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नागरिकता कानून क्‍यों डराता है?

दरअसल यह बात बिल्कुल समझ से बाहर है कि अगर सरकार का कोई सांप्रदायिक इरादा नहीं था तो वह अभी और ऐसा क़ानून लेकर क्यों आई. इसकी क्या ज़रूरत थी.

नागरिकता कानून क्‍यों डराता है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह बार-बार दुहरा रहे हैं कि नागरिकता क़ानून का असर किसी भारतीय नागरिक पर नहीं पड़ेगा. तथ्य के तौर पर यह बात सही भी है. जो क़ानून बनाया गया है, वह तीन देशों- पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के उन अल्पसंख्यक घुसपैठियों के लिए है जो 2014 से पहले भारत आ गए हैं. इसका कोई वास्ता यहां रहने वाले अल्पसंख्यकों से नहीं है.

लेकिन यह मोटी सी बात लोगों को समझ में क्यों नहीं आ रही है? प्रधानमंत्री के मुताबिक ये लोग क्यों विपक्ष के बहकावे में आ जा रहे हैं? क्योंकि इस क़ानून में- और इसके आगे पीछे बने और बदले गए कुछ और क़ानूनों में- कुछ ऐसा है जो एक समुदाय के भीतर सौतेलेपन का एहसास भर रहा है. आख़िर पहली बार भारत में नागरिकता देने के प्रावधानों को धार्मिक पहचान से जोड़ा गया है और बाकायदा नाम लेकर एक समुदाय को इससे अलग रखा गया है.

दरअसल यह बात बिल्कुल समझ से बाहर है कि अगर सरकार का कोई सांप्रदायिक इरादा नहीं था तो वह अभी और ऐसा क़ानून लेकर क्यों आई. इसकी क्या ज़रूरत थी. सरकार की दलील है कि वह पड़ोसी देशों में धार्मिक आधार पर उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों के लिए नागरिकता का रास्ता बना रही है. लेकिन क्या इस क़ानून के बिना इन लोगों के लिए नागरिकता का रास्ता खुला नहीं है? सच तो यह है कि मौजूदा कानूनों के तहत ही ऐसे अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता लगातार प्रदान की जा रही है. बीते हफ़्ते राज्यसभा एक प्रश्न का उत्तर देते हुए गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने जानकारी दी कि 2016 से 2018 के बीच कुल 1988 लोगों को भारत की नागरिकता प्रदान की गई. इनमें 1595 पाकिस्तान से आए प्रवासी हैं और 391 अफ़गानिस्तान से. यही नहीं, 2019 में भी 712 पाकिस्तानी और 40 अफ़गान लोगों को भारत की नागरिकता प्रदान की गई. यानी ज़्यादा से ज़्यादा इस प्रक्रिया को तेज़ करने की ज़रूरत थी.

हैरानी की बात यह है कि सरकार ने क़ानून तो बना दिया, लेकिन उसे ठीक से नहीं पता कि इसका लाभ कितने लोगों को मिलेगा. फिलहाल जो टूटे-फूटे आंकड़े सामने आ रहे हैं- सरकार की ओर से जारी दीर्घावधिक वीज़ा की मार्फ़त- उससे लगता नहीं कि कुछ लाख लोगों से ज़्यादा को इस क़ानून का फ़ायदा मिलना है. सवा अरब की आबादी के लिहाज से ये एक बहुत मामूली संख्या है.

तो अगर सरकार किसी इरादे से संचालित नहीं थी तो उसने इतना बड़ा क़दम क्यों उठाया? क्या इसलिए कि अपने हिंदू प्रेम में उसने तथ्यों से भी आंख मूंद ली? संसद में गृह मंत्री ने कहा कि विभाजन के समय पाकिस्तान में 23 फ़ीसदी से ज़्यादा हिंदू थे. वे घटकर तीन फ़ीसदी से नीचे चले आए. क्या यह बात सही है? इस मामले में हिंदी के युवा बौद्धिक और लेखक हिमांशु पंड्या ने विस्तार में लिखा है. उनका कहना है कि 1947 में जनगणना नहीं हुई थी. 1941 में जो जनगणना हुई थी, उसके मुताबिक पाकिस्तान में 22 फ़ीसदी अल्पसंख्यक थे. लेकिन 1947 में आबादी इस हद तक इधर-उधर हुई कि पुरानी जनगणना बेमानी हो गई. विकिपीडिया के मुताबिक 1951 की जनगणना में पाकिस्तान की आबादी में हिंदू आबादी का अनुपात 12.3% का है. लेकिन इसका बड़ा हिस्सा पूर्वी पाकिस्तान- यानी मौजूदा बांग्लादेश में है. बांग्लादेश में 28 फ़ीसदी से ज़्यादा गैरमुस्लिम हैं तो पश्चिमी पाकिस्तान में सिर्फ़ 2.6%.
दिलचस्प यह है कि अगले 40 साल में यह आबादी बढ़ती है- हिंदू आबादी में एक फ़ीसदी से ज़्यादा का उछाल आता है.

