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प्राइम टाइम इंट्रो : सरकारी विभागों की पोल खोलती सीएजी रिपोर्ट

1985 से भारत में फसलों के लिए बीमा योजना को लेकर प्रयोग हो रहे हैं. 2016 में जब प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू हुई तो इसका खूब प्रचार हुआ. कुछ शर्तें तो पहले से काफी अच्छी हैं भी. मगर इसके बाद भी सीएजी की रिपोर्ट पढ़ने से यही लगता है कि इस योजना का कोई माई बाप नहीं है.

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प्राइम टाइम इंट्रो : सरकारी विभागों की पोल खोलती सीएजी रिपोर्ट
भारत के नियंत्रक महालेखापरीक्षक, सीएजी की रिपोर्ट की अजीब स्थिति है. सरकारी पक्ष नहीं चाहता कि इस रिपोर्ट को कोई और देख ले, विपक्ष नहीं देख पाता क्योंकि इस रिपोर्ट में उनकी सरकारों के बारे में भी टिप्पणियां होती हैं. सीएजी की रिपोर्ट से गुज़रते हुए आप तमाम विभागों की हालत तमाम राज्यों में समझ सकते हैं. कहीं रिकॉर्ड ही नहीं रखा जाता, कहीं ज़्यादा पेमेंट हो गया तो कहीं किसानों को वाजिब हक न मिले इसके लिए बैंकों ने ही जानबूझ कर देरी कर दी. सीएजी की रिपोर्ट को अपने ख़ाली वक्त में पढ़ना चाहिए. इससे पता चलेगा कि महंगे विज्ञापनों में जो दावे किये जाते हैं उनके पीछे का खेल क्या है. फ़सल बीमा योजनाओं पर सीएजी की रिपोर्ट देखनी चाहिए. इस रिपोर्ट से पता चलता है कि किसानों के लिए योजनाओं के ऐलान और उनके ज़मीन पर उतरने में कितने आसमानों का फर्क है.

1985 से भारत में फसलों के लिए बीमा योजना को लेकर प्रयोग हो रहे हैं. 2016 में जब प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू हुई तो इसका खूब प्रचार हुआ. कुछ शर्तें तो पहले से काफी अच्छी हैं भी. मगर इसके बाद भी सीएजी की रिपोर्ट पढ़ने से यही लगता है कि इस योजना का कोई माई बाप नहीं है. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किसान प्रीमियम का एक हिस्सा देते हैं बाकी हिस्सा केंद्र और राज्य सरकार मिलकर देते हैं. इसके लिए प्राइवेट बीमा कंपनियां भी हैं और एक सरकारी एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी एआईसी भी है. सरकार तो एआईसी को पैसा दे देती है, अब एआईसी का काम है कि वो प्राइवेट बीमा कंपनियों को पैसा पकड़ाए ताकि वो आगे किसानों को बीमा दे सकें. इन कंपनियों को बिना किसी गाइडलाइन की शर्तों को पूरा किये हुए कैसे हज़ारों करोड़ रुपये दे दिये गए. क्या कोई आम किसान इन प्राइवेट बीमा कंपनियों से पूछ सकता है कि उसके हिस्से का या उसके इलाके का बीमा किस किस को मिला.

सीएजी ने 2011-12 से लेकर 2015-16 के बीच फसल बीमा योजना की समीक्षा की है. जो नतीजे सामने आए हैं उससे यही लगता है कि यह योजना किसानों के लिए होते हुए भी उनके लिए नहीं है. अगर होती तो फिर सीएजी को क्यों कहना पड़ा कि तीन दशक से बीमा योजनाएं हैं फिर भी बहुत कम किसान इनके दायरे में आए हैं. बहुत ही कम छोटे और सीमांत किसान फ़सल बीमा के कवरेज में आ सके हैं. एससी/एसटी किसानों के बीमा के लिए भी प्रावधान है मगर उनका कोई डेटा नहीं है. स्कीम उन्हीं किसानों के लिए है जो खेती के लिए कर्ज़ लेते हैं. कई बार किसान खेती के कर्ज़ का बीमा कराते हैं, फसल की नहीं. बैंक किसानों को बीमा प्रावधानों के बारे में नहीं बताते हैं. किस किसान का बीमा हुआ है, उसका डेटा न केंद्र सरकार के पास है न राज्य सरकार के पास. यहां तक कि बीमा कंपनी एआईसी भी नहीं रखती है. गाइडलाइन में डेटा रखने की बाध्यता क्यों नहीं जोड़ी गई है. आजकल डिजिटल इंडिया और डेटा इंडिया की ही बात होती है लेकिन हज़ारों करोड़ों की फसल बीमा योजना के तहत किस किसान का बीमा हुआ है उसका कोई डेटा ही नहीं है. यह सुविधा किसानों के लिए है या किसी और के लिए.

