अमीरी का वाजिब बंटवारा है. बहरहाल, इस बजट का सबसे बड़ा लक्ष्य यह दिखाई दे रहा है कि पांच साल बाद देश की अर्थव्यवस्था पांच ट्रिलियन डॉलर की हो जाए, और भारत भी अमीरों वाले देशों की सूची में आ जाए. हो सकता है, इस दूरगामी लक्ष्य का कोई तात्कालिक राजनीतिक लाभ भी हो.

पांच ट्रिलियन डॉलर का आकर्षण...
कहने को तो इस रकम को भारतीय मुद्रा के नाम से भी कहा जा सकता था. बल्कि राष्ट्रीयता के भाव में अपनी मुद्रा के नाम से कहा भी जाना चाहिए, यानी लगभग साढ़े तीन सौ लाख करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था. और तब हिसाब लगाने में आसानी भी हो जाती कि अगर आठ-नौ फीसदी की आर्थिक वृद्धि और चार-पांच फीसदी की महंगाई चलती रही, तो पांच साल में देश की अर्थव्यवस्था का यह साढ़े तीन सौ लाख करोड़ का आंकड़ा अपने आप ही बन जाएगा. यानी इस बजट में क्या यह कहना ही काफी नहीं था कि सरकार आठ-नौ फीसदी आर्थिक वृद्धि की धारणा लेकर चल रही है. सनद रहे, अर्थशास्त्रियों का ही एक तबका यह मानकर चलता है कि किसी देश की आर्थिक वृद्धि उस देश में औसत नागरिक की खुशहाली की गारंटी नहीं होती. रोजगारविहीन आर्थिक वृद्धि हम देख ही रहे हैं. कुल मिलाकर बजट के विश्लेषण में ऐसी सैद्धांतिक बातें भी दोहराई जानी चाहिए. देश के मौजूदा हालात में तो इन सैद्धांतिक बातों को तसल्ली से बैठकर दोहराने की ज्यादा ही जरूरत नज़र आ रही है.

बजट में बजट वाला भाग...
इस भाग में अगले एक साल की अनुमानित आमदनी और खर्चे का हिसाब है. पहले से पता है कि ज्यादा खर्च करेंगे तो लोगों तक ज्यादा सुविधाएं पहुंचेंगी. लेकिन खर्च उतना ही किया जा सकता है, जितने पैसे का पहले से इंतजाम हो. इसीलिए किसी भी बजट का सबसे बड़ा मकसद ज्यादा से ज्यादा राजस्व जमा करना होता है. ज्यादा पैसे का इंतजाम टैक्स बढ़ाए बिना या दूसरे ज़रियों से आमदनी बढ़ाए बगैर हो नहीं सकता. ऐसा करने से वे संपन्न लोग नाराज़ होते हैं, जिनसे पैसा लिया जाता है. इस बजट में इस नाराज़गी को मोल नहीं लिया गया. दिखाने के लिए ढाई करोड़ से लेकर पांच करोड़ सालाना आमदनी वालों पर अतिरिक्त कर ज़रूर लगा दिया गया. लेकिन उनसे उतनी वसूली फिर भी नहीं हो सकती थी, जो इतने बड़े देश में जरूरी कामों पर खर्च करने के लिए काफी हो.

बड़ी कंपनियों के मुनाफे पर जरूर टैक्स बढ़ाया जा सकता था, लेकिन इस तबके की नाराज़गी भी राजनीतिक तौर पर सरकार को नुकसान पहुंचा सकती है. सो, ढाई सौ करोड़ से पांच सौ करोड़ आमदनी वाली कंपनियों पर कॉरपोरेट टैक्स घटाया गया है. यानी संपन्न तबके से पैसा लेने में इस बजट में परहेज किया गया. उस तबके को चुना गया, जो संख्या में बहुत बड़ा है. वह तबका था - डीजल-पेट्रोल इस्तेमाल करने वाली बड़ी आबादी. तेल पर टैक्स बढ़ाने से कोई 28,000 करोड़ सालाना वसूली इस बजट में है. जबकि पहले से ही इन उपभोक्ताओं पर टैक्स का भारी बोझ लदा हुआ था. लेकिन पैसे तो चाहिए ही थे. हालांकि इस बोझ का झटका धीरे से लगा है.

इधर सरकार को दूसरी बार सत्ता में लाई जनता देशहित में बलिदान के लिए फिलहाल तैयार है ही. लेकिन अगर इस साल सरकार के अनुमानित राजस्व को देखें, तो वह पिछले साल की तुलना में फिर भी कोई खास नहीं बढ़ा है. चौबीस लाख 42 हजार से बढ़ाकर 27 लाख 86 हजार करोड़ का बजट ही बना पाने का मतलब है कि सिर्फ 12 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. किसी सालाना बजट में सिर्फ 12 फीसदी की बढ़ोतरी बहुत ही मामूली मानी जाती है. इससे यथास्थिति बनाए रखना भी मुश्किल पड़ता है. आमतौर पर चुनावी साल में ही सरकारें अपनी आमदनी का बलिदान करती हैं. और आगे के साल में ज्यादा राजस्व वसूलती हैं. यह सवाल गौरतलब है कि चुनाव निकलने के बाद भी सरकार संपन्न तबके से ज्यादा उगाही करने से बचती क्यों दिखी.

अगर बजट आकार बढ़ा होता...
बजट आकार बढ़ा होता, तो सरकार के वादे के मुताबिक कृषि क्षेत्र में एक साल में, यानी इसी साल में पांच लाख करोड़ सरकारी निवेश का आश्वासन पूरा होता दिखाया जा सकता था. अगर आमदनी का इंतजाम कर लिया गया होता, तो पांच साल में इन्फ्रास्टक्चर के लिए 100 लाख करोड़ की बात करते समय निजी क्षेत्र की पनाह में जाने की बात न करनी पड़ती. और तब शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरे सामाजिक क्षेत्र के काम बढ़ाने का जिक्र इस बजट में जरूर हो पाता.

क्या उद्योग व्यापार को बढ़ावा देने के लिए...?
सरकार का तर्क भी यही है. जहां यह माना जा रहा हो कि औद्योगिक विकास ही सभी नागरिकों के सुख की गारंटी है, वहां औद्योगिक विकास की विवादास्पद परिकल्पना को सही भी ठहराया जा सकता है. लेकिन पिछले पांच साल का अनुभव बता रहा है कि मौजूदा विकास के बावजूद रोजगार तक पैदा नहीं हो पा रहा है. धन का ध्रुवीकरण हो रहा है. देश में निचले स्तर पर गरीबी बढ़ रही है. इतना ही नहीं, उद्योग और सेवा क्षेत्रों के विकास पर ज्यादा जोर से कृषि क्षेत्र भारी संकट में घिर गया है. देश के खेतों में पानी के लिए हाहाकार बढ़ता जा रहा है. यानी इस बजट में पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के दूरगामी लक्ष्य की बजाय खेती और पानी के निकटगामी लक्ष्य की ज्यादा जरूरत सिद्ध की जा सकती है. हां, इसे हर कोई मानेगा कि खेती, किसान, गांव और बेरोज़गारी के समाधान के लिए भारी रकम की जरूरत थी. यह रकम बजट का आकार बढ़ाकर ही संभव था, जिसे संभव नहीं बनाया जा सका.

बहरहाल, इस बार के बजट को ज्यादा दार्शनिक बनाए जाने की मजबूरी को समझना मुश्किल नहीं होना चाहिए.

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सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्‍त्री हैं...

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