लेकिन हमारी सरकार बस इतना बताती है कि 1947 में पाकिस्तान में हिंदू 23 फीसदी थे जो अब घट कर 3 फीसदी से कम रह गए हैं. नागरिकता संशोधन क़ानून इस अकेले झूठ की बुनियाद पर टिका हुआ नहीं है. इसमें और झूठ भी शामिल हैं. मसलन सरकार बार-बार यह याद दिला रही है कि मुसलमान तो किसी भी देश में जा सकते हैं, हिंदुओं के लिए कोई और देश नहीं है? इस मामले में सच्चाई क्या है? अगर किसी एक देश के नागरिक सबसे ज़्यादा प्रवासी हैं तो वह भारत है. भारत के करीब पौने दो करोड़ लोग विदेशों में बसे हैं. जाहिर है, इसमें बहुत बड़ी तादाद हिंदुओं की है- इतनी बड़ी कि किसी भी एक देश की प्रवासी आबादी उससे पीछे रह जाती है. यानी हिंदुओं को भी दुनिया के हर देश की नागरिकता मिल सकती है, मिल रही है. लेकिन सरकार इसे देखने को तैयार क्यों नहीं होती? क्योंकि वह धर्म का चश्मा उतारने को तैयार नहीं दिखती. अगर उतारती तो पाती कि सिर्फ तीन पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यक सताए नहीं जा रहे हैं, कम से कम तीन और देश हैं जहां उनके उत्पीड़न की सार्वजनिक कथाएं हमारे सामने हैं. इनमें श्रीलंका के तमिल हैं, म्यांमार के रोहिंग्या हैं और चीन के वीघर मुस्लिम भी हैं और इन सबके उत्पीड़न के पीछे भी उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान ही है. अगर वाकई सरकार को पड़ोस के अल्पसंख्यकों की फ़िक्र होती तो वह इन सारे देशों को अपने क़ानून के दायरे में लाती. लेकिन उसकी चिंता सिर्फ़ हिंदू राजनीति की चिंता है और इस वजह से वह पूरे देश की बुनावट के साथ छेड़छाड़ करने पर तुली है.

यह बहुत मासूम तर्क है कि नागरिकता क़ानून देश के नागरिकों पर असर नहीं डालेगा. दरअसल वह मानसिक तौर पर एक रेखा खींच देगा- मुस्लिम और ग़ैरमुस्लिम के बीच. वह बार-बार याद दिलाता रहेगा कि उसके भीतर धार्मिक पहचानें स्थिर हैं और एक धार्मिक पहचान को उससे निषिद्ध कर दिया गया है. अमित शाह बार-बार बोलते रहे हैं कि जो हिंदू घुसपैठिए हैं, उनको बहुत कागज़ दिखाने की भी ज़रूरत नहीं है- उन्हें नागरिकता का हक़ होगा. जाहिर है, यह क़ानून बहुत सारे लोगों को याद दिलाएगा कि वे इस देश के विश्वसनीय नागरिक नहीं हैं, कि उनको संदेह के साये में रहना है.

यही इस क़ानून का सबसे ख़तरनाक पहलू है. और इसे कई दूसरे कानूनों के साथ जोड़कर देखिए तो समझ में आएगा कि किस तरह हिंदुस्तान के बुनियादी रेशे को बदलने की कोशिश की जा रही है- और यह कोशिश वे लोग कर रहे हैं जिनका आचरण आज़ादी की लड़ाई के दौर में सबसे संदिग्ध रहा है.

(प्रियदर्शन NDTV इंडिया में सीनियर एडिटर हैं...)

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