रिपोर्ट में कहा गया है कि फसल की बुवाई कितने एरिया में हुई और बीमा कितने एरिया का हुआ दोनों में अंतर देखा गया है महाराष्ट्र के एक तालुका में 2015 के खरीफ सीज़न में 51,397 हेक्टेयर ज़मीन में धान की बुवाई हुई जबकि बीमा कवर का एरिया दिखाया गया 1,11,615 हेक्टेयर, बुवाई से भी दुगना. सीएजी का मानना है कि डबल बीमा लिये जाने की संभावना के संकेत मिलते हैं. इसके लिए बीड ज़िले की तीन तालुकाओं के बैंक रिकॉर्ड को पलटा गया. पता चला कि किसानों को एक ही फसल का बीमा दो-तीन बार मिला.

सीएजी का कहना है कि राज्य सरकारों के दिए गए डेटा पर भरोसा नहीं किया जा सकता है. योजना की निगरानी के लिए कोई प्रभावशाली मेकनिज़्म नहीं है. जब निगरानी नहीं है, डेटा है नहीं और जो है उसमें अंतर है तो फिर बचा क्या. क्या यही कहना रह गया कि हो सकता है कि बड़े स्तर पर हेराफेरी हो रही है.

अगर बीमा की राशि से कम दावा लिया गया तो बची हुई राशि का क्या होगा इसकी कोई गाइडलान नहीं है. 2011-16 के दौरान एआईसी ने 10 बीमा कंपनियों को 3,622 करोड़ रुपये जारी कर दिये. इसके लिए गाइडलाइन की शर्तों की परवाह भी नहीं की गई और कारण बताने में असफल रही. एआईसी ने सुनिश्चित नहीं किया कि बैंकों को यूटिलाइज़ेशन सर्टिफिकेट देना ही होगा.

ये उस स्कीम की हालत है जिसके नाम के आगे प्रधानमंत्री जुड़ा हुआ है और देश की राजनीति जिससे दिन रात प्रभावित होती रहती है. फसल बीमा योजना के तहत सरकार कई हज़ार करोड़ प्राइवेट बीमा कंपनियों को प्रीमियम की सब्सिडी देती है. प्राइवेट कंपनियां किसानों को दे रही हैं या नहीं इसकी जांच के लिए ऑडिट का कोई प्रावधान ही नहीं रखा गया है. कई बार बैंक भी किसानों का डेटा देने में देरी करते हैं. कभी खाता नंबर गलत निकल जाता है तो कभी खाता नंबर गलत दे दिया जाता है. बैंक काम का दबाव बताते हैं. ये सब सीएजी ने जांच के बाद अपनी रिपोर्ट में कहा है.

महाराष्ट्र के चार ज़िलों में 9 बैंकों ने किसानों के दावों का 72 करोड़ रुपया रोक लिया. एक कोऑपरेटिव बैंक ने 101 करोड़ के दावे बांट देने का सर्टिफिकेट भी दे दिया जबकि 98 करोड़ ब्रांच के खाते में ही पड़े रहे.

