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साल भर पहले खुला कॉलेज कहां गया?

डिग्री कॉलेज को वापस लाओ की मांग को लेकर शुरू हुए इस आंदोलन से पता चलता है कि कॉलेज था और इसे वापस लाया भी जा सकता है.

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साल भर पहले खुला कॉलेज कहां गया?

कॉलेज की मांग को लेकर प्रदर्शन करते बिहार के शिवहर जिले के छात्र

हम सबने पढ़ा है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है मगर भारत एक विचित्र प्रधान देश भी है. इससे प्रधान लोगों को आहत होने की ज़रूरत नहीं है बस उस कॉलेज को खोजने की ज़रूरत है जो दस साल बाद इंस्टिट्यूट ऑफ एमिनेंस बनता हुआ दुनिया के टॉप 500 में शामिल हो जाएगा. एक कॉलेज और है जो था मगर गायब हो गया है, जिसे वापस लाने की मांग को लेकर छात्र आंदोलन कर रहे हैं. डिग्री कॉलेज को वापस लाओ की मांग को लेकर शुरू हुए इस आंदोलन से पता चलता है कि कॉलेज था और इसे वापस लाया भी जा सकता है. इस आंदोलन में न तो मानव संसाधन मंत्री शामिल हैं, न राज्य के शिक्षा मंत्री शामिल हैं, न ही उच्च शिक्षा को लेकर किसी कमेटी का विज़न शामिल है, फिर भी छात्रों का नारा है कि हम सबका यह नारा है, कॉलेज को आगे बढ़ाना है. शिवहर बिहार का सबसे पिछड़ा ज़िला है और रिसर्च के दौरान यह जान कर अभी भी यकीन नहीं हो रहा है कि इस ज़िले में एक भी डिग्री कॉलेज नहीं है. अगर कहीं है तो वह निकल आए, हम उसे प्यार से इंस्टिट्यूट ऑफ एमिनेंस ही बुलाएंगे.

कॉलेज मेरा घर है, यह भारत का बल है, साइकिल रिक्शा पर लगे इस नारे को पढ़िए, कस्बों गांवों में उच्च शिक्षा के लिए कॉलेजों के प्रति बढ़ते सम्मान और प्यार का ही प्रतीक होगा जो कॉलेज की तुलना अपने घर से सकता है और भारत के बल से करता है. शिवहर ज़िले में निकली इस रैली में वे छात्र शामिल हैं. पिछले साल शिवहर के इस अंगीभूत महाविद्यालय में 431 छात्रों ने बीए के लिए एडमिशन लिया था. 10 अगस्त 2017 को बिहार विश्वविद्यालय के कुलपति की मौजूदगी में इस कॉलेज की स्थापना हुई थी. ये वही विश्वविद्यालय है जहां 2017 के साल में एक भी परीक्षा नहीं हुई. जो भी है, अंगीभूत महाविद्यालय शिवहर में शैक्षणिक सत्र की शुरूआत के लिए बिहार के सहकारिता मंत्री राणा रंधीर सिंह और बीजेपी सांसद रमा देवी मौजूद थीं. एडमिशन हो गया और इस साल के एडमिशन के लिए भी विज्ञापन निकला है. अब अचानक खबर आई है कि इस कॉलेज को मान्यता ही नहीं मिली है. जब तक मान्यता नहीं मिलेगी तब तक यहां पढ़ाई नहीं होगी. बिना मान्यता के ही सांसद और मंत्री यहां फीता काट गए लेकिन जब ज़िलाधिकारी ने विश्वविद्लाय को पत्र लिखा कि पढ़ाने के लिए शिक्षक दिया जाए तो पोल खुल गई कि राज्य सरकार ने कहा कि इस कॉलेज को मान्यता ही नहीं मिली है, पढ़ाई बंद करें. अब बताइये राज्य सरकार कहती है कि कॉलेज को मान्यता नहीं है, लेकिन उसी राज्य सरकार के मंत्री इस कॉलेज में पढ़ाई के सत्र का उद्घाटन भी कर आते हैं. कुलमिलाकर इस ग़रीब ज़िले के छात्रों के साथ जो मज़ाक हुआ है वो अक्षम्य है. भारत ही एक ऐसा देश है जहां छात्रों को इस तरह से बर्बाद किया जा रहा है. उनकी ज़िंदगी से खेला जा रहा है. छात्र अपने आंदोलन को लेकर भी सीरीयस हैं और कॉलेज को लेकर भी हैं. जो कॉलेज अभी चलना शुरू नहीं हुआ है उसके बारे में नारे लगा रहे हैं कि कॉलेज मेरी आन है, यह भारत की शान है. जब कागज़ पर बने कॉलेज को इंस्टिट्यूट ऑफ एमिनेंस कहा जा सकता है तो जो कॉलेज चलना शुरू नहीं हुआ है, उसे भारत की आन और शान क्यों नहीं कहा जा सकता है.

431 छात्रों की ज़िंदगी अधर में लटक गई है. जिस कॉलेज में मंत्री आकर शुभारंभ करें, वाइस चांसलर मौजूद रहें और सांसद भी तो किसी को भी लगेगा कि मामला सरकारी हो गया है और कुछ गड़बड़ नहीं होगा. कायदे से वाइस चांसलर से पूछा जाना चाहिए कि जब वे इस कॉलेज की स्थापना के समय के लिए गए थे तो क्या उन्हें पता था कि इसे मान्यता मिली है या नहीं. शिवहर के एक स्कूल की इमारत में अंगीभूत कॉलेज शुरू करने का तामझाम शुरू हुआ था. शिक्षा को लेकर हम वाकई गंभीर नहीं है तभी इस तरह की नौटंकी हो जाती है.

हमारे सहयोगी ने ज़िलाधिकारी अर्शद अजीज़ से बात की. उन्होंने कहा कि कॉलेज की स्थापना के बाद छात्रों का एडमिशन हुआ. मगर शिक्षकों की नियुक्ति की बारी आई तो जवाब मिला कि मंज़ूरी नहीं मिली है. ज़िलाधिकारी को उम्मीद है कि जल्दी ही मान्यता मिल जाएगी तब तक उन्होंने बिहार विश्वविद्वालय के उन्हीं कुलपति को लिखा है जो इसकी स्थापना के समय शिवहर आए थे. लिखा है कि इन 431 छात्रों को दूसरे कॉलेज में एडजस्ट किया जाए.

अब चलते हैं छत्तीसगढ़. दुनिया में न जाने कितने मरीज़ों को ग्लूकोज़ का पानी चढ़ाया जाता होगा, क्या आपने उस जगह पर कभी चीटियों की भरमार देखी है, इतनी चीटियां देखी हैं कि वो मरीज़ के घाव को ही जकड़ लें और मर जाए. अस्पताल के अधिकारी चूंकि अधिकारी हैं इसिलए वो ज्ञान दे सकते हैं और चूंकि वे अधिकारी हैं इसलिए नहीं बोल सकते हैं कि ये सब क्यों हो जाता है, लापरवाही से ज्यादा इसलिए भी हो जाता है क्योंकि अस्पतालों में देखरेख के लिए पर्याप्त संख्या में कर्मचारी नहीं हैं और न ही डॉक्टर हैं.

हम समझते हैं कि आपको यह तस्वीर देखने में तकलीफ हो रही होगी कि एक बीमार मरीज़ के घाव को चीटियों ने घेर लिया है. 30 साल का यह मरीज़ होश में नहीं था कि किसी को कह सके कि चीटियां काट रही हैं. न ही अस्तपाल के कर्मचारियों की नज़र इस बात पर गई कि इसकी साफ सफाई कर दी जाए. इस मरीज़ के सर में गंभीर चोट आई थी जिसके कारण प्राथमिक अस्पताल से निकालकर ज़िला अस्पताल लाया गया था. वहां भी लापरवाही का शिकार हो रहा था मगर स्थानीय विधायकों ने स्टाफ को फटकार लगाकर इसे ज़िला अस्पताल भिजवा दिया. 12 दिनों तक बैकुंठपुर के ज़िला अस्पताल में भर्ती रहने के बाद सोमवार को इसकी मौत हो गई. मौत का कारण चीटियों का काटना रहा या नहीं, हम इस पर टिप्पणी नहीं कर रहे मगर बिस्तर पर पड़े मरीज़ को चूहा काट ले, चींटी काट ले, इसे नोटिस में लेना ही चाहिए कि आम लोगों को किस तरह की चिकित्सा उपलब्ध कराई जा रही है.

अधिकारी का जवाब इस तरह से है जैसे अस्पताल में सब ठीक है, बस चीटीं लग गई जो ग्लूकोज खाने आ जाती है. सामाजिक कार्यकर्ता का जवाब इस तरह से है कि कुछ हो ही नहीं रहा है. इस ज़िला अस्पताल में 100 मरीज़ों को भर्ती करने की क्षमता है लेकिन आम तौर पर 400 से अधिक मरीज़ आ जाते हैं. मंगलवार को ही 179 मरीज़ भर्ती किए है. हाल ही में भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक नेशनल हेल्थ प्रोफाइल निकाली है. इसकी साइट पर आप भी जाकर राज्यों में सरकारी चिकित्सा का हाल देख सकते हैं. छत्तीसगढ़ में 15,916 लोगों पर एक डॉक्टर है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 25,600 डॉक्टर होने चाहिए. मगर सरकारी डॉक्टरों के मंज़ूर पदों की संख्या मात्र 1873 ही है. उसमें से भी 410 डॉक्टरों के पद ख़ाली हैं. 25000 से अधिक डॉक्टर चाहिए मगर 1500 के करीब डॉक्टर हैं तो आप समझ सकते हैं कि क्या हालत होगी.

छत्तीसगढ़ से निकल कर चलते हैं कि बिहार जहां एक नेशनल हाईवे तीन साल से सरकार का रास्ता देख रहा है कि कब सरकार की नज़र पड़ेगी और सड़क बनेगी. हमारे सहयोगी कन्हैया ने सहरसा से मुरलीगंज तक अपनी बाइक से यात्रा, करीब 30 किमी बाइक चलाकर देखा कि नेशनल हाईवे की ऐसी हालत क्यों हैं. इसे नेशनल हाईवे 107 कहते हैं जो महेशपुर से पूर्णिया तक जाती है. कन्हैया ने बताया कि पहले सहरसा से पूर्णिया तक जाने में 3 घंटे लगते थे, अब छह घंटे लग रहे हैं. आप कन्हैया के रिकॉर्ड किए हुए वीडियो के ज़रिए अगले चार मिनट तक महसूस कीजिए कि वहां के लोग किस तरह से इस हाईवे पर सफर करते होंगे. किसी की गाड़ी उलट जाती है तो गिर कर किसी के पांव टूट जाते हैं.

हमने स्थानीय अखबारों को भी खंगाला कि इस हाईवे के बारे में क्या क्या छपा है. 24 जून के हिन्दुस्तान में छपा है कि घोषणा के आठ माह बाद भी एनएच 107 का निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ है. यह नेशनल हाईवे मधेपुरा ज़िले की लाइफ लाइन समझा जा रहा है. वन विभाग से इसकी मंज़ूरी नहीं मिली है. पिछले साल 14 अक्टूबर को मोकामा में प्रधानमंत्री मोदी ने इसके दोहरीकरण की शुरूआत की घोषणा की थी. एक और अखबार के अनुसार सासंद पप्पू यादव दावा कर रहे हैं कि सारी अड़चनें दूर हो गई हैं और जल्दी निर्माण शुरू होगा. दावे हो रहे हैं, प्रयास भी हो रहे होंगे मगर तीन साल से लोग इस सड़क के कारण जो झेल रहे हैं, वो आप इन तस्वीरों के ज़रिए समझ सकते हैं. लोग कहते हैं कि वे सुन ही रहे हैं कि टेंडर हो गया, तो अधिग्रहण हो गया मगर सड़क की हालत में तीन साल से सुधार नहीं है. 9 मई को राजद सांसद ने इस हाईवे को लेकर केदीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को पत्र भी लिखा था. 31 मई को नितिन गडकरी ने उन्हें लिखित जवाब भेजा है और उसमें इतना ही कहा है कि आपके पत्र को मुख्य अभियंता सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय को भेजा जा रहा है.

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हाल ही में केंद्र सरकार ने धान का न्यूनतम समथर्न मूल्य 1750 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है मगर उड़ीसा के कटक के किसान मांग कर रहे हैं कि उन्हें 1750 की जगह 5000 रुपये प्रति क्विंटल का भाव दिया जाए. आपको याद होगा कि देश में उड़ीसा विधानसभा ही अकेली विधानसभा है जहां पर सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पास किया गया है कि धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2930 रुपये दिया जाए. 25 मार्च 2017 को विधानसभा में यह प्रस्ताव सभी दलों की सहमति से पास हुआ था. जिसके बाद इसे दिल्ली भेजा गया मगर कुछ नहीं हुआ. अभी जो न्यूनतम समर्थन मूल्य आया है वो इस प्रस्ताव से 1200 रुपया कम है. लिहाज़ा इस रैली में शामिल किसान वो पैसा भी चाहते हैं. इसके अलावा किसानों की एक मांग है कि जो सिर्फ खेती के पेशे से जुड़े हैं उन्हें किसान सुरक्षा भत्ता दिया जाए. 36 लाख किसानों को साल में एक बार 5000 रुपये का भत्ता मिले जिस पर 21,600 करोड़ का खर्चा आएगा. यही नहीं उड़ीसा में 12 कोल्ड स्टोर हैं जिसमें से तीन ही कोल्ड स्टोरेज काम कर रहे हैं. राज्य में 250 से 300 कोल्ड स्टोर बनाए जाने की ज़रूरत है. किसानों को मंडी में सही दाम नहीं मिलते हैं इसलिए सरकार को पहले मंडी सिस्टम में सुधार करना चाहिए और मज़बूत करना चाहिए. इस आंदोलन का नेतृत्व किसान नेता अक्षय कुमार कर रहे थे. आम तौर पर किसानों के इस तरह के संघर्ष में आप किसी राजनीतिक दल के नेता को नहीं देखेंगे जो दिल्ली में बैठकर किसानों के मसले पर ट्वीट करते रहते हैं.

योगेंद्र यादव ने आरोप लगाया है कि किसानों को लेकर उनके राजनीतिक अभियान को रोकने लिए अब उनके परिवार के सदस्यों को आयकर विभाग के इस्ताल से डराया जा रहा है. रेवाड़ी में उनकी बहन, जीजा और भाई के घर पर छापे डाले जा रहे हैं और वे उनसे संपर्क नहीं कर पा रहे हैं. किसी को घर के भीतर नहीं जाने दिया जा रहा है. उनकी दोनों बहनें डॉक्टर हैं. योगेंद्र ने ट्वीट किया है कि दिल्ली से 100 लोगों के दल ने उनके अस्पताल पर छापे मारे हैं. अस्पताल और आईसीयू सब सील हैं. आम आदमी पार्टी के नेता आशीष खेतान ने भी योगेंद्र के रिश्तेदारों के घर डाले जा रहे छापे को राजनीतिक कार्रवाई बताया है. यह मामला भी वैसा ही कि देर तक छापे मारो, कहानियां बनाओ और राजनीतिक विवाद पैदा करो. योगेंद्र यादव के सहयोगी प्रशांत भूषण ने भी इस छापे को राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया है.


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