भारतीय रेल को मोदी सरकार के काबिल मंत्रियों में से एक सुरेश प्रभु चलाते हैं लेकिन सीएजी ने भारतीय रेल के लिए टिकट बुकिंग, पर्यटन से लेकर खान-पान तक का ज़िम्मा संभालने वाली IRCTC के काम और क्वॉलिटी की जो ऑडिट रिपोर्ट दी है वो काफी गंभीर है. सोचना पड़ रहा है कि सुरेश प्रभु के रेल मंत्री रहते ये सब हो रहा है जिन्हें अच्छा माना जाता है तो फिर यह कैसे मुमकिन है कि ज़ोनल रेलवे को हर स्टेशन और ट्रेनों में केटरिंग सेवाओं का मास्टर प्लान बनाकर देना था लेकिन सात ज़ोनल रेलवेज़ ने ये ब्लू प्रिंट बनाकर नहीं दिया. नीति बनी कि ट्रेन की पैंट्री कार में गैस के बर्नर नहीं होंगे, सबको इलेक्ट्रिक किया जाएगा, इसके बावजूद इंटिग्रेटेड कोच फैक्टरी ने अप्रैल 2011 से मार्च 2016 के बीच एलपीजी सिलेंडर वाली 103 पैंट्री कार बनाकर ज़ोनल रेलवे को दीं. 115 बेस किचन रेलवे परिसरों के बाहर थे जहां गुणवत्ता की जांच की कोई सुविधा नहीं थी. 74 स्टेशनों में से 46 में जन आहार केंद्र ही नहीं थे जबकि रेलवे बोर्ड ने ज़ोनल रेलवेज़ को किफायती दामों में खाना उपलब्ध कराने के लिए जन आहार केंद्र बनाने के आदेश दिए थे. 74 स्टेशनों और 80 ट्रेनों की संयुक्त जांच से पता चला कि केटरिंग यूनिट्स में साफ़ सफ़ाई नहीं रखी गई थी. नल के पानी का ही इस्तेमाल खाने पीने के सामान में हुआ. डस्टबिन खुले हुए थे और उनमें काफ़ी गंदगी भरी थी. खाने-पीने के सामान को मक्खियों, कीड़ों, धूल, चूहों और कॉक्रोच वगैरह से बचाने के लिए ढक कर नहीं रखा गया था.

ट्रेनों और स्टेशनों में खाने-पीने के सामान की बिक्री में काफ़ी धांधली हो रही है, ट्रेन की मोबाइल यूनिट्स में ख़रीदे गए खाने-पीने के सामान के बिल नहीं दिए जा रहे थे. खाद्य सामग्री तय मात्रा से कम दी जा रही थीं. बिना मंज़ूरी के घटिया क्वॉलिटी का पीने का पैकेज्ड पानी बेचा जा रहा था. ये भी कहा गया है कि कई बार खाने की क्वॉलिटी ऐसी नहीं थी कि वो किसी इंसान को दी जाए, खाने-पीने का दूषित या एक्सपायरी डेट वाला सामान यात्रियों को दिया जा रहा था. सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि यात्रियों से सुपरफास्ट रेल के लिए 11 करोड़ सरचार्ज तो वसूल लिया गया मगर कुछ सुपर फास्ट रेलगाड़ियां 95 फीसदी लेट चलती रहीं.

अब आते हैं जन स्वास्थ्य पर. गांव के लोगों के स्वास्थ्य के लिए 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) की शुरुआत हुई थी ताकि पैदा होने के वक्त बच्चे और मां की होने वाली मौत को रोका जा सके. सीएजी ने 2011 से मार्च 2016 तक का हिसाब किताब किया है. इस योजना की भी पोल खुलती नज़र आ रही है. 27 राज्यों ने इस मद का पैसा खर्च ही नहीं किया. 2011-12 में यह रकम 7,375 करोड़ थी जो 2015-16 में बढ़कर 9509 करोड़ हो गई. 6 राज्य ऐसे हैं जहां 36.31 करोड़ की राशि किसी और योजना में लगा दी गई. जिन योजनाओं का संबंध गरीब औरतों और नवजात से है उन योजनाओं का पैसा भी सात हज़ार करोड़ और नौ हज़ार करोड़ खर्च नहीं होगा तो क्या माना जाए. क्या ये योजनाएं कागज़ पर ही घूमफिर कर वापस दिल्ली या राज्यों की राजधानी में लौट आती हैं.

बिहार, झारखंड, सिक्किम, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल में प्राइमरी हेल्थ सेंटर, कम्युनिटी हेल्थ सेंटर अब भी 50% कम हैं. सैकड़ों ऐसे स्वास्थ्य केंद्र हैं जो गंदे हालात में काम कर रहे हैं. 20 राज्यों में 1285 प्रोजेक्ट काग़ज़ों में पूरे हो चुके हैं मगर असलियत में शुरू भी नहीं हुए हैं. 17 राज्य हैं जहां 30 करोड़ की अल्ट्रासाउंड, एक्स रे, इसीजी जैसी मशीनें पड़ी हुई हैं. वहां मेडिकल स्टाफ नहीं है, रखने की जगह तक नहीं है.

क्या आपको लगता नहीं कि जनता के साथ मज़ाक हो रहा है. 27 राज्यों के लगभग हर स्वास्थ्य केंद्र में 77 से 87 फीसदी डॉक्टरों की कमी है. जब डॉक्‍टर ही नहीं हैं तब सरकारें ऐसा विज्ञापन क्यों नहीं बनाती हैं कि हम योजना तो बना रहे हैं मगर पहुंचा नहीं रहे हैं. बग़ैर डॉक्टर के लिए एनआरएचएम का पैसा कैसे खर्च हो रहा होगा. 13 राज्यों में तो 67 स्वास्थ्य केंद्र मिले जहां पर कोई डॉक्टर ही नहीं था. एनिमिया शरीर में आयरन की कमी की बीमारी है और महिलाओं और बच्चों में एनिमिया के मामले में भारत दुनिया में टॉप पर है. प्रसव के दौरान मरने वाली पचास फीसदी माएं एनिमिया के कारण मरती हैं. इसके बाद भी सीएजी ने सभी राज्यों के प्राथमिक केंद्रों में पाया कि आयरन टैबलेट दी ही नहीं जा रही हैं. एनआरएचएम सेंटर में गर्भवती महिला को सौ फौलिक एसिड टैबलेट देनी होती है. ऑडिट में पाया गया कि सभी 28 राज्यों में 3 से 75 फीसदी की कमी मिली यानी टैबलेट दिए ही नहीं गए. अरुणाचल, जम्मू कश्मीर, मणिपुर, मेघालय में 50 फीसदी गर्भवती महिलाओं को टेटनस का टीका भी नहीं लग सका.

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सीएजी ने गुजरात में 3 जनरल अस्पतालों की जांच की. नडियाड जनरल अस्पताल में आप्रेशन थियेटर तो है लेकिन ऑपरेशन के पहले और बाद मरीज़ को रखने के लिए कमरे नहीं हैं. अगर आप सीधे मरीज़ को ऑपरेशन थियेटर में ले जाएं, वहां से सीधे वार्ड में तो उसे इंफेक्शन होने का खतरा बढ़ जाता है. इसी अस्पताल में जगह की कमी के कारण लैब का काम भी मरीज़ों के वेटिंग एरिया में ही चल रहा था. गोधरा के जनरल अस्पताल में 440 बिस्तर की ज़रूरत है लेकिन 210 ही होने के कारण मरीज़ ज़मीन पर मिले. झारखंड में 17 प्राइमरी हेल्थ सेंटर की इमारत ही नहीं है. 5 ज़िला अस्पतालों में 32 स्पेशल ट्रीटमेंट सुविधाओं में से 6 से 14 सुविधाएं ही उपलब्ध थीं. यानी जितनी बीमारी का इलाज होना चाहिए, नहीं हो रहा है. केरल की 1100 से अधिक सीएसची और पीएचसी में सिर्फ 23 में डिलीवरी की सुविधा है. बिहार में जननी सुरक्षा योजना के तहत 40 फीसदी योग्य महिलाओं को नहीं दिये गए.

ऑडिट में पता चला कि 15 राज्यों के सालाना अकाउंट में भी काफी गड़बड़ियां हैं. रसीदों में, खर्चों में कम-ज़्यादा दिखाया गया है, हिसाब भी ठीक से नहीं रखा गया है. अपने निष्कर्ष में कैग ने लिखा है कि केंद्र और राज्यों दोनों ने पैसे को खर्च करने के मामले में संतोषजनक काम नहीं किया है. सीएजी की रिपोर्ट से नज़रें चुराने से कोई लाभ नहीं. बेहतर है बात हो और सिस्टम को पारदर्शी बनाने के साथ साथ ज़मीन पर उतारने की कोशिश हो